टूटे लम्हे

वक्त की शाख से
टूट कर लम्हे गुम जाते हैं !
रिश्ते बेनाम होते हैं तो
मर जाते हैं !
ठहरे हुए रिश्ते
सड़कर बदबूदार हो जाते हैं !
दामन झटकाने से
सड़ांध तो जाती नहीं,
जिस्म के हर क़तरे के
टपकते लहू से बू आती है !
अच्छा हो कि काटकर
फेंक दो -उन शाखों को
लम्हों को लिपटाए
ख़ामोशी से जीती हैं जो !
टूटता है जब इक-इक लम्हा
चरमराती हैं टहनियाँ
लम्हे ग़ुम जाते हैं
सूख कर
मुरझा जाती हैं टहनियाँ !!!

नज़्म   by  वीना विज ‘उदित’

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4 Responses to “टूटे लम्हे”

  1. ashish maharishi Says:

    शानदार् कविता
    बस लिखते रहिये

  2. मीत Says:

    अच्छा है वीना जी. सोचने पर, या शायद महसूसने पर मजबूर किया आपकी नज्म ने.

    अच्छा हो कि काटकर
    फेंक दो -उन शाखों को
    लम्हों को लिपटाए
    ख़ामोशी से जीती हैं जो !

    सोच रहा हूँ – क्या ये मुमकिन है ?? कुछ लम्हे हमारा पीछा (शायद) उम्र भर नहीं छोड़ते.

    बहरहाल, इस नज्म के लिए शुक्रिया.

  3. paramjitbali Says:

    bahut baDhiyaa rcanaa hai..

    अच्छा हो कि काटकर
    फेंक दो -उन शाखों को
    लम्हों को लिपटाए
    ख़ामोशी से जीती हैं जो !

  4. समीर लाल Says:

    वक्त की शाख से
    टूट कर लम्हे गुम जाते हैं !
    रिश्ते बेनाम होते हैं तो
    मर जाते हैं !

    अच्छी रचना है. पसंद आई, बधाई.

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