MERI MANISHA

मेरी मनीषा

सुध खोए आकुल मेरी मनीषा
उर्ध्व द्वार पर टकटकी लगाए
शुभ्र् चन्द्र से आलोकित नभ के
निर्मल प्रकाश में स्नान की चाह जगाए

चेतना की वीणा के तार प्यासे मिलन को
ज्यूं धैवत स्वर में त्रिष्टुप मिल जाए
अन्त:की प्यास बुझाने को मेघ
अमृत भरे स्वर्ण कलश नभ से लुढकाए
शाश्वत झरनों से झंकृत मन: स्थिती

बहते दरिया की भंवर-शक्ति बन जाए
प्राची के संयत झोंकों को तन पर लपेट
प्रतीक्षारत क्लांत मुख क्षीण-क्षीण मुस्काए
आसमां की श्याम चदरिया सर पर धरे
नटखट तारों का गमन वीहान ले आए

नटी प्रकृति के प्रशस्त कलापों को तक
मेरी मनीषा आनन्द से सराबोर हो जाए ॥

वीणा विज ‘उदित’

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