सहेली

‘बीजी! ऐ मेरी पक्की सहेली ए शानी !” कहते हुए साशा ने अपनी दादी के गले में दोनो बाहें डालकर लाड़ किया|बीजी के कलेजे में सहस्त्र जल-धाराओं की ठंडक पड़ गई |उन्होंने भी उसे जोर की जफ्फी डाली|फिर शानी को पास बुलाकर उसके सिर पर भी प्यार से हाथ फेरा|”ऐ तां बड़ी सोंड़ी ए!”य़ह सुनते ही साशा गर्व से उसे देखती हुई, खींचकर अपने साथ भीतर ले गयी|लेकिन शानी ने बुरा सा मुँह बनाया और अपने बाल ठीक करती हुई चली गई |साशा जितनी भोली थी, बीजी को शानी उतनी ही चन्ट लगी| इस लड़्की का साथ कहीं साशा के लिए मुसीबत ही ना बन जाए|वह कुछ अधिक ही छोटे कपड़े पहने हुए थी|उनके पेट में तो गुड़गुड़ शुरू हो गयी| वो सोचने लगीं अभी तक तो पेट ठीक था, फिर मरोड़ क्यों उठ रहे हैं? शायद यह खतरे की घन्टी थी,जो साशा के जीवन में उस लड़की के आ जाने से बज रही थी|सहेली तो वह होती है,जिसे सहेली के अपने लोग भी अपने ही लगें | यह मार्ड्रन तितली लगती लड़की तो कभी भरोसेमन्द नहीं हो सकती–ऐसा उनका सारी उम्र का अनुभव उनसे कह रहा था|” पक्की सहेली मतलब टिडसहेली(पेट की सहेली)”|

इस विचार के आते ही बीजी (राणी) के ख्याल बिन पंखों के उड़ते -उड़ते उनके गाँव की रतनी के वेहड़े (आंगन)में पहुँच गए| रतनी, बिल्लो और राणी तीनों सहेलियां बैठी कसीदा काढ़ रही हैं|दोस्ती तो तीनों में थी, पर रतनी और बिल्लो टिडसहेलियाँ थीं|अर्थात दोनों के पेट में एक -दूसरे को बताए बगैर कोई बात नहीं पचती थी|वैसे तो लाख कोशिश की जाए पर औरतजात के पेट में न जाने कैसा उथलापन होता है कि कुछ कान के रास्ते पेट में गया नहीं कि मुँह के रास्ते बाहर| जब एक पक्की सहेली दूसरी से कहती है कि तुझे जो बात बता रही हूं–वो किसी से मत कहना|फिर तो भली करे राम, समझो वह बात घर -घर में पहुँच गई| वैसे घर में ढेरों काम हैं, सिर खुजाने का भी समय नहीं है| पर “यह बात किसी से न कहना”–सुनते ही सारे काम ताक पर धरे रह जाते हैं| फटाफट साथ वाले घर में,फिर उसके साथवाले और उसको भी साथ लेकर अगले घर में बढ़ा-चढ़ा कर जब तक ‘उस’ बात का चटकारे ले-लेकर मजा न लिया, तो आज का दिन समझो बेकार गया|आज खाना कैसे हज़म होगा|सो,कैसी पक्की सहेली?

रतनी और बिल्लो का तो यह हाल था कि दोनो की सुबह खेतों में एक साथ जाने से होती और फिर सारा दिन एक -दूसरी को आवाजें|लम्बी- लम्बी जेठ की दोपहरें कसीदा काढ़ते व कभी माएया तो कभी हीर भी साथ में गाती रहतीं|एक की चुनरी पूरी हो गई, तो दूसरी की भी उसी डिज़ाईन की चुनरी काढ़ी जाती|राणी भी उन दोनो के साथ बैठ कर कभी-कभी अपनी चुन्नी काढ़ती, और सुर में सुर मिलाती| बिल्लो के भाई की नई-नई शादी हुई थी, सो उन दिनों वह भाई- भाभी की छेड़-छाड़ छुप-छुप के देखती और खूब मजे ले- लेकर उनकी बातें सुनाती| तीनों भरे- पूरे बदन की जवान लड़कियाँ–ऐसी बातें सुनकर उनके कुवाँरे, गदरे बदन में भी हिलोरे उठते| वे भी रात को बिस्तर में अपने ख़्यालों के राजकुमार के साथ होतीं| हर अगले दिन वे सब एक- दूसरी से पूछतीं कि किसके घर में लाड़ा (दूल्हा) ढूंढा जा रहा है? राणी ने बताया कि उसका रिश्ता आया है|और उसका ब्याह सबसे पहले हो गया| इसके बाद की सारी बातें बिल्लो ने उसे शादी के बाद गाँव आने पर बताईं थीं| इसके बाद तो वे खाना भी एक-दूसरी के साथ ही खातीं| उन्हीं दिनों रतनी के घर कोई दूर का परोंणा (मेहमान) वीरू आया, गाँव में कुछ ज़मीन के काम से |आज बिल्लो के आने पर रतनी ने बताया कि वह लल्चाई नज़रों से उसे देख रहा था, जाने उसे खा ही जाएगा| इसी बात पर दोनों देर तक हँसती रहीं| तभी वह घर आया और दोनो को देख कर होंठों पर जीभ फेरता दूसरी तरफ चला गया| वे दोनों अल्हण, उसकी नीयत से अन्जान झट सिरपर पल्ला कर के चुन्नी मुँह में दबाकर फिर हँस पड़ीं|अगले दिन रतनी ने बताया कि उसकी चुन्नी का कोना मज्ज (भैंस) के कुंडे में फँसा समझकर वो छुड़ाने को पीछे मुड़ी, तो देखती क्या है कि वीरू चुन्नी का कोना हाथ में पकड़े खड़ा है|रतनी ने समझा वो मज़ाक कर रहा है|चुन्नी छुड़ाकर वो शरमाकर वहाँ से जो भागी तो बिल्लो के घर आकर रुकी थी| अभी भी उसकी साँस फूल रही थी|पूरी बात एक ही साँस में सुनाकर उसने अपनी पक्की सहेली होने का काम पूरा किया|दोनो इसी पर देर तक खूब हँसती रहीं |सारा दिन बिल्लो के घर बिताकर रतनी जब शाम को अपने घर चली गई, तो बिल्लो ने अपनी भाभी को सारी बात मजे ले-लेकर सुनाई|और अपना पेट हल्का किया|पक्की सहेली थी तो ” टिड” में बात सम्भालकर रखती|पर नहीं बन पाई वो “टिड सेली”, और इसी से बाद में सारा काम बिगड़ा|

दोनों ही इसे मज़ाक समझकर इस पर हँसी- ठिठोली करती रहीं|मामले की गम्भीरता को कोई नहीं जान सका इसी तरह कभी रतनी का रास्ता रोककर , तो कभी रात को पानी माँगने के बहाने , गिलास के बदले उसकी कलाई मरोड़ देना वीरू का रोज़ का काम हो गया था| रतनी अपने अल्हणपने में इसे खेल समझकर सारी बातें अपनी पक्की सहेली बिल्लो से साँझा करके अपने को सुरक्षित समझती रही|और उधर बिल्लो का उथला पेट सब कुछ भाभी से उगलता रहा|तभी एक दिन सवेरे-सवेरे रतनी के बेबे और बाऊजी किसी के मुकाणे (मरने) पर साथ वाले पिंड (गाँव) चले गए और दोनो वीर हमेशा की तरह खेतों पर|रतनी भी सबके लिए खाना बनाकर रसोई साफ कर रही थी कि वीरू ने पीछे से आकर उसे कमर से पकड़ लिया और जबरदस्ती अपने भीतर की धधकती आग को शान्त कर ही लिया| बेसुध रतनी को उसी हाल में वहाँ छोड़ कर ,वीरू शायद डर के मारे भाग गया था|कुछ सँभलने पर रोती-सुबकती रतनी ने पास पड़े घड़े का सारा पानी अपने ऊपर उड़ेल लिया|अपने ऊपर लगे कलंक को वो धोने का नाकाम यत्न कर रही थी|उसके सारे सपने टूट गए थे|उसी समय उसको ढूंढती बिल्लो की आवाजें उसके कानों से टकराईं|उसके दिल को राहत मिली कि उसकी पक्की सहेली आ गई है|उसे क्या मालूम कि यही राहत उसकी तबाही का कारण बनेगी|बिल्लो उसे अचानक इस फटे हाल में देखकर घबरा गई|रोते- रोते रतनी ने उसे अद्दोन्त पूरा का पूरा किस्सा सुना डाला|बिल्लो ने उसे सँभाला और थोड़ा हल्दी डालकर गरम दूध पिलाया|भीतर बिस्तर पर जाकर उसे लिटाया और बोली कि मैं तेरी बेबे आने तक यहीं रहूंगी, ज़रा भाभी को कहकर आती हूं|बिल्लो का उथला पेट कुछ न छिपा सका |उसने भाभी के आगे सारा का सारा किस्सा कह डाला और बोली कि घर देर से लौटेगी| खुद निश्चिंत होकर रतनी के पास आकर उसको हौसला देने लगी|रतनी बेचारी अपनी टिड सहेली का हाथ थामकर,उसे अपना राज़दार समझ रही थी| उसे क्या मालूम कि बिल्लो के पेट में गहराई है ही नहीं|बिल्लो अन्जाने में ही घास के ढेर में तीली लगा आई थी|रतनी की बात सारे गाँव में आग की तरह फैल गई थी| जब रतनी की बेबे और बाऊजी रात देर से घर लौटे, तो अपने घर के पास भीड़ देखकर घबरा गए |लोग उनको देखकर काना-फूसी करने लगे|वे परेशान से घर पहुँचे,तो क्या देखते हैं कि वहाँ तो लोगों का मेला लगा हुआ है|वे घबरा से गए| रतनी का कही> पता नहीं था |रात भर गाँव के हर कोने और नुक्कड़ पर लोग रतनी को आवाज़े> दे-दे कर ढूँढते रहे |अगली सुबह गाँव के कुएँ में एक लाश पड़ी हुई थी|

राणी की माँ ने शादी से पहले उसे समझाया था, ‘लक्ख सेली बणाई धीए ,पर टिह्ड सेली न बणाईं’ |अर्थात बेटी! जितनी चाहो उतनी सहेलियाँ बनाना, लेकिन कभी पेट की बात किसी सहेली से न कहना |अपना मरद प्यार करे या मारे ,बात घर से बाहर किसी और के कान में न पड़े| उसकी इज्जत होगी तो तेरी भी होगी|और राणी ने सारी उम्र माँ के कहे की लाज रखी|राणी चाहती थी कि हर माँ को चाहिए कि वह यही शिक्षा अपनी बेटी को विरासत में दे| काश! रतनी भी आपबीती को पेट में हज़म करके ,उसे पेट के कुएँ की गहराई में डाल लेती, तो जान से न जाती | आज यही बात दादी अपनी पोती को समझाने जा रही थी|

वीना विज ‘उदित’

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