वही मन्ज़र

बीती हुई यादों का
मुँह चूम लिया है मैंने
वक़्त….
जो सदा से वहीं
ठहरा था,
उसकी नब्ज़ चल पड़ी है
वो पहली मुलाकात
वक़्त की रफ्तार में
जो पीछे छूट गई थी
आज फिर से
वही मन्ज़र देख
ज़हन में
ताजी हो उठी है
जो जज़्बात
कब्र में
दफ्न हो गए थे
जिन पर लिखे मर्सिये
वक़्त की मार
सहते हुएbr>
हर्फों के बिगड़ने से
पढ़ने के क़बिल
नहीं रह गए थे,
आज वही
नई शक़्ल में
मेरे रूबरू हैं!
खुशामदीद मेरे कल!!
उसे देख
जीने की कश्मक़श
आसां हो गई है
आगे की किसे ख़बर
सब कुछ
उसी के हवाले किया है |

वीना विज ‘उदित’

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