स्मृति दंश

देखते ही देखते
जो था, नहीं रहा
क्षण-भंगुर!
लपटों का अम्बार
कालिमा ओढ़े
धुँए में गुम
बिखरता चला गया
जुड़े तिनकों का
क़तरा-क़तरा
जलने का शोर
पार्थिव मिटकर
अपार्थिव स्मृति में
नवरूप पा गया
*
ऊपरी मंज़िल
टेढ़ा सा जीना
ढेरों यादों का
बोझा ढोता
पल-पल मिटता जाता
नवयुगल-रास का
दृष्टेता
अनकहा यथार्थ
लंकादहन दोहराता
*
नित नए स्वरूप
चाहे-अनचाहे
बढ़ती भीड़ में
खुशियाँ सीढ़ी चढ़तीं
थालियाँ कम पड़तीं
पैर के अंगूठे से
सीढ़ी पर पीठ कुरेदना
चुपके से कौर
मुँह में डालना
घटनाक्रम
नवरूपों में बढ़ना
अब
यादों का रिसना
*
वे तीन खिड़कियाँ
छोटी-छोटी
पर्वतों को बाँहों में भरे
आसमां को समेटे
ऊँचाई पर हँसती
एड़ियाँ उठाए तकना
गड़रियों के कारवां
जाती हुई परछाईयां
ओत-प्रोत
मन अभी भी तकता
पाँव थकान लिए
पंजों में कसक
एड़ी की उठान
वहीं रह गई
धरातल ही नहीं रहा
भटकन लिए
मिटकर बनते रहे
यादों के सिलसिले
*
काफ़िले चले
राख के ढेर के
इक पूरी उम्र का
हिसाब समेटे
चंद बोरों में जिंदगी लिए
दरिया के बहाव की
रवानगी संग
चलता किए
सुदूर, अजाने सफर पर
पंच भूतों में
जगह पाने को
अस्तित्व यादों में छोड़
*
चंद सुलगते अरमान
चिंगारियों का शेष
जले हुए लोहे के टुकड़े
राख थे श्रिंगार जिनमें
खुशबू खुश दफ़्न थी
इक सड़ांध लिए
कुछ शक्लें बनी
जले-बुझे टुकड़ों की
बदरंग काले से
समेटे हैं यादें
चंद टुकड़े
हँसे थे जो आग पर
गर्वित थे स्वयं पर
बौछारों से बचे
अड़े रहे वहीं
अंगद निज को मान
लपेटे पड़े रहे
यादों की परछाईयां
*
आँखें चुराकर
मोह का मारा
इक टुकड़ा
संग चिपका
साथ हो लिया
सुनहरी यादों का प्रतीक
बदरंग टुकड़ा
ताक पर रख कर
समय!
फिर बसे घर में
इक कोने में
छुप के रहने को
जगह तलाशेगा
दामन थामे मोह का
*
संतप्त हृदय
दग्ध ज्वाला से जला
लुटा—फिर भी रीता नहीं
अंतस का बवंडर
गहराते साये सा
अतीत का बोझा ढोए
बढ़ा आ रहा है
यादों की मौत का
जनाज़ा लिए
जीवन में पड़ गई हैं
सिल्वटें बेढंगी
जो नहीं था
अब है
ग़हन अवसाद भरा
स्मृति दंश!

वीना विज ‘उदित’

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