मंज़र की तलाश
चाहतों की बरसात में भीगे हम
सपनों की सौग़ात सजाए हैं
चप्पे-चप्पे में तेरे निशां ढूंढते
उम्मीद की इक शमा जलाए हैं..
हवा के झोंके सा तेरा आना
मदभरी आँखों का पीना औ चले जाना
उस लम्हे पे कुरबान है क़ायनात सारी
इसी मंज़र को तलाशते फिरते हैं…….
लुटकर भी दामन बचा लिया अपना
मदहोशी का आलम यूं छाया
तेरी नज़रों में छिपी मस्ती जो देखी
पत्थर पर वही अक्स तराशते हैं…..
ख़रामा-ख़रामा यूं वक्त कटेगा
इश्क का नशा सर पर चढ़ेगा
जिन ख़्वाबों की ताबीर बरसों से थी
उन्हीं में तुम्हें रूबरू देखते हैं……
सावनी बदरी सी भटकन लिए
अर्श के ग़ुमशुदा तारे हुए हैं
आ भी जाओ !
रूह प्यासी, जिस्म तन्हा है
बेआबरू से तेरे दर पे सजदा किए हैं…..!!!!!
वीणा विज ‘उदित्’
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January 18th, 2008 at 2:51 am
वाह ! बहुत बढ़िया वीणा जी. बहुत ही उम्दा लिखा है, गोया आप लिख नहीं रहीं, सोच रहीं हैं. बहुत अच्छे ख़याल, बहुत ही अच्छी अदायगी.