इक विश्वास

कल देर तक आँधी चली
ढेरों बौर गिरे
कच्ची अम्बियाँ भी गिरीं
पेड़ के नीचे
लाशों का ढेर
लाशें उठवा ली गईं
अँधेरा हटा, पवन थमा
धूप की किरणें चमकीं
लाशों को टोकरी में डाल
ढेरों मसाले लगा
ज्यूँ मिस्र की ममी
पिरामिड में सहेजी
अम्मा ने भी सहेजीं
काँच के मर्तबान में
मसाले लगा
अचार बना
वे सारी लाशें
पेड़ निश्चिन्त हो
मुस्काया इस पर……!!
वीणा विज ‘उदित’

One Response to “इक विश्वास”

  1. Deana Bryan Says:

    wsihs3khqn36u720

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