इक साया

मेरे आगे-आगे चलता इक साया
मेरे छूने की कोशिश में कहीं खो गया
वीरानो से टकराती नज़रें फिर उसे ढूंढें
दीवार से चिपकी परछाँई में उसे पकड़े
दीवार वहीं लेकिन साया ओट में गुम जाता
दौड़ के पकड़ पाऊं कि ठोकर खा गिर जाता
मन की उड़ान उस साये को ढूंढती फिरती
कटे पंख सी गिर जाती, वहाँ पहुँच न पाती
*
क्यों अतीत से गरमाया आया ये इक साया
निष्चेष्ट तन की पीड़ा को फिर जगाने आया
अभी था, अभी है,अभी नहीं है भुलावा दिया
मृगतृष्णा सा मन भटका, तन को थका दिया
क़रीब आ मेरे रोम-रोम से लिपट गया
उनींदी आँखों को सुलाया नहीं, जगा दिया
तन्हाई में की मुझसे ढेरों बतियाँ
भरमाया मुझे ऑ सदा को चलता किया…|

वीना विज ‘उदित’

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