हर पल अन्तिम पल

सफर करने को
चार जोड़ी कपड़े
कुछ कागज़
कुछ किताबें
मुश्किलों से बनवाए
ढेरों गहनों के ढेर में से
केवल चार
एक घड़ी
बस यही सामान
साथ लिया है!
घर छोड़ा
निर्मोही बन
सालों से जो जमा किया
सारा सामान छोड़ दिया|
आज यहाँ
कल कहाँ
न मालूम..
जहाँ रात हुई
वहीं घर बन गया
भोर की दस्तक होते ही
मुसाफिर
चल पड़ा
अगले पड़ाव की ओर
हर पल
चलने की तैयारी किए
शायद !
कोई भी पल
अन्तिम पल बन जाए
एक शून्य
है समक्ष
बाकि सब
पीछे छूट गया
मोह, ममता, माया
इन बेड़ियों को तोड़
जिन तत्वों से
बने हैं हम
उन्हीं से पुनर्मिलन
की तैयारी है
यही सफर…!
शायद
अ!न्तिम सफर बन जाए!!!

वीना विज ‘उदित’

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