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	<title>Hindi short stories, poetry and blogs</title>
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	<description>Veena Vij Udit&#039;s writings in Hindi</description>
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		<title>हिन्दी पर कुछ कविताऍ &#8211;</title>
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		<pubDate>Sun, 25 Mar 2012 17:21:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[&#1080;&#1082;&#1086;&#1085;&#1072; &#1079;&#1072; &#1087;&#1086;&#1076;&#1072;&#1088;&#1098;&#1082;हिन्दी निश्छल आत्मीयता आँचल में भर पल-पल प्रतिपल मुझमें समायी मेरी मातृभूमि हिन्दी की तरंगताल संवेदनाओं को अनुभूतियों में उकेरती &#124; मौलिकता,सहजता,सरलता का शिल्प वैचारिक प्रतिबद्धताओं को देती विचार राष्ट्र्भाषा के उच्च पद पर आसीन हो समृद्ध बन अकण्ठ जीवन को देती विस्तार&#124; मातृभूमि, मातृभाषा को नमन शत वार देस हो परदेस सदा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font style="position: absolute;overflow: hidden;height: 0;width: 0"><a href="http://xn--h1aafme.net/%E8%EA%EE%ED%E0-%E7%E0-%EF%EE%E4%E0%F0%FA%EA">&#1080;&#1082;&#1086;&#1085;&#1072; &#1079;&#1072; &#1087;&#1086;&#1076;&#1072;&#1088;&#1098;&#1082;</a></font>हिन्दी</p>
<p>निश्छल आत्मीयता आँचल में भर<br />
पल-पल प्रतिपल मुझमें समायी<br />
मेरी मातृभूमि हिन्दी की तरंगताल<br />
संवेदनाओं को अनुभूतियों में उकेरती |<br />
मौलिकता,सहजता,सरलता का शिल्प<br />
वैचारिक प्रतिबद्धताओं को देती विचार<br />
राष्ट्र्भाषा के उच्च पद पर आसीन हो<br />
समृद्ध बन अकण्ठ जीवन को देती विस्तार|<br />
मातृभूमि, मातृभाषा को नमन शत वार<br />
देस हो परदेस सदा करें इसका प्रचारसर्व<br />
हर मन की परिधि में लिपटी हिन्दी<br />
निर्जरा रहे इसकी आभा का प्रकाश |<br />
गुलामी के दिन लदे, स्वतंत्र हुई हिन्दी<br />
मान बढाएं मातृभाषा का तज अंग्रेजी<br />
गौरवान्वित करें भारत का भारतीयपन<br />
जन-जन के ह्दयपटल पर लहराए ये परचम!!!!!!!<br />
वीणा विज &#8220;उदित&#8221;</p>
<p>मातृभाषा हिन्दी<br />
हिन्दुस्तानी वही जो करे हिन्दी का मान<br />
सोचे हिन्दी,खोले हिन्दी मन का द्वार |<br />
अनुभव प्रतिबिम्बित होते हिन्दी शब्दों मे<br />
वास्तविकता पाती धरातल हिन्दी कथनों में |<br />
जटिलता पाती समाधान सरल वाक्यों में<br />
विडम्बनाएं होती  अभिव्यक्त इसी में |<br />
क्रन्दन करता नन्दन मातृभाषा अपनी में<br />
सर्वव्यापक का स्तुतिगान बसा हिन्दी में |<br />
दैविक शक्तियाँ बरसाती मेघ-मल्हार<br />
विजयी भव! के आशीर्वाद बरसते हिन्दी में |<br />
सीखें चीन, जापान,फ्राँस से मातृभाषा का प्यार<br />
गौण प्रादेशिकता से सर्वोपरि ये पाए सत्कार |<br />
मातृभाषा में चिन्तन का सार्वभौमिक अधिकार<br />
जिव्हा पर हिन्दी विराजे अंग्रेजी का हो बहिष्कार|<br />
गगनदुँदुभी बज उठी , नाद हुआ चहुँ ओर<br />
उपलब्ध कराए जीवन- विवेक भाषा की डोर ||||||</p>
<p>हिन्दी का स्वरूप<br />
सर्वभाषाओं में सरल ग्राह्यकारी<br />
हिन्दी भाषी भरता रंगों की पिचकारी |<br />
भाषा का रंग जिस-जिस पर पड़े<br />
बतियाते हिन्दी में ,रंग जो चोखा चढे |<br />
हिन्दी की जड़ से निकली शाखाएं<br />
हर दस कोस पर बदलतीं धारणाएं |<br />
तोड़-मरोड़ हिन्दी का बदलें स्वरूप<br />
गाँव-गाँव में विचर बनती अनूप |<br />
मातृभाषा हिन्दी की ढेरों बेटियाँ<br />
बृज भाषा , मैथली ,कई खड़ी बोलियाँ |<br />
हिन्द की माटी में जन्मी वीरॉं की कथा<br />
हिन्दी से आँगन में बिखरी शुभ्र विभा |<br />
हिम के उत्तुंग शिखर पर विराजी हिन्दी<br />
साहित्यकारों ने कथाकाव्य से सजाई हिन्दी|<br />
अन्तर्राष्ट्रीय शब्दकोष में सम्मानित हिन्दी<br />
जय हे! जय हे! के नारों से गूँजी पृथ्वी ||<br />
वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
<p>हिन्द की आत्मा हिन्दी </p>
<p>गगनचुम्बी पर्वतों की ऊँचाइयों पर पनपी<br />
सतपुड़ा, विंध्यांचल की गोद में मुस्काई |<br />
शिवालिक ने माथे पर सजाई बिंदिया<br />
अरावली ने बाँहों में चूड़ियाँ खनकाईं |<br />
नीलगिरी ने पहनाई पाँवों में पायलिया<br />
ऑढाई सर पर धवल हिमालय ने चूनरिया |<br />
अमित सद्भावनाओं से सजी हिन्दी देहावली<br />
अनूप रूपों के सुन्दर बिम्ब सजाती हिन्दी |<br />
हिन्द में बहती नदियाँ देती जाती पैग़ाम<br />
मन में ठान नदिया में लो हिन्दी का स्नान|<br />
शस्य-श्यामला धरणी की पहचान है हिन्दी<br />
बरखा की बूँदों की टप-टप में गान है हिन<br />
 पूरब में कलरव करते पंछी भरते उड़ान यही<br />
फ़ौज के जवानों के कमाण्ड में सजी हिन्दी |<br />
उष्ण रेत से झरती, हिम की ठण्डक में हिन्दी<br />
धरणी से उगती हिन्दी, मेघों से बरसती हिन्दी ||</p>
<p>वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
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		<title>भोर का तारा</title>
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		<pubDate>Thu, 13 Oct 2011 18:54:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[&#1093;&#1091;&#1076;&#1086;&#1078;&#1085;&#1080;&#1094;&#1080; &#1085;&#1072; &#1080;&#1082;&#1086;&#1085;&#1080;कोई कलरिंग -किताब नहीं है बाल-मन जिसमें भर देंगे आप अपने मनचाहे रंग &#124; उसके अन्तस से प्रस्फुटित होंगे रंग-बिरंगे सतरंगी नवरंगी ढेरों रंग &#124; बहने दो ना रंगों की सरिता में उसे उभरने दो ना उसकी आत्मा में चाहत के रंग &#124; बाल-सुलभ उड़ान को भर लेने दो बाँहों में आसमान फिर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font style="position: absolute;overflow: hidden;height: 0;width: 0"><a href="http://xn--h1aafme.net/%E7%E0-%E0%E2%F2%EE%F0%E0">&#1093;&#1091;&#1076;&#1086;&#1078;&#1085;&#1080;&#1094;&#1080; &#1085;&#1072; &#1080;&#1082;&#1086;&#1085;&#1080;</a></font>कोई कलरिंग -किताब नहीं है बाल-मन<br />
जिसमें भर देंगे आप अपने मनचाहे रंग |<br />
उसके अन्तस  से प्रस्फुटित होंगे<br />
रंग-बिरंगे सतरंगी नवरंगी ढेरों रंग |<br />
बहने दो ना रंगों की सरिता में उसे<br />
उभरने दो ना उसकी आत्मा में चाहत के रंग |<br />
बाल-सुलभ उड़ान को भर लेने दो बाँहों में आसमान<br />
फिर देखो कैसे निखर कर आएंगे रंग |<br />
उसके पसंदीदा रंगों से भरें उसका दामन<br />
सँभालकर रखें आप अपने पसंदीदा रंग |<br />
चहुँ ओर के रंगों में अटका बाल-मन<br />
चुननें दें उसे प्रकृति से स्वप्निल रंग |<br />
अंतरिक्ष में उकेरेगा वह इक नया आसमाँ<br />
बिखेरकर अपने अंतस के इन्द्रधनुषी रंग |<br />
ज़मीं पर चमचमाता भोर का तारा बाल-मन<br />
तूलिका से रंगेगा गगन में ,अरुणिम भोर  का रंग | |<br />
वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
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		<title>चूड़ियों की प्यास</title>
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		<pubDate>Thu, 13 Oct 2011 07:04:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[The glass- bangles wanted to be adored but someone broken them with crueality.A vendor put the broken ones in his cladioscope and pleased the kids with the show.The broken -bangles now contented to pleased the lill kids.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>रंग-बिरंगी चूड़ियों ने गीत गा सजाई कलाई<br />
खन-खन करतीं ,खुशियाँ बिखरा इतराईं |<br />
पर,जब भी बेरहमी से मरोड़ी गई कलाई<br />
सर्द आहों से शरारे उठे ,हुई रुसवाई |<br />
मिलन में ही विरह की चादर ओढाई<br />
इंसानियत यह देख ,ज़ार-ज़ार शरमाई |<br />
सजी इतराती थी जो नरम कलाई पर<br />
चटक कर टूटी &#8211; रोई, हुई ना सुनवाई |<br />
प्रलाप सुन मदारी ने टूटे टुकड़ों का<br />
हर टुकड़ा प्यार से सहेजा , की चतुराई |<br />
जीने का सबब उन टुकड़ॉं में ढूँढ<br />
कलाइड़ियोस्कोप में बंदकर की कमाई |<br />
तरसी थीं जो साजन के प्यार के लिये<br />
नन्हे चेहरों पर हँसी बिखेर मुस्काईं |<br />
टुकड़ॉं में जुड़कर, नवरंग बिखेरकर<br />
नवरूप से सज ,चाहतों की दुकान सजाई |<br />
अधूरी पूर्णता में पनपी थी जो प्यास<br />
अस्तित्व मिटा ,खुशियाँ बाँट प्यास बुझाई |<br />
टूटन की चुभन अंतस में थी जो कुलबुलाई<br />
नित नव-रूप सजा ,नन्हे-मन लुभा हर्षाईं | |<br />
                                               वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
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		<item>
		<title>तुरपाई</title>
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		<pubDate>Sun, 09 Oct 2011 10:09:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[A woman tortured by the so called relationship.Shes been raped by her own family.She cries n asks for mending of a torn heart.      ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सर्द झोंकों से बचने के लिए बदन पर चीड़ के पेड़ों की छाल लपेटे &#8216;पाइन लाँज&#8217; पहलगाम से चंदनवाड़ी जाते हुए जो पहला पुल लिदर दरिया पर आता है , उसके दाईं ओर स्थित है | चारों ओर बिखरी हरियाली के विभिन्न शेड़्स से भी चटकीला हर रंग है उसकी छतों का | ड़बल-स्टोरी बिल्ड़िंग -जिसके पाँच कमरे नीचे एक ही कतार में , और पाँच ही ऊपर हैं | लाँज के दूउउर तक फैले घास के मैदान उत्तर की ओर जा तिकोन हो जाते हैं | पूर्व की ओर सीधे खड़े पहाड़ की तराई से होते हुए उत्तर में ये ढेरों अखरोट के पेड़ दामन में समेटे , ऊबड़-खाबड़ धरातल बनाते हुए शेषनाग झील से आती बर्फीली वेगवती धारा जो अबशार बनी पर्वतों से धरा पर उतर रही है, उस तक जाकर समाप्त हो जाती है &#8212;एक स्वर्गिक आभा और अनुपम सौन्दर्य का एहसास जगाते हुए | मध्य में लाँज से तकरीबन बीस कदमों की दूरी पर सेव के बड़ॅ- बड़े पेड़ ; जो कि सेवों से लदे हुए हैं | उन पर झूले ड़ले हुए हैं | बरबस ही राह चलतों का ध्यान उस ओर खिंचता है | सैलानीगण सेवों के साथ फोटो खिंचवाने का लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं | अंततः चौकिदार से पूछकर कई लोग भीतर आ फोटो खिंचवाते, सेवों का स्वाद चखते वा उन पर पड़े झूलों पर झूल भी जाते हैं |उनके खिले चेहरे इस बात की गवाही देते हैं कि उनका कश्मीर आना अब सार्थक हो गया है |यही मेन रोड़ का आखिरी बड़ा गेट और साथ ही लगता छोटा गेट है|(&#8212;जिससे वो आती -जाती थी , चौकीदार से बिन पूछे )<br />
इन्हीं सेव के पेड़ों से छनती आती धूप के नीचे पलंग ड़लवाकर कोई न कोई पुस्तक पढना मेरी दिनचर्या में मौसम के अनुकूल शामिल है | हल्की सी मीठी थपकी देती बयार कभी -कभी मुझे नींद की आगोश में भी ले जाती है |कभी कोई पक्षी चोंच मारकर सेव गिराता है मुझ पर, तो चौंक कर उठकर बैठ जाती हूँ |तो कभी तेज हवा के झोंकों से पत्तों की सरसराहट , उनका नृत्य करना मुझे मुग्ध किए रहता है | कभी पहाड़ों की गोद में अठखेलियाँ करते बादल | लेकिन इधर कुछ दिनों से एक बकरवाल(गुज्जर) लड़की , गोद में नन्हा बच्चा उठाए चुपचाप चौकीदार से पूछे बिना छोटे गेट से भीतर आ उत्तर की ओर नदी की ढाल बने पत्थरों पर आकर बैठ जाती है | मैं पढती या कुछ लिखती उसे कनखियों से देख लेती हूँ | कभी वो बच्चे को घुटनों पर बैठाकर खेलती, कभी अपनी छाती से लगा उसकी भूख मिटाती तो कभी दोनो वहीं घास पर लिपटकर कुछ घड़ी की झपकी ले लेते | मैं देखकर भी अनदेखा कर देती हूँ | लगता , वह चैन से कुछ घड़ियाँ अपने बच्चे के साथ जी रही है &#8211;यह उसका अधिकार है | शायद -एक नारी का दूसरी नारी के प्रति यह सहज भाव है !<br />
उस दिन मैं Paulo Coelho की &#8220;The Alchemist&#8221; बड़ी तल्लीनता से पढ रही थी , कि लगा मेरे करीब कोई है |नज़रें ऊपर उठाईं तो वही बकरवाल लड़की बच्चा उटाए कह रही थीः &#8220;बीबी ! अज मैं खान नूँ कुज नईं लयाई, कुज खान नूँ दे दे | बड़ी पुक्ख लग्गी ए &#8220;(आज मैं खाने को कुछ नहीं लाई, कुछ खाने को दे दे , बड़ी भूख लगी है) देखती हूँ-एक पीला ज़र्द चेहरा मेरे सम्मुख है , जैसे उस चेहरे पर सदा से कोई पीड़ा अपना आधिपत्य जमाए हुए हो | उसे बैठने को कह मैंने नौकर से खाना मँगवाया | खाना लेकर वो वहीं पत्थरों पर चली गई | खाना खाकर वहीं पास बहते दरिया से बर्तन धोकर , मेरे पास पड़े मेज पर<br />
रख कर ; वहीं मेरे पायताने ज़मीन पर बैठकर मुझे निहारने लग गई |<br />
लगा, उसमें मुझसे बात करने की ललक उठी थी क्योंकि हमारे बीच प्रतिदिन न बात करते हुए भी शायद भीतर ही भीतर एक निस्पँद संवाद  चल रहा था |जिससे एक अपनत्व बन गया था , हम दो अजनबियों के बीच | सब समझते हुए भी मैंने उसे अनदेखा करते हुए पढने का उपक्रम किया |<br />
&#8220;बीबी ! ऍ जगह तेरी ए?&#8221;&#8211;मैंने &#8216;हाँ&#8217; में सिर हिला दिया उसे बिन देखे ही | पुनः बोलीः &#8220;बच्चे नई ने?&#8221; ( बच्चे नहीं हैं क्या?) इस पर मैंने किताब से नज़रें हटा ही लीं , और जवाब दिया कि वे ब्याहे गए हैं| अपने-अपने घर हैं |यहाँ हम दोनों और ये सब नौकर हैं |और पूछा, &#8221; तूँ कहाँ से आई है?&#8221;<br />
उसने हमारे पूर्व की ओर की पहाड़ी की ओर इशारा कर बताया कि वहाँ ऊपर उनका ड़ेरा है | वे खाना-बदोश हैं , जो भेड़ -बकरियों को नई-ताजी घास खिलाने के लिए पहाड़ों पर घूमते रहते हैं | पीछे &#8216;अख़नूर&#8217; से आए हैं | तभी मैने ग़ौर से पूर्व की झाड़ियों में पहाड़ के दामन में ढेर सारी काली-सफेद भेड़- बकरियाँ घास व नए पत्ते चरते देखीं |<br />
        इस पर वह झट बोली, &#8220;इन्दी ही राखी कर रईयाँ | परों कोई इक बकरी ही खा गया |पता कि -कोई जनावर सी कि मनुख? हाँ , बकरी दी टँगा दरया ते कुत्ते खाँदे सी ,ओई दिखया | &#8221; ( इनकी ही रखवाली कर रही हूँ | परसों कोई एक बकरी ही खा गया |मालूम नहीं कोई जानवर था कि मनुष्य ?हाँ, बकरी की टाँगें नदी किनारे कुत्ते खा रहे थे &#8211; यही दिखा |)उसकी बात सुन मैं हैरान कि इस पहाड़न की धारणाएं कितनी सचेत हैं | इसे भी जानवर और मनुष्य में एक जैसे गुण दिखे , तभी तो दोनों को एक ही तराजू के पलड़ों में तौल रही है |मैंने अफ़सोस जताया जो शायद उसे तसल्लीबख़्श लगा | इसपर वो एकदम से उठी , पीठ पर चुन्नी बाँध कर बच्चे को उसमें ड़ालकर सामने की सीधी पहाड़ी पर टेढी चढकर भेड़-बकरियों को ऊपर की ओर हाँककर , वापिस आ छोटे &#8211; गेट से बाहर चली गई |मुझे अपने ख़्यालों में उलझाकर&#8212;<br />
               अगले दिन खाना खाकर किताब हाथ में ले मैं साथ लगते दरिया के बर्फीले पानी में पैर ड़ालकर वहीं पड़े बडे से पत्थर पर ओशो की पुस्तक को पढने बैठी , तो कुछ देर में ही मेरे पैर ठंड़ से सुन्न हो गए | पैर पानी से बाहर निकाल मैं किताब बंद कर चट्टानों से टकरा कर चाँदी का रूप धरती जल की धाराओं को निहार रही थी कि लगा कोई मुझे देख रहा है | वही थी , कौतुहलता से भरी दृष्टि मुझ पर गड़ाए हुए | उसे देख मुस्कुराते हुए पत्थरों पर चढकर मैं इस पार आ , पत्थर पर बैठ गई | वह वहीं नीचे के पत्थर पर मेरे पास आ बैठी थी | सहज भाव से मैंने पूछा, &#8221; नाम क्या है तेरा? &#8221;<br />
बोली, &#8220;शबनम&#8221; | (नाम मुझे अच्छा लगा )<br />
&#8221; मर्द का क्या नाम है ? वो कहाँ है? वो क्यों नहीं आता ?&#8221;<br />
बोली, &#8220;नूरा! नूरा आसी न! हुणे ताँ दोए कोड़े लै के ड़ेढ मीने लई अमरनाथ गया ए | देहाड़ी दे दो हजार कमाई करसी | परों तो इस वरे ढेर यात्री आया ए | चंगी कमाई हो जासी | &#8221; ( नूरा! नूरा भी आएगा | अभी तो दोनो घोड़े लेकर ड़ेढ महीने के लिए अमरनाथ गया है|   एक दिन के दो हजार कमाई करेगा | पिछले वर्ष से इस बार अधिक यात्री आया है | अच्छी कमाई हो जाएगी | )<br />
फिर घर में कौन-कौन हैं ? -मैने पूछा |<br />
&#8220;इत्थे कर विच सौरा ए | देर-दराणी अख़नूर ने | ओत्थे ड़ंगरां नूं ते , नाल मक्की होर जमीन वेखदे ने | &#8221; (यहाँ घर में ससुर है | देवर-देवरानी अख़नूर में हैं | वहाँ गाय-भैंस , फसल और ज़मीन की रखवाली करते हैं |)<br />
    जो भी था, पर इस लड़की के पास से बाकि बकरवालों की तरह भेड़-बकरियों की बदबू नहीं आ रही थी , वह साफ -सुथरी थी | सो बात हो पा रही थी | लगा, पति की अनुपस्थिती में इसका वक्त यहाँ गुज़र रहा है-अच्छा ही है|मैं उठकर लाँन की ओर आ गई | वो भी सदा की तरह छोटे -गेट से बाहर ये गई कि वो गई |<br />
 एक दिन दोपहर के खाने में राजमा चावल बने तो उसका ख्याल आ गया |राजू को बोला कि उसके लिए भी रख देगा | आती ही होगी, खा लेगी | अब तो हर दिन मुझे उसका इंतज़ार रहता था |वो आई | उसने चाव से खाना खाया और बर्तन धोकर रख दिए | फिर मेरे पैरों के पास आकर वहीं ज़मीन पर बैठ गई |<br />
&#8220;टँगाँ कुहट दयां बीबी ?&#8221;( टांगें दबा दूँ बीबी?)&#8211;बोली |<br />
मैंने &#8216;ना&#8217; कहते हुए झट से पैर ऊपर पलंग पर कर लिए |<br />
खाने के बदले में शायद वो कुछ करना चाह रही थी | जो मुझे गवारा नहीं था | प्रत्युत्तर में उसके होंठ खुले फिर बंद हो गए | शायद शब्द हलक तक आकर अटके जा रहे थे | उसके चेहरे पे आते-जाते भावों को पढकर लगा जैसे उसके भीतर कोई अन्तर्द्वन्द्व चल रहा हो | मैंने पूछ ही लिया, &#8221; कुछ कहना है क्या?&#8221;<br />
सारे जिस्म का दर्द अपने चेहरे पे समेट वो आँखों की पोरों से झरने लगी | साथ ही सुबकियाँ लेते हुए मेरे घुटने कस कर पकड़ के वह फट पड़ी लगी,<br />
&#8221; मेरा पल्ला ताँ फट के तार-तार हो गया ए बीबी ! हुण कौण करसी तुरपाई?&#8221;<br />
मैं हैरान-परेशान हो उसका मुँह तक रही थी |उसके कंधे पकड़ उसे ठीक से बैठाया व पूछा, &#8221; क़्यों ?क्या हो गया है ऍसा कि तेरा आँचल फट कर तार-तार हो गया है, और तुझे तुरपाई की चिन्ता हो रही है ?&#8221; साथ ही सोच रही थी कि कैसे मानूँ यह अनपढ , गँवार है |कितनी सुन्दर व कटु अभिव्यक्ति है इसकी !  &#8216;बोल न शबनम&#8211;!&#8217;-मैंने फिर कहा| मेरे स्नेहपूर्ण आग्रह से अभिभूत हो वह पिघल उठी | मानो पैर की बवाई फूट रही हो और वह असह्य पीड़ा से छटपटा रही हो | बोली, &#8221; मेरा मर्द घर नई ए ,बीबी ! तैनूँ दसया सी न! ओदे पिच्छों मेरे सौरे ने मैंनूं जबरदस्ती इस्तेमाल करना शुरू कर दित्ता ए | कैंदा&#8211;ओ कित्थे जावे?<br />
कर दी ही गल्ल ए तैनूँ कि फ़रक पैसी? तेरे नाल ते मरद ही होसी न,<br />
तूँ अक्खाँ नूटी रक्खीं |नूरे दे वापस आण ते मैं कदे तेरे कोल नई आवाँगा | तूँ जुबान बंद रक्खीं |बस चल्लड़ दे |&#8211;मैं की कराँ बीबी ?मेरा पल्ला ते फट गया ए न ! छोटी सी ताँ माँ करदी सी तुरपाई, हुण ऍदी तुरपाई कौण करसी? दस्स न बीबी !!!&#8221;<br />
( बोली, मेरा मर्द घर पर नहीं है, मैंने तुझे बताया था न! उसकी अनुपस्थिति में मेरे ससुर ने मुझे इस्तेमाल करना शुरू कर दिया|कहता है वो कहाँ जाए ? तुझे क्या फर्क पड़ता है? तेरे साथ तो मर्द ही होगा न! तूँ आँखें बंद रखना |नूरे के वापिस आ जाने पर मैं कभी तेरे नज़दीक नहीं आऊँगा |तूँ अपनी जुबान बंद रखना | तबतक ऍसे ही चलने दे &#8212;अब मैं क्या करूँ बीबी ? मेरा आँचल तो फट गया न! छोटी थी तो कपड़े फटने पर माँ सी देती थी , अब किसके पास जाऊँ? बता न कभी हो सकती है इसकी सिलाई? बीबी !!)-इतना कह वह छाती पर मुक्के मारकर विफरने लगी | उस की पीड़ा से तड़प मेरी भी आँखें सजल हो उठी | मेरी आलोड़ित होती संवेदना उसके दर्द की संवेदना से संपृक्त होने को आतुर हो उठी | उसे स्नेह से पकड़कर मैंने अपने पास बैठाया| मैंने हथियार ड़ाल दिए | क्या कहूँ&#8211;? क्या करूँ&#8211;? कैसी सलाह दूँ&#8211;? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था | एक ब्याहता अपना सर्वस्व अपने पति को ही मानती है ,उसमें किसी और की गुँजाइश ही कहाँ होती है? फिर जो रिश्ते से आदर योग्य , भरोसे योग्य , रक्षक हो वही खेत की बाड़ बनकर खेत को ही खा गया हो तो किससे गिला कीजे?किसका भरोसा कीजे? मुझे लगा जैसे सम्पूर्ण नारी-वर्ग एक संवेदनशील<br />
प्राणी न होते हुए एक निर्जीव-वस्तु है, जिसे ज़रूरत पड़ने पर कोई भी इस्तेमाल करे और फिर&#8211;छोड़ दे | ऍसे क्रूर सामाजिक यथार्थ के समक्ष<br />
हम हार जाते हैं| हमारे हाथ बँध जाते हैं | हम नकारे हो जाते हैं |पुरुष<br />
-जाति के प्रति मेरा मन वितृष्णा से भर उठा | कई दम्भी पुरुष सारे नारी-वर्ग के लिए असहिष्णु बने रहते हैं | अपनी बेबसी भरी रातों का<br />
दर्द सँभाल वह अपने फटेहाल आँचल को मेरे पास लाकर &#8216;तुरपाई&#8217; की गुहार लगा रही थी |<br />
   मैं उसका पीड़ा से मथित चेहरा पढ रही थी | औरत ना होकर जैसे वो एक उतरन बन गई थी |सोच रही थी- इंसान भूखा भेड़िया बन गया है , तभी तो अपनी भूख और हवस मिटाने को वो इतना नीचे गिर पाता है | मैं केवल शबनम का दर्द साँझा कर सकती थी क्योंकि वे अंजान लोग थे | मेरी असमर्थता वो भी समझ रही थी , तभी तो वो अचानक उठ खड़ी हुई, रोज की तरह | बच्चे को पीठ पर बाँध , अपनी भेड़-बकरियाँ हाँक फटाफट छोटे -गेट से बाहर चली गई |मानो कुछ हुआ  ही ना हो | बस, दिल हल्का कर लिया था उसने, एक नारी की पीड़ा को दूसरी नारी से साँझा करके | मेरी दृष्टि दूर तक उसका पीछा करती रही पर , वो फिर कभी वापिस नहीं आई |मैं हर दिन छोटे- गेट पर नज़र टिकाए उसकी राह तकती थी |<br />
      हाँ, कुछ दिनों बाद एक सजीला ,गठीला गबरू बकरवाल उन्हीं भेड़-बकरियों को हाँकने छोटे -गेट से भीतर आया | मैं समझ गई यही मेरी शबनम (अपनी लगने लगी थी ) का नूरा है | तभी मेरा उद्वेलित मन शान्त हो गया | लगा अब वक्त के साथ-साथ नूरा कर देगा उसकी &#8216;तुरपाई&#8217; | </p>
<p>वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
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		<title>दहलीज़</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Sep 2011 05:22:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[Inquisitiveness is a natural instinct, but it troubles a lot to a kid. They can not digest the changes in daily life.When adolesence knocks to their door step they just astonished.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>  उसके धूल-धुसरित छोटे-छोटे नँगे पाँव हरी-ताज़ी दूब पर लाँन में यहाँ से वहाँ भाग रहे थे | दोनो हाथ सामने की ओर फैल चुपके-चुपके तितलियों को पकड़ लेने की भंगिमा में खुले हुए प्रयत्नशील थे | कितना कौतुक&#8212;!,कितना उत्साह&#8211;, उतनी ही चपलता थी उसके हाव-भाव में | बेखबर थी वो आसपास से |खिले फूलों पर ही तितलियाँ क्यों मँड़रा रही हैं? क्या करती हैं ये उन पर बैठकर? माँ कहती है, &#8216;रस चूसती हैं फूलों से &#8216;|वो खोजती है , कहाँ है रस ? वह गुलाब की एक-एक पँखुड़ी तोड़कर रस ढूँढती है-नहीं पा सकी वो रस |माँ भी तो उसे ,&#8217;मेरी गुलाबो&#8217; कहती है |वो भी तो फूल सी है, तो फिर ये उस पर क्यों नहीं मँड़राती हैं ? ये उसके हाथों से क्यो ड़रती हैं ? वह तो उनके रंगों को छूकर दुलारना चाहती है | बस इतनी सी बात भी नहीं समझती हैं ये | हैरान व परेशान है बाल-मन ! कौतुहलता है !!!!<br />
       थक हार कर धरिणी पर ही पसर जाती है | उसे धूप से बचाता , छाँव देता पास ही खड़ा वृक्ष मुस्कुरा उठता है | सोचता है , फूल खिलते हैं -मुर्झा  जाते हैं , लेकिन इनका आकर्षण बाल-मन, प्रेमियों, भक्तों, भँवरों और तितलियों आदि को लालायित किए रहता है | वृक्ष तो सन्नाटों के पहरेदार बने सब लीलाओं के दृष्टेता हैं | गवाह हैं ये वहाँ घटी सब घटनाओं के | इस नन्ही जान को नित बाग़ में दौड़ते देख वह भी मन भरमाए रखता है |<br />
        उस दिन उसके साथ ढेरों सखियाँ थीं |सभी नवरात्रि की कँजकें&#8211;!सब के माथे पर लाल सिन्दूर की बिन्दी और कलाई पर लाल धागे बँधे थे | उनकी खिलखिलाहट से बहार आ गई थी |उन्हें देख ढेरों तितलियाँ भी उन्हें रिझाने आ गईं थीं | वे आपस में लुका-छिपी खेल रही थीं| किलकारियों से गूँज उठा था सारा माहौल | हमजोलियों के संग उसकी खुशी असीम थी |सब इधर से उधर बेपरवाह दौड़-दौड़कर तितलियों को पकड़ने का यत्न भी कर रही थीं |<br />
       जब आम का बौर झरा तो कच्ची कैरियों ने बाल-मनों को ललचा दिया | उसे भी कैरी की मिठास भाती, वह भी सखियों संग छुप-छुपकर  कच्चे आम खाती थी | माली को दूर से ही आते देखकर सब शैतानी से भाग जातीं |उसके डर से भागने का मज़ा ही कुछ और था | पेड़ों पर झूले पड़ गए थे | मधुमक्खी के छत्ते की तरह ढेरों कन्याएं आ जाती थीं, पींगें चढाने | अपनी पारी आने पर इसकी बाँझें खिल जातीं |इसमें एक नया जोश आ जाता था | उनका अनुसरण कर वह भी शारीरिक प्रवाह बढाती, उसमें अनोखी ऊर्जा भर जाती |और पीछे छूट रहा था तितलियों का आकर्षण -उसका स्थान ले रही थी पींग ऊपर चढाने की उमंग !झूले की  उडान उसे इतनी ऊपर ले जाती कि उसके मन में आसमान छूने की ललक जाग उठती | कल्पनाओं की उड़ाने आकाश में उड़ती पतंगों की डोर बन जातीं |<br />
 डोर&#8211;! डोर जो ऊँची उठकर कभी भी कटकर , कहीं भी गिर जाती है | पतँग की ऊँची उड़ान को ज़मीन की भेंट चढाकर | अदृश्य व अनिश्चित मंज़िल का जामा पहनाकर पींग धीरे-धीरे वापिस आ ठहर जाती , अपनी धरा पर | और ठहर जाती &#8211;उसके संग ही उसके कोमल मन की उड़ान !<br />
     रात&#8211;छत पर बिस्तर में लेट , मुग्ध हो वह अनगिनित जगते-बुझते  रोशनी के पुँज तकती | उनका अनुसरण कर अपनी पलकों को भी कभी खोलती तो कभी बंद करती | सोचती , वो भी इस विराट का हिस्सा इक टिमटिमाता तारा है | उसके भीतर से भी प्रकाश की किरणें<br />
फूटकर  जगमग-जगमग कर रही हैं | सप्त-ऋषियों को तारों के झुंड़ में  खोज , वो उनका आकार हथेलियों पर बनाती | ध्रुव तारे की कहानी दादी ने सुनाई थी | उत्तर दिशा में उसे वो श्रद्धा से नमन करती | चाँद&#8211; हाँ , चाँद को निहार कर वो बाँवरी हो जाती थी | खोजती , पर चरखा कातती बुढिया उसे दिखाई नहीं पड़ती थी | हर रात चाँद का आकार बदलता देखकर वह अपने आकार को दर्पण में निहारती | वो भी तो माँ की &#8220;चँदा &#8221; है | उसका आकार भी तो बदल रहा है | लेकिन चाँद की भाँति एक माह पश्चात उसका आकार पुनः वैसा ही नहीं हो जाता | वो तो निरंतर बदल रही है शायद!!<br />
       पिछवाड़े मुर्गियों का झुंड़ हरियाली में भागता है | उनका लीडर मुर्गा जोर से बाँग लगाता है&#8217; कुकड़ू कूँ&#8217; ! मुर्गीखाने में बैठी मुर्गी जैसे ही बाहर आकर &#8216;कद्दैं-कड़ैं &#8216;का शोर मचाती है ,तो वह दूर से दौड़ी जाती है , उसका अंडा देखने | कहाँ से आ जाता है मुर्गी के नीचे अंडा ? हैरान होती है | कौतुहलता है कि मुर्गा वहाँ जाकर क्यों नहीं बैठता ? वह अंडा क्यों नहीं देता ? ढेरों प्रश्न छोटे से दिमाग़ को परेशान कर देते हैं | लेकिन कुछ ही पलों में वो भूल जाती है- यह प्रश्नों का सिलसिला | रोज़<br />
ही सोचना, हैरान होना , उत्सुक होना और रोज  ही भूलना &#8211;यही क्रम चलता रहता है |<br />
     उसके भीतर एक सूरज का प्रकाश प्रतिदिन आलोकित होता है | प्रकाशमय कर देता है भीतर के अंधकार को |कब आई आँधी , कब पत्ते झर गए, परिसर भर गया धूल व पेड़ से टूटे पत्तों से &#8211;उन्हें झरता देख<br />
उसका मन क्यों दुखता है? उसे लगता, वृक्ष रो रहा है | असमय की टूटन वह सह नहीं पाती | पिछवाड़े की सीढियों पर बैठ अकेली वह वक्त की दौड़ती रफ्तार को बाँधने का यत्न करती | माँ की ड़ाँट मन पर चोट कर जाती है | समझ नहीं पाती कुछ | &#8220;अकेली मत जाना सहेलियों के घर , अब तुम छोटी नहीं रही | &#8221; अब और तब (जो बीत गया है) उसके बीच के अन्तर को समझने का यत्न विफल हो जाता है | गुड़े-<br />
गुड़िया का ब्याह तो वो अभी भी रचाती है सब सखियों के संग | वो तो ब्याह कर भी उसके संग रहते हैं | पर सामनेवाली दीदी ब्याहकर रोती हुई दूर चली गई है |न जाने क्या गोल-माल है ? बहुत परेशान है&#8211;!<br />
    त्यौहारों पर उसे काँच की चूड़ियाँ पहनने का बहुत शौक है | टूटी हुई चूड़ियाँ बटोरकर ऊपर छत पर वो उनको जोड़-जोड़कर  फूलों के ड़िज़ाईन बनाती है , पर भैय्या आकर सब बिगाड़ देता है | कितना भला लगता था न ; रात को भैय्या के साथ गलबैंय्यां ड़ालकर सोना ! लेकिन माँ ने अब अलग बिस्तर लगाने शुरू कर दिए हैं |वैसे तो अच्छा है भैय्या की टाँगें  और नहीं खानी पड़ॅंगीं |<br />
उसके भीतर कोलाहल मच जाता है जब बंद कमरे से तरह-तरह की आवाजें आती हैं | भीतर झाँकने का प्रयत्न करती है , लेकिन अँधकार अपने में सब लील लेता है |आख़ीर चाचा-चाची दरवाजे के भीतर शोर क्यों करते हैं ? प्रश्नों की कतार फिर उसके भीतर कोलाहल मचाती है | चाची अस्पताल जाकर छुटकी मुनिया ले आई है | वो भी अपनी एक मुनिया लाना चाहती है | उसे क्यों कोई मुनिया दिलाने अस्पताल नहीं ले जाता ? बेबसी में रास्ते खो गए हैं ! वो जाए भी तो किधर&#8211;? कुछ नहीं सूझता !<br />
        रानी ने स्कूल में बताया कि अब वह बड़ी हो गई है , इसलिए उसके घर अगले हफ्ते उसकी पूजा है,  उस दिन वो स्कूल नहीं आएगी |<br />
उसने भी घर आ माँ से पूछाः&#8221; माँ! मेरी पूजा कब होगी?&#8221;<br />
माँ ने अर्थ भरी मुस्कुराहट चेहरे पर लाते हुए कहाः &#8216;हमारे में पूजा का रिवाज़ नहीं है |  हाँ , तुम्हे दूर बैठा दिया जाएगा | खाना भी वहीं मिलेगा | पर अभी नहीं , बड़ी होने पर !&#8217;<br />
बड़ा होना&#8211;क्या अभिशाप है? नहीं होना उसे &#8216;बड़ा&#8217; | दादी ने कहानी सुनाई&#8211;&#8217;पारो बड़ी हो गई थी | पारो ने चूड़ीवाले से चूड़ियाँ चढवाईं |<br />
वही चूडियाँ उसे डस गईं | &#8216;साँप तो डसता है, लेकिन चूड़ियाँ डस गईं ?<br />
नहीं पार पा सकी वो इस कहानी का! परेशान है&#8212;!और,<br />
वह दिन भी आया , जब उसके भीतर का बचपन फट पड़ा | जवानी की दहलीज पर कदम रखकर बाहर निकलने के लिए | माँ ने उसे अलग बैठा दिया |खाना भी वहीं दिया, रानी की तरह पूजा नहीं करवाई | नवरात्रे फिर आए | घर- घर कंजकें बिठाई गईं | कंजकों में पहले वो पड़ौस के घरों से प्लेट में हल्वा, पूड़ी,काले चने और पैसे लेकर घर आती थी |गुल्लक में पैसे डालकर खुश होती थी | अब उसे माँ ने समझाया कि वो &#8216;कंजक&#8217; नहीं रही | वह बड़ी हो गई है , वह वहाँ नहीं बैठेगी | उसके पैर कोई नहीं पूजकर धोएगा अब |<br />
उसे नहीं भा रहा था, &#8221; बड़ा होना&#8221; | स्वच्छन्द हवा में साँस लेना अब नियंत्रित हो गया था |उसके गले में गुठली फँस गई लग रही थी , जो न निगलते बनती थी न थूकते !!<br />
                                                      वीणा विज &#8216;उदित&#8217;<br />
                                                        सितम्बर &#8216;११</p>
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		<title>अपूर्व पूर्णत्व</title>
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		<pubDate>Thu, 08 Sep 2011 04:32:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[A wife is never complete if her husband does not understand her fully.She wants a special place in his life to be adored.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>       भावनाओं को चोट पहुँचने से गार्गी को जो वेदना और कसक उठती ,वो एक अंधड़ बन जाती और फिर उसकी कलम की स्याही स्वंय को काग़ज पर मिटाकर एक कविता या नज़्म का रूप धरकर ही थमती |गार्गी छुप-छुपकर अपनी डायरी के कोरे पन्नों पर आत्मानुभूति के उदगार उकेरती रहती|घर-परिवार में सब कुछ होते हुए भी उसके भीतर एक रिक्तता बनी रहती |उसके भीतर की बेचैनियाँ उथल-पुथल मचाए रहतीं |जब भी काम से निपट वो निढाल हो बिस्तर पर पसरती तो उसमें बर्फ़ की ठंडक सी सिहरन सदा व्याप्त रहती |कभी किसी ने ध्यान ही नहीं दिया |ध्यान देता भी कौन ?पति तो व्यवहारिकता के स्तर पर जीवन जीते थे |भावनात्मक पहलू उन्हें छू तक नहीं गया था |घर का अस्तित्व तो केवल उनकी प्रतिदिन की जरूरतों के साथ बँधा था |उससे परे भी कुछ है ,यह जानने की शायद वो आवश्यकता ही नहीं समझते थे | दोनो बच्चे शिशिर और मूर्ति पहले पढाई-लिखाई फिर क्रमशः सैट होकर ,ब्याह कर दूर शहरॉं में जा बसे थे |उनका अपना जीवन, अपना संसार , अपना दायरा बन गया था |समय कहाँ था उनके पास भी औपचारिकता निभाने के सिवाय |<br />
        एक अकेलापन घेर गया था गार्गी को, जिससे उबरने के ढेरों माध्यम वो खोजती रहती थी | टी.वी आँन करके ;उसमें मन रमाने की सोच वह चैनल ही बदलती रह जाती थी | मन कहीं ठहरता ही नहीं था| हाँ कभी पुरानी फिल्मों के नग़में टी.वी पर चल रहे होते तो अतीत में घुसकर उसका कुछ वक्त गुज़र जाता था|एक दिन -किसी पुराने नग़में को सुनते हुए उसके भीतर से एक लय चली और उसकी उँगलियाँ मेज पर थिरक कर थाप दे संगत देने लगीं |<br />
अपनी थिरकती उँगलियों को देख उसे कुछ याद आया |गार्गी ने दसवीं के बाद टाइपिंग का कोर्स किया था |उसने सुना था कि कम्प्यूटर सीखने में इससे मदद मिलती है |तो क्यूँ न वो कम्प्यूटर ही सीख ले ? घर में कम्प्यूटर भी था , लेकिन  पतिदेव की सख्त हिदायत थी कि इसे मत छूना |मन में ललक तो उठी थी लेकिन&#8212;किया क्या जाए , दुविधा थी |<br />
      &#8221; जहाँ चाह, वहाँ राह&#8221; ! उन्हीं दिनों मूर्ति ममी-पापा के पास दो महीनों के लिए रहने आई, क्योंकि उसके पति राघव को किसी कोर्स के लिए अचानक यू.एस जाना पड़ गया था |गार्गी की तो मानो ईश्वर ने सुन ली |मूर्ति को सारा दिन कम्प्यूटर पर ही रहना होता था | माँ के आग्रह पर उसने उन्हें ई-मेल करना सिखा दिया | हिन्दी के लिए उनका रुझान देखते हुए हिन्दी फाँन्ट भी अपलोड कर दिया और याहू डाँट काँम पर अकाउंट खोल दिया | आज गार्गी को लगा कि मूर्ति ने अपने दूध का ऋण चुका दिया , माँ को जीवन की एक नई दिशा दिखाकर |उसने माँ के सम्मुख एक नया संसार खोलकर रख दिया था | गार्गी को जीने का एक सम्पूर्ण मकसद समक्ष दिख रहा था | उसकी अतृप्त -आकांक्षाओं को तृप्त करने का आधार सामने था उसके |अब वर्जनाएं टूट रही थीं |जैसे वेगवती धारा आगे बढने को बेचैन हो |<br />
             मूर्ति ने माँ से पहली ई-मेल भैया को भिजवाई| शिशिर की उसी पल जवाबी ई-मेल आ गई माँ के अकाउंट में |साथ ही फोन भी आ गया |उसे इस उम्र में माँ के उत्साह ने अभिभूत कर दिया था |उसे माँ पर गर्व हुआ |उसने मूर्ति को भी सराहा कि उसने माँ के जीवन में रंग भर दिए थे |गार्गी ने दामाद को भी ई-मेल भेजी |वह भी सासू माँ के इस ओर बढ्ते कदमों से बेहद प्रसन्न हुआ |<br />
       गार्गी की टाइपिंग के लिए यह चुन्नौतिपूर्ण कार्य था | जो उंगलियाँ बरसों से चूल्हे-चौके में लगीं अपनी थिरकन गँवा चुकी थीं , अब वो सक्रिय हो उठी थीं | एक रात सोने से पूर्व गार्गी कम्प्यूटर पर जा बैठी , पतिदेव ने देख लिया | वे गुस्से से बोले, &#8216; अरे तुम इसे क्यों छेड़ रही हो? यह बच्चों के खेलने की मशीन नहीं है |और खराब कर दोगी |&#8217;  पापा की आवाज सुन मूर्ति अपने कमरे से बाहर आई ,और बोलीः<br />
&#8220;पापा! ममी कम्प्यूटर चलाना सीख गई हैं |&#8221; लेकिन प्रत्युत्तर<br />
में वहाँ भावों का कोई उतार- चढाव नहीं था |<br />
     माँ की समझ व स्पीड देखकर मूर्ति प्रसन्न थी | गार्गी ने जब वहाँ अपनी पहली कविता लिखी , तो मूर्ति ने उसे डाँक्यूमेंट्स में सेव करना , साथ ही अन्य ई-पत्रिकाओं को प्रेषित करना भी सिखा दिया |इसी तरह दो महीने कब पूरे हो गए पता ही नहीं चला |मूर्ति चली गई, दे गई माँ को उसका अभीष्ट&#8212;!<br />
      गार्गी एक नए संसार में पदार्पण कर चुकी थी |उसकी बरसों से संचित भावनात्मक दौलत जो उसकी डायरी के पन्नों में कैद ; ज़िन्दा रहने को केवल साँसे ले रही थी, वह अब खुली हवा में साँस ले पनपने लगी थी और मुखरित हो उठी थी आने वाले युग के लिए |अपने घर में बहती विपरीत<br />
हवाओं से लड़ वो तेज कदम भरकर चलने का साहस जुटा रही थी |<br />
          गुग्गल-सर्च में जाकर गार्गी ने ई-पत्रिकाओं के नाम ढूँढे | एक-दो को उसने अपनी कविता व नज़्म भेजीं |प्रत्युत्तर में उसे प्रशंसकों की ई-मेल्स आईं |इससे उसका हौंसला बढ गया | अब उसे नई ई-मेल्स का इंतज़ार रहता |वो उठ-उठकर आधी -रात को स्टडी में जाती , ई-मेल्स चैक करती |वह आँन-लाईन रहने लगी थी | सर्फिंग करती, बैठे-बैठे डाक्यूमेंट्स निकालती, उनको बार-बार पढती &#8211;आनन्दित होती |उसे अब अकेले जीने में संतोष मिल रहा था |<br />
       किसी &#8216;श्यामल&#8217; की नई ई-मेल थी&#8211;&#8217;इतनी बढिया रचना के लिए बधाई स्वीकारें &#8216;| एक और प्रतिक्रिया, &#8220;मर्मस्पर्शी कविता के लिए बधाई !ऍसे ही लिखती रहिए | एक और&#8211;&#8221;प्रत्येक पंक्ति संवेदनापूरक अभिव्यक्ति से लबरेज़ है &#8220;| इतनी प्रतिक्रियाएं पाकर गार्गी स्तब्ध रह गई |उसने झट से कम्प्यूटर बंद किया व किंकर्त्तव्यविमूढ सी<br />
वही बैठी रह गई | आँखों से अविरल धाराएँ बह रहीं थीं खुशी के मारे | उसे लगा उसकी रचनाओ में कुछ तो है ,जो उसे पहचान मिल रही है ! उसकी लेखनी को लोगों ने परखा था, सराहा था | अगले दिन उसने सबको धन्यवाद लिखा और आरम्भ हो गया अनवरत सिलसिला | वह अपनी भावनाओं की दौलत सब से साँझी करने लग गई | साथ ही साथ उसकी पढने की प्रक्रिया भी शुरु हो गई थी | ई-पत्रिकाएँ खोलकर वह उच्चकोटि के साहित्यकारों व गुणी विद्वानों की रचनाएँ पढकर अपना ज्ञानभंडार बढाने में लग गई थी | उत्साह का सृजन होने से उसकी जीने की उमंग विभिन्न रचनाओं के संसर्ग में आलोड़ित हो उठी थी | जड़ हो चुके व नैराश्य से घिरे  दिमाग के कोने सजीव हो उठे थे | उनसे अप्र्त्याशित शब्द फूटने लग गए थे | देश -विदेश की ई-पत्रिकाओं को अपनी रचनाएं भेजकर वो यश पा रही थी ,कि तभी उसे लखनऊ से एक निमंत्रण-पत्र  मिला कि उसकी रचनाओं के लिए उसे पुरस्कृत किया जा रहा है |वे अगले माह स्वंय आकर सम्मेलन में अपना पुरस्कार लें |उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था&#8211;आज वो खुशी से भीतर तक सिहर उठी थी |उसने सोचा कि क्या यह उसके जीवन में संभव था ? वह पतिदेव से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी | उनका व्यवहार ऍसा होता था मानो गार्गी का दिमाग है ही नहीं | उनके लिए वो घरेलू काम-काज करने की मशीन थी केवल | लखनऊ जाकर पुरुस्कार पाने की बात तो दूर रही , उल्टे उन्होंने उसका उपहास उड़ाना था | लेकिन ख्याति पाना या पुरुस्कृत होना भी तो बहुत बड़ी बात थी , इसे वो नकार नहीं सकती थी |वो बेचैन हो उठी अपनी खुशी बाँटने को&#8212;<br />
       आखीरकार, उसने बेटी को फोन लगाया व उससे खुशी साँझी की |स्वभाविक प्रक्रिया थी&#8211;वह खुशी के मारे चीख़ ही पड़ी | उसे माँ पर गर्व हुआ, और उसी क्षण उसने पापा को आँफिस फोन लगाया व बधाई दी | वे परेशान से हो गए , कि सुबह वे आँफिस के लिए चले तो गार्गी ने उन्हें कुछ नहीं बताया |उसके चेहरे पर ऍसे कुछ भाव भी नहीं थे |फिर याद आया कि उन्होंने उस के चेहरे को गौर से देखा ही कहाँ था |एक मुद्दत ही हो गई थी ,उसके चेहरे को नज़दीक से देखे हुए |अपने पर उन्हें ग्लानि सी हुई |खैर , वे चुप ही रहे | घर आकर भी शान्त रहे , जैसे कुछ भी नया नहीं था वहाँ | गार्गी काम तो कर रही थी , पर पति की अवहेलना पर उसकी आँखें भीगी हुई थीं क्योंकि मूर्ति ने उसे बता दिया था कि उसने पापा को बता दिया है |<br />
          रात खाने के बाद उन्होंने उसे आवाज़ दी |वह काम निपटाकर उनके पास आई , तो उन्होंने उसके दोनो हाथ पकड़कर , उसकी आँखों में मुस्कुराकर प्रश्नसूचक भाव दिया |पति के चेहरे पर नटखट मुस्कान देख वह हतप्रभ हो पूछ उठी, &#8216;क्या बात है जी, ऍसे क्यों शरारत से देख रहे हॉ ?&#8217; तो उन्होंने उसे अपने पास खींचकर बैठा लिया| मुस्कुराकर बोले, &#8220;समझ नहीं सका कभी कि मेरे पास बहुमूल्य हीरा है, पत्थर नहीं | भई , तुम तो बड़ी छुपे-रुस्तम निकलीं |मूर्ति ने आज तुम्हारे बारे में ढेरों बातें बताईं |मुझे तुम पर गर्व है|<br />
बताओ कब जाना है लखनऊ?&#8221;<br />
       गार्गी की झोली में मानो सारे जहान के पुरुस्कार इतने से ही डल गए थे |लखनऊ अब उसके लिए कोई मायने नहीं रह गया था |जिस पूर्णत्व की प्राप्ति के लिए उसकी आत्मा बेकरार थी,  वह अपूर्व पूर्णत्व वह आज पा सकी थी |वह छलकती आँखों से पति के गले लग गई |दिल ने उसके कान में चुपके से कहा&#8211;&#8221;यही था न तुम्हारा अभीष्ट!&#8221;<br />
                                        वीणा विज &#8216;उदित&#8217;<br />
                                           ८सितम्बर &#8216;११</p>
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		<title>अनुमोदन</title>
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		<pubDate>Fri, 26 Aug 2011 11:43:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[&#1080;&#1082;&#1086;&#1085;&#1086;&#1075;&#1088;&#1072;&#1092;&#1080;&#1103;ज्यूं -ज्यूं इम्तिहान खत्म हो रहे थे,, कैली का मन अजीब ऊहापोह से घिर रहा था &#124;अब आगे क्या है? ग्रेजुएशन तक बचपन व जवानी का एक अहम हिस्सा सीधी लकीर पर चल रहा होता है &#124;कब बचपन ने मुँह मोड़ा ,कब जवानी ने आकर गलबैयाँ डाल लीं, पता ही नहीं चलता है &#124;लेकिन अब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font style="position: absolute;overflow: hidden;height: 0;width: 0"><a href="http://ikoni.eu/">&#1080;&#1082;&#1086;&#1085;&#1086;&#1075;&#1088;&#1072;&#1092;&#1080;&#1103;</a></font>ज्यूं -ज्यूं इम्तिहान खत्म हो रहे थे,, कैली का मन अजीब ऊहापोह से घिर रहा था |अब आगे क्या है? ग्रेजुएशन तक बचपन व जवानी का एक अहम हिस्सा सीधी लकीर पर चल रहा होता है |कब बचपन ने मुँह मोड़ा ,कब जवानी ने आकर गलबैयाँ डाल लीं, पता ही नहीं चलता है |लेकिन अब सम्मुख निर्लक्ष्य दिशाहीनता थी |जीवन के पिटारे में भाग्य ने उसके हिस्से में कौन सी राह चुन रखी है , किसे पता &#8211;? वो राह उसे सीधे मंज़िल की ओर ले जाएगी या फिर गिरते-पड़ते ठोकरें खाकर वो अपनी मंज़िल पा सकेगी ? विड़म्बना तो यह है कि अभी  तो &#8216;मंज़िल&#8217; ही तय नहीं है | वैसे जवानी में तो मन ढेरों कल्पनाओं के जाल बुनता रहता है | उसकी उड़ान की हदें जमाने से परे होती हैं |सो वह भी हवाओं में क्लैडियोस्कोपी जैसी रंग-बिरंगी तस्वीरें बनाती रहती |कभी वो ऊपर तो आसमां नीचे होता, तो कभी वो चाँद-तारों को मुटठी में बंद कर लेती थी |नदी की रवानगी में उसे सारा संसार संगीत की धुन पर थिरकता लगता था |जीवन की वास्तविकता से अभी वो अन्जान थी |उसके अचेतन मन में सिमटी पड़ी पुरानी यादें चेतना में आने के लिए संघर्ष कर रही थीं |उन्हीं से प्रेरित हो वो अपना लक्ष्य तलाश रही थी |<br />
     होस्टल में उसने बहुत मस्ती की थी |ममी-पापा की मौत एक हवाई- हादसे में होने के कारण उसके दादा-दादी ने उसे माँ-बाप की कमी नहीं महसूस होने दी थी| व बहुत लाड़-प्यार से उसे पाला था|हाँ इकलौते बेटे-बहू की आकस्मिक मृत्यु ने उन्हें तोड़ कर रख दिया था|दादू तो इस ग़म से ऍसे टूटे कि उनका नीचे का आधा शरीर लकवाग्रस्त हो गया था और वे व्हीलचेयर के होकर रह गए थे|कल्याणी उर्फ कैली को होस्टल भेजकर वे दोनों भी कम्यूनिटी सैंटर रहने चले आए थे |वहाँ रहनेवाले सारे संगी-साथी दुःखी व प्रताड़ित आत्माएँ थे, जो एक-दूसरे का दर्दॉ-ग़म साँझा करते थे |ये दोनों भी घर में अकेले रहक्रर पल-पल अपने दुःखों में जलने की अपेक्षा यहाँ सब के साथ प्रेम से जीते हुए ग़मों को भुलाए हुए थे |उनकी आशा की किरण थी उनकी पोती,&#8221;कैली&#8221;|<br />
   कैली ने दादू को फोन पर कहा था कि वो इम्तिहान के पश्चात एक हफ्ते के लिए अपनी दोस्तों के साथ &#8220;लाँस वेगास &#8220;घूमने जा रही है, तत्पश्चात उनके पास आएगी |वे दोनों उसकी खुशी में खुश थे |उनके पास पैसा बहुत था , वे उसे पैसे की कमी नहीं होने देते थे |कैली को आख्ररी क्षण न जाने क्या हुआ कि उसने अपना ट्रिप कैंसल कर दिया |अपने दादू-दादी के प्रति उसका कर्तव्य उसके अंतस को पुकार-पुकार कर सचेत कर रहा था कि अब उसे कर्तव्य-परायणता निभानी है |वक्त आ गया है कि वो उनको साथ लेकर अपने घर वापिस जाए और उनकी ज़िंदगी की बची-खुची घड़ियों को अपने स्नेह और दुलार से सींचे |यह संकल्प उसका मनोबल बन गया और फलस्वरूप घूमने &#8211; मस्ती करने की अपेक्षा उसने अपने बुजुर्गों के पास जाना उचित समझा |लाँस वेगस की बजाय वह सैनफ्रान्सिस्को से ट्रेन लेकर &#8220;ड़बलिन&#8221; (वहीं का एक हिस्सा) के लिए निकल पड़ी उन्हें सर्प्राईज़ देने |ऊ हूँ, उनको लिवाने और उनके सान्निध्य में एक नया संसार बसाने के ख़्वाब संजोए&#8230;&#8230;<br />
     ड़बलिन के कम्यूनिटी -सैंटर पहुँचकर उसने रिसैप्शन पर साईन किए और दूर से ही छिपकर परिस्थिती का जायज़ा लेने का प्रयत्न करने लगी |ढेरों बुजुर्गों के मध्य अपने दादू-दादी को जोर-जोर से हँसते देखकर उसका मन बल्लियों उछल पड़ा |यह सब देख उसके मन में व्याप्त उदासी व चिन्ता की परछाइयाँ धुँधली हो चलीं और चेहरे पर मीठी मुस्कान ने आधिपत्य जमा लिया |दादी जैसी एक स्त्री किसी मैग़ज़िन से शायद चुटकुले पढकर सुना रही थी , जिन्हें सुनकर दादू व अन्य खिलखिलाकर हँस पड़े थे |कि तभी एक बैल बजी |इससे पहले कि कैली अचानक उपस्थित हो उन्हें चौंका दे, वे सब सैंटर के गार्ड़न की ओर चल पड़े थे |दादी ने एक सिद्धहस्त की तरह व्हीलचेयर का हैंड़ल बाहर की ओर घुमा दिया | उनकी साथिन ने (जो अमेरिकन थी )स्लोप से नीचे उतारने में उनकी मदद की |जात-पात से परे वो सब वहाँ एक ही कैटेगरी के थे |जो थी &#8216;बुजुर्ग&#8217;!..एक- दूसरे के हमदर्द |इससे कैली भाव-विह्वल हो उठी |उसके आने के मकसद को जैसे सार्थकता मिल गई थी |<br />
     उदासी और खुशी के मिले-जुले भावों से नम हो गई अपनी आँखों को उसने मुस्कुराहट की चादर ओढा दी |और झट से आगे बढकर दादू की व्हीलचेयर को थाम लिया |कैली को इस तरह अप्रत्याशित रूप से अपने सामने पा, दादू हर्षातिरेक से चीख ही पड़े,&#8221;ओह माय गाँड़ ! माई बेबी इज़ हिअर! आई कैन नाँट बिलीव इट&#8221;! दादी ने तो आगे बढकर उसे बाहों में भर लिया |उन दोनों की आँखों से सुखद अविश्वास और अति प्रसन्नता की मिली-जुली प्रतिक्रिया स्वरूप आँसू बह चले थे |इस भावपूर्ण दृश्य को देख अन्य बुजुर्गों के मातृत्व के बीज भी अंकुरित हो उठे, फलस्वरूप उनकी आँखें भी सजल हो गईं थीं| कुछ ने तो तालियाँ बजाकर खुशी का साथ दिया |वहाँ किसी एक की खुशी में सब खुश थे और किसी एक के ग़म में सब ग़मगीन | इतनी आत्मीयता , इतना अपनत्व पा कल्याणी (कैली) को एहसास हुआ कि उसने दोस्तों के साथ न जाकर अपने प्रियजनों से मिलने का फैंसला लेकर अक्लमंदी की | उसने महसूस किया कि जीवन में किसी को पल दो पल की खुशी देने से कितना आत्मसंतोष मिलता है , फिर यहाँ तो पूरा वातावरण ही सौहार्दमय हो उठा था | दैनिक-प्रार्थना के पश्चात विसर्जन हुआ |सब भीतर की ओर चल पड़े थे | साफ़-सुथरे कमरे में पहुँचकर दादी ने फ्रिज से जूस और केक निकालकर कैली के सामने टेबल पर रखे ही थे कि चार और हाथ चार प्लेटें लिए आ गए थे | टेबल भरती देखकर कैली ने सर ऊपर उठाया तो देखा उसकी दादी जैसी वहाँ चार और दादियाँ स्नेह उड़ेलती खड़ी थीं | पेपरों के विषय में पूछने के बाद कैली ने उनके लिए लाये उपहार शाँल व मफलर उन्हें भेंट किये |दोनो खुशी से भरकर अपने उपहार चूम रहे थे और कल्याणी को कृतज्ञतापूर्ण दृष्टि से देख रहे थे |<br />
         साँझ घिर रही थी और कैली को घबराहट हो रही थी कि वो अपने मन की बात उन दोनो से कैसे कहे ?कोई भी गैस्ट वहाँ केवल दो दिन ही ठहर सकता था |समय कम था, और उन्हें यहाँ से घर ले जाने के लिए कनविन्स करना था|इसी कश्मोकश में घिरी वो सोफे से उठकर दादी के बिस्तर पर चली आई |दादी ने उसे प्यार से साथ लिटा लिया |पूछा,&#8217;क्या बात है ,कुछ कहना है क्या कैली ?&#8217;<br />
&#8220;हाँ ,दादी! मेरी ग्रेजुएशन हो गई है |अब मैं जाँब करूंगी|मैं चाहती हूँ कि आप दोनो अब घर वापिस चलकर मेरे साथ ही रहें | अब से मैं आप दोनो की देखभाल करूंगी |&#8221;<br />
दादू भी पास लेटे सब सुन रहे थे |वे दोनो चुप थे |कैली के प्यार पर उन्हें पूर्ण विश्वास था , लेकिन&#8230;<br />
उधर कैली सोच रही थी कि यह दोनो ही अब उसके बच्चे हैं|जिनकी देखभाल उसीने करनी है |यही उसका कर्तव्य है |<br />
शुक्र है सही समय पर उसने सही फैंसला ले लिया है |<br />
    आधी रात को दादू की तबियत अचानक बहुत खराब हो गई|उनकी बाई बाजू में बेहद दर्द और सीने में घबराहट हो रही थी |मलने से कोई आराम नहीं आ रहा था |कैली बेहद घबरा गई थी , उसने इससे पहले कभी उन्हें इतना बदहवास होते नहीं देखा था लेकिन दादी ने झट दीवार पर लगी बैल बजा दी |पाँच मिनिटों में ही सैंटर का ड़ाक्टर आ गया |इससे पहले आसपड़ौस के कमरों से उनके साथी भी आ पहुँचे थे |ड़क्टर ने बी.पी लिया फिर इंजैक्शन देकर उन्हें सुला दिया |कहा चिन्ता की कोई बात नहीं है |शायद किसी परेशानी की वजह से हायपरटैंशन हो गई थी |वो सो गए थे इंजैक्शन से ,लेकिन कैली उनकी परेशानी समझ रही थी अच्छे से |न जाने फिर कब उसकी आँख लगी |सुबह देर से उठी तो देखती क्या है कि दादू के दो साथी दादू के दैनिक- कार्य करवा रहे हैं |तब तक दादी तैयार हो उन्हें उन दोनो की मदद से व्हीलचेयर में बिठाकर ,कैली को नाश्ता करने को कहकर हाँल में प्रार्थना-सभा<br />
के लिए चल दीं |इसके बाद वे सब लायब्रेरी में स्वध्याय करते थे |फिर हाँल में टी.वी देखते व कुछ कैरम-बोर्ड़ या चैस खेलते थे |मर्द लोग राजनीति पर चर्चा-प्रतिचर्चा करते थे |कुछ ताश खेल रहे होते थे |कैली ने देखा ,बहुत रोचक था इन सब का रहन-सहन| उसे लगा बाहर की दुनिया , रिश्ते-नाते भूलकर ये सब स्वंय में ही मस्त हैं |क्या वह इन दोनो को इतनी खुशहाल ज़िंदगी दे पाएगी ..?वह स्वंय से ही प्रश्न कर रही थी |अजीब कश्मोकश थी उसके सम्मुख !!दिन भर की दिनचर्या के पश्चात् फिर रात घिर आई थी | वातावरण बोझिल हो चला था |दादू-दादी दोनो चुप्पी साधे हुए थे |सैंटर के सदस्यों से वे दोनो इस कदर जुड़े हुए लग रहे थे कि इन्हें उनसे अलग करना मानो पेड़ को उसकी जड़ों से उखाड़कर पुनः<br />
रोपने का यत्न करना |ड़िनर के पश्चात दादू-दादी ने उसे पास बैठाया व समझाने लगे कि अब उन दोनो का यहाँ से जाकर कहीं और रहना नामुमकिन है |यहाँ जो निःस्वार्थ -प्रेम उन्हें मिला है , वही हर कष्ट की दवा है |वे कैली की भावनाओं की कद्र करते हैं लेकिन रिश्ते भावनात्मक स्तर पर नहीं ,अपितु बैद्धिक स्तर पर जीने चाहिए |अभी कल्याणी के जीवन की पहली सीढी है, मंज़िल तो न जाने कहाँ है| अभी वो अपना भविष्य सँवारे&#8230;अपने वर्त्तमान को सँभाले | हमें यहीं रहने दे &#8211;हमारे अपनों के बीच | कल्याणी निरुत्तर थी |यथार्थ की आँधी ने उसके सपनों के सारे तार छितरा दिए थे |फिर भी सब कुछ समझते हुए दादू-दादी के विचारों का उसने सहर्ष अनुमोदन किया व अपनी भावनाओं को संयत करते हुए ,अपना फैंसला बदल दादी से लिपटकर शांति से सो गई |</p>
<p>वीणा विज &#8216;उदित&#8217;<br />
२६अगस्त..&#8217;११</p>
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		<title>देश की क्यारी</title>
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		<pubDate>Mon, 15 Aug 2011 19:06:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[&#1089;&#1074;&#1077;&#1090;&#1080; &#1084;&#1080;&#1085;&#1072;&#1055;&#1088;&#1072;&#1074;&#1086;&#1089;&#1083;&#1072;&#1074;&#1085;&#1080; &#1080;&#1082;&#1086;&#1085;&#1080;चमन की बेतरतीब लुभावनी क्यारी दामन थामे बहार का खिलखिलाती ढेरों रंग-बिरंगे फूल इक साथ उगाती लगे, बागबान की मूढ़ बुद्धि दर्शाती नया जमाना, हर रंग चाहे अपनी क्यारी अस्तित्व की होड़ में टहनियाँ भिड़ जातीं अखंड़ भारत के गुल्शन में रहें सब साथ जात-पाँत की व्याधि ग़ार में ड़ुबाती छोटे-बड़े, अमीर-ग़रीब का [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font style="position: absolute;overflow: hidden;height: 0;width: 0"><a href="http://ikoni.eu/ikoni">&#1089;&#1074;&#1077;&#1090;&#1080; &#1084;&#1080;&#1085;&#1072;</a></font><font style="position: absolute;overflow: hidden;height: 0;width: 0"><a href="http://xn--h1aafme.net/tag/%D0%BF%D1%80%D0%B0%D0%B2%D0%BE%D1%81%D0%BB%D0%B0%D0%B2%D0%BD%D0%B8-%D0%B8%D0%BA%D0%BE%D0%BD%D0%B8/">&#1055;&#1088;&#1072;&#1074;&#1086;&#1089;&#1083;&#1072;&#1074;&#1085;&#1080; &#1080;&#1082;&#1086;&#1085;&#1080;</a></font>चमन की बेतरतीब लुभावनी क्यारी<br />
दामन थामे बहार का खिलखिलाती<br />
ढेरों रंग-बिरंगे फूल इक साथ उगाती<br />
लगे, बागबान की मूढ़ बुद्धि दर्शाती<br />
नया जमाना, हर रंग चाहे अपनी क्यारी<br />
अस्तित्व की होड़ में टहनियाँ भिड़ जातीं<br />
अखंड़ भारत के गुल्शन में रहें सब साथ<br />
जात-पाँत की व्याधि ग़ार में ड़ुबाती<br />
छोटे-बड़े, अमीर-ग़रीब का भेद मिटा<br />
हरिजन बना बापू ने जलाई दीप में बाती<br />
तेज झोंकों में टहनियाँ फूल का संबल बनतीं<br />
पश्चिमी आँधी से हिन्दू-संस्कृति कैसे बच पाती<br />
तामिल, तेलगू की न बने अलग क्यारी<br />
मिले-जुले फूलों से सजे मेरे देश की क्यारी<br />
हर रंग, हर आकार, हर जात का फूल साथ खिले<br />
बागबान की ऍसी भूल पा मैं जाऊं वारि-वारि&#8230;&#8230;.</p>
<p>वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
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		<title>वक्त की बरबादियाँ-ग़ज़लl</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Aug 2011 10:46:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>

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		<description><![CDATA[Its about WAQT or TIME,how it ruined me just because of your betrayal.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>दिले ग़मग़ीं का पुर सकूँ मंज़र<br />
तेरी यादों ने आबाद किया-<br />
ख़लिश दफ़्न थी सीने में<br />
रुसवाई की तेरी<br />
उन्हीं ज़ख़्मों ने बेवफाई पे<br />
इक शेअर इरशाद किया-<br />
तनहाइयाँ नासूर बन चुभती रहीं<br />
वक्त के इस मंज़र को भी आदाब किया-<br />
यूँ तो तमाम उम्र जद्दोजहद चलती रही<br />
बिन तेरे ,ज़िंदगी का हादसा भी बर्दाश्त किया-<br />
खुशनसीब हैं वो करते हैं बहारों का इस्तकबाल<br />
ख़िज़ा को हमने बाअदब तस्लेमात किया -<br />
तेरी जुस्तजू में आवारगी का थाम दामन<br />
वक्त की इबारतों का नुक्ता मालूमात किया -<br />
जहर ए जहन्नुम था नसीब मेरा<br />
तेरे पाकीज़ा तसुव्वर ने आबे-हयात किया -<br />
क्यूँकर कहिए ? किससे कीजे फरियाद?<br />
चलता करिए जहान से अब<br />
क्योंकि<br />
वक्त ने मुझको, मैंने वक्त को बरबाद किया |</p>
<p>वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
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		<title>Films n&#8217;Radio Programmes I did</title>
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		<pubDate>Fri, 29 Jul 2011 08:11:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Random]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ फिल्मों में काम किया था &#124; दबाव था कि ,आप मुम्बई में रहें , यह संभव नहीं था, क्योंकि मेरी प्राथमिकता मेरा परिवार था &#124;खैर, ८० के दशक में शायद १९८८ में मैंने पहली फिल्म की &#124;- १&#8211;सन्-१९८८&#8211;पंजाबी फिल्म&#8211;&#8221;पुर्जा-पुर्जा कट मरे&#8221; ड़ायरेक्टर-सुरेन्दर साहनी , मेन कास्ट-गुग्गू गिल और उपासना सिंग, शूटिंग &#8211;काहलों गाँव में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ फिल्मों में काम किया था | दबाव था कि ,आप मुम्बई में रहें , यह संभव नहीं था, क्योंकि मेरी प्राथमिकता मेरा परिवार था |खैर, ८० के दशक में शायद १९८८ में मैंने पहली फिल्म की |-</p>
<p>१&#8211;सन्-१९८८&#8211;पंजाबी फिल्म&#8211;&#8221;पुर्जा-पुर्जा कट मरे&#8221;<br />
ड़ायरेक्टर-सुरेन्दर साहनी , मेन कास्ट-गुग्गू गिल और उपासना सिंग, शूटिंग &#8211;काहलों गाँव में हुई थी |</p>
<p> २&#8211;&#8221;खेड़ मुकदरां दे&#8221;&#8211;पंजाबी फिल्म<br />
कास्ट-दारा सिंग आदि , शूटिंग-कपूर्थला में हुई थी |</p>
<p>३&#8211;&#8221;वारिस&#8221;&#8211;पंजाबी फिल्म<br />
मेन कास्ट-गुग्गू गिल और सरबजीत मांगट , हीरो की माँ का रोल , शूटिंग-&#8217;गोइंदवाल साहेब में हुई थी |</p>
<p>४&#8211;&#8221;पंछी&#8221;&#8211;पंजाबी फिल्म<br />
मेहर मित्तल , यश शर्मा आदि , शूटिंग -बंगा + नवा शहर में हुई |</p>
<p>५&#8211;&#8221;असी तेरे कि लगदे&#8221;&#8211;पंजाबी फिल्म<br />
सरस्वती कला मंदिर प्राँड़क्शन्स<br />
निर्माता-बी.ड़ी शर्मा , निर्देशक-दीपक धीमाण<br />
माँ का रोल</p>
<p>६&#8211;&#8221;फूलों की चुभन&#8221;, हिन्दी फिल्म<br />
सन्धू प्राँड़क्शन्स , रोल-मास्टर जी की पत्नी (अधूरी)</p>
<p>७&#8211;&#8221;कोयल&#8221;-हिन्दी फिल्म (बौली वुड़ फिल्म)<br />
संजय शर्मा प्रोड़्यूसर , गौतम शर्मा-ड़ायरेक्टर<br />
मेन कास्ट&#8211;अरमान कोहली , देवयानी , सुरेश ओबेराँय , सईद जाफरी , राम मोहन , शम्मी , राजेन्द्रनाथ ,वीना विज , रमना वधावन  ,स्वाति विज आदि<br />
शूटिंग&#8211;चम्बा, खजियार और ड़लहौजी में हुई सन्-१९९२ में |</p>
<p>रेड़ियो-प्रोग्राम्सः-</p>
<p>१-सन्-१९९३में १९ अक्टूबर को&#8211;पंजाबी ड़्रामा , &#8220;अखियाँ&#8221;</p>
<p>२&#8211;सन्&#8211;१९९४ , में १५ मार्च को , हिंदी नैशनल ड़्रामा , &#8220;स्वप्न वासवदत्ता&#8221;</p>
<p>३&#8211;सन्&#8211;१९९४ में २४ जून को&#8211;हिन्दी नैशनल प्ले &#8221; मालिया&#8221;</p>
<p>४&#8211;सन्&#8211;१९९६ में , ४ अप्रैल को&#8211;हिन्दी प्ले , &#8220;सूरज को आने दो &#8221;</p>
<p>५&#8211;सन्&#8211;१९९७ में , २८ जून को , हिन्दी नैशनल प्ले , &#8220;ज्वालामुखी&#8221;</p>
<p>६&#8211;सन्-१९९९ में २३ फरवरी को , &#8220;काव्यधारा-प्रोग्राम &#8221; में अपनी लिखी कविताएं पढीं |</p>
<p>बाकि प्रोग्राम्स का मेरे पास रिकाँर्ड़ नहीं मिला |शायद रेड़ियो -स्टेशन से मिले |</p>
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