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	<title>Hindi short stories, poetry and blogs &#187; Hindi Short Stories</title>
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	<description>Veena Vij Udit&#039;s writings in Hindi</description>
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		<title>तुरपाई</title>
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		<pubDate>Sun, 09 Oct 2011 10:09:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[A woman tortured by the so called relationship.Shes been raped by her own family.She cries n asks for mending of a torn heart.      ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सर्द झोंकों से बचने के लिए बदन पर चीड़ के पेड़ों की छाल लपेटे &#8216;पाइन लाँज&#8217; पहलगाम से चंदनवाड़ी जाते हुए जो पहला पुल लिदर दरिया पर आता है , उसके दाईं ओर स्थित है | चारों ओर बिखरी हरियाली के विभिन्न शेड़्स से भी चटकीला हर रंग है उसकी छतों का | ड़बल-स्टोरी बिल्ड़िंग -जिसके पाँच कमरे नीचे एक ही कतार में , और पाँच ही ऊपर हैं | लाँज के दूउउर तक फैले घास के मैदान उत्तर की ओर जा तिकोन हो जाते हैं | पूर्व की ओर सीधे खड़े पहाड़ की तराई से होते हुए उत्तर में ये ढेरों अखरोट के पेड़ दामन में समेटे , ऊबड़-खाबड़ धरातल बनाते हुए शेषनाग झील से आती बर्फीली वेगवती धारा जो अबशार बनी पर्वतों से धरा पर उतर रही है, उस तक जाकर समाप्त हो जाती है &#8212;एक स्वर्गिक आभा और अनुपम सौन्दर्य का एहसास जगाते हुए | मध्य में लाँज से तकरीबन बीस कदमों की दूरी पर सेव के बड़ॅ- बड़े पेड़ ; जो कि सेवों से लदे हुए हैं | उन पर झूले ड़ले हुए हैं | बरबस ही राह चलतों का ध्यान उस ओर खिंचता है | सैलानीगण सेवों के साथ फोटो खिंचवाने का लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं | अंततः चौकिदार से पूछकर कई लोग भीतर आ फोटो खिंचवाते, सेवों का स्वाद चखते वा उन पर पड़े झूलों पर झूल भी जाते हैं |उनके खिले चेहरे इस बात की गवाही देते हैं कि उनका कश्मीर आना अब सार्थक हो गया है |यही मेन रोड़ का आखिरी बड़ा गेट और साथ ही लगता छोटा गेट है|(&#8212;जिससे वो आती -जाती थी , चौकीदार से बिन पूछे )<br />
इन्हीं सेव के पेड़ों से छनती आती धूप के नीचे पलंग ड़लवाकर कोई न कोई पुस्तक पढना मेरी दिनचर्या में मौसम के अनुकूल शामिल है | हल्की सी मीठी थपकी देती बयार कभी -कभी मुझे नींद की आगोश में भी ले जाती है |कभी कोई पक्षी चोंच मारकर सेव गिराता है मुझ पर, तो चौंक कर उठकर बैठ जाती हूँ |तो कभी तेज हवा के झोंकों से पत्तों की सरसराहट , उनका नृत्य करना मुझे मुग्ध किए रहता है | कभी पहाड़ों की गोद में अठखेलियाँ करते बादल | लेकिन इधर कुछ दिनों से एक बकरवाल(गुज्जर) लड़की , गोद में नन्हा बच्चा उठाए चुपचाप चौकीदार से पूछे बिना छोटे गेट से भीतर आ उत्तर की ओर नदी की ढाल बने पत्थरों पर आकर बैठ जाती है | मैं पढती या कुछ लिखती उसे कनखियों से देख लेती हूँ | कभी वो बच्चे को घुटनों पर बैठाकर खेलती, कभी अपनी छाती से लगा उसकी भूख मिटाती तो कभी दोनो वहीं घास पर लिपटकर कुछ घड़ी की झपकी ले लेते | मैं देखकर भी अनदेखा कर देती हूँ | लगता , वह चैन से कुछ घड़ियाँ अपने बच्चे के साथ जी रही है &#8211;यह उसका अधिकार है | शायद -एक नारी का दूसरी नारी के प्रति यह सहज भाव है !<br />
उस दिन मैं Paulo Coelho की &#8220;The Alchemist&#8221; बड़ी तल्लीनता से पढ रही थी , कि लगा मेरे करीब कोई है |नज़रें ऊपर उठाईं तो वही बकरवाल लड़की बच्चा उटाए कह रही थीः &#8220;बीबी ! अज मैं खान नूँ कुज नईं लयाई, कुज खान नूँ दे दे | बड़ी पुक्ख लग्गी ए &#8220;(आज मैं खाने को कुछ नहीं लाई, कुछ खाने को दे दे , बड़ी भूख लगी है) देखती हूँ-एक पीला ज़र्द चेहरा मेरे सम्मुख है , जैसे उस चेहरे पर सदा से कोई पीड़ा अपना आधिपत्य जमाए हुए हो | उसे बैठने को कह मैंने नौकर से खाना मँगवाया | खाना लेकर वो वहीं पत्थरों पर चली गई | खाना खाकर वहीं पास बहते दरिया से बर्तन धोकर , मेरे पास पड़े मेज पर<br />
रख कर ; वहीं मेरे पायताने ज़मीन पर बैठकर मुझे निहारने लग गई |<br />
लगा, उसमें मुझसे बात करने की ललक उठी थी क्योंकि हमारे बीच प्रतिदिन न बात करते हुए भी शायद भीतर ही भीतर एक निस्पँद संवाद  चल रहा था |जिससे एक अपनत्व बन गया था , हम दो अजनबियों के बीच | सब समझते हुए भी मैंने उसे अनदेखा करते हुए पढने का उपक्रम किया |<br />
&#8220;बीबी ! ऍ जगह तेरी ए?&#8221;&#8211;मैंने &#8216;हाँ&#8217; में सिर हिला दिया उसे बिन देखे ही | पुनः बोलीः &#8220;बच्चे नई ने?&#8221; ( बच्चे नहीं हैं क्या?) इस पर मैंने किताब से नज़रें हटा ही लीं , और जवाब दिया कि वे ब्याहे गए हैं| अपने-अपने घर हैं |यहाँ हम दोनों और ये सब नौकर हैं |और पूछा, &#8221; तूँ कहाँ से आई है?&#8221;<br />
उसने हमारे पूर्व की ओर की पहाड़ी की ओर इशारा कर बताया कि वहाँ ऊपर उनका ड़ेरा है | वे खाना-बदोश हैं , जो भेड़ -बकरियों को नई-ताजी घास खिलाने के लिए पहाड़ों पर घूमते रहते हैं | पीछे &#8216;अख़नूर&#8217; से आए हैं | तभी मैने ग़ौर से पूर्व की झाड़ियों में पहाड़ के दामन में ढेर सारी काली-सफेद भेड़- बकरियाँ घास व नए पत्ते चरते देखीं |<br />
        इस पर वह झट बोली, &#8220;इन्दी ही राखी कर रईयाँ | परों कोई इक बकरी ही खा गया |पता कि -कोई जनावर सी कि मनुख? हाँ , बकरी दी टँगा दरया ते कुत्ते खाँदे सी ,ओई दिखया | &#8221; ( इनकी ही रखवाली कर रही हूँ | परसों कोई एक बकरी ही खा गया |मालूम नहीं कोई जानवर था कि मनुष्य ?हाँ, बकरी की टाँगें नदी किनारे कुत्ते खा रहे थे &#8211; यही दिखा |)उसकी बात सुन मैं हैरान कि इस पहाड़न की धारणाएं कितनी सचेत हैं | इसे भी जानवर और मनुष्य में एक जैसे गुण दिखे , तभी तो दोनों को एक ही तराजू के पलड़ों में तौल रही है |मैंने अफ़सोस जताया जो शायद उसे तसल्लीबख़्श लगा | इसपर वो एकदम से उठी , पीठ पर चुन्नी बाँध कर बच्चे को उसमें ड़ालकर सामने की सीधी पहाड़ी पर टेढी चढकर भेड़-बकरियों को ऊपर की ओर हाँककर , वापिस आ छोटे &#8211; गेट से बाहर चली गई |मुझे अपने ख़्यालों में उलझाकर&#8212;<br />
               अगले दिन खाना खाकर किताब हाथ में ले मैं साथ लगते दरिया के बर्फीले पानी में पैर ड़ालकर वहीं पड़े बडे से पत्थर पर ओशो की पुस्तक को पढने बैठी , तो कुछ देर में ही मेरे पैर ठंड़ से सुन्न हो गए | पैर पानी से बाहर निकाल मैं किताब बंद कर चट्टानों से टकरा कर चाँदी का रूप धरती जल की धाराओं को निहार रही थी कि लगा कोई मुझे देख रहा है | वही थी , कौतुहलता से भरी दृष्टि मुझ पर गड़ाए हुए | उसे देख मुस्कुराते हुए पत्थरों पर चढकर मैं इस पार आ , पत्थर पर बैठ गई | वह वहीं नीचे के पत्थर पर मेरे पास आ बैठी थी | सहज भाव से मैंने पूछा, &#8221; नाम क्या है तेरा? &#8221;<br />
बोली, &#8220;शबनम&#8221; | (नाम मुझे अच्छा लगा )<br />
&#8221; मर्द का क्या नाम है ? वो कहाँ है? वो क्यों नहीं आता ?&#8221;<br />
बोली, &#8220;नूरा! नूरा आसी न! हुणे ताँ दोए कोड़े लै के ड़ेढ मीने लई अमरनाथ गया ए | देहाड़ी दे दो हजार कमाई करसी | परों तो इस वरे ढेर यात्री आया ए | चंगी कमाई हो जासी | &#8221; ( नूरा! नूरा भी आएगा | अभी तो दोनो घोड़े लेकर ड़ेढ महीने के लिए अमरनाथ गया है|   एक दिन के दो हजार कमाई करेगा | पिछले वर्ष से इस बार अधिक यात्री आया है | अच्छी कमाई हो जाएगी | )<br />
फिर घर में कौन-कौन हैं ? -मैने पूछा |<br />
&#8220;इत्थे कर विच सौरा ए | देर-दराणी अख़नूर ने | ओत्थे ड़ंगरां नूं ते , नाल मक्की होर जमीन वेखदे ने | &#8221; (यहाँ घर में ससुर है | देवर-देवरानी अख़नूर में हैं | वहाँ गाय-भैंस , फसल और ज़मीन की रखवाली करते हैं |)<br />
    जो भी था, पर इस लड़की के पास से बाकि बकरवालों की तरह भेड़-बकरियों की बदबू नहीं आ रही थी , वह साफ -सुथरी थी | सो बात हो पा रही थी | लगा, पति की अनुपस्थिती में इसका वक्त यहाँ गुज़र रहा है-अच्छा ही है|मैं उठकर लाँन की ओर आ गई | वो भी सदा की तरह छोटे -गेट से बाहर ये गई कि वो गई |<br />
 एक दिन दोपहर के खाने में राजमा चावल बने तो उसका ख्याल आ गया |राजू को बोला कि उसके लिए भी रख देगा | आती ही होगी, खा लेगी | अब तो हर दिन मुझे उसका इंतज़ार रहता था |वो आई | उसने चाव से खाना खाया और बर्तन धोकर रख दिए | फिर मेरे पैरों के पास आकर वहीं ज़मीन पर बैठ गई |<br />
&#8220;टँगाँ कुहट दयां बीबी ?&#8221;( टांगें दबा दूँ बीबी?)&#8211;बोली |<br />
मैंने &#8216;ना&#8217; कहते हुए झट से पैर ऊपर पलंग पर कर लिए |<br />
खाने के बदले में शायद वो कुछ करना चाह रही थी | जो मुझे गवारा नहीं था | प्रत्युत्तर में उसके होंठ खुले फिर बंद हो गए | शायद शब्द हलक तक आकर अटके जा रहे थे | उसके चेहरे पे आते-जाते भावों को पढकर लगा जैसे उसके भीतर कोई अन्तर्द्वन्द्व चल रहा हो | मैंने पूछ ही लिया, &#8221; कुछ कहना है क्या?&#8221;<br />
सारे जिस्म का दर्द अपने चेहरे पे समेट वो आँखों की पोरों से झरने लगी | साथ ही सुबकियाँ लेते हुए मेरे घुटने कस कर पकड़ के वह फट पड़ी लगी,<br />
&#8221; मेरा पल्ला ताँ फट के तार-तार हो गया ए बीबी ! हुण कौण करसी तुरपाई?&#8221;<br />
मैं हैरान-परेशान हो उसका मुँह तक रही थी |उसके कंधे पकड़ उसे ठीक से बैठाया व पूछा, &#8221; क़्यों ?क्या हो गया है ऍसा कि तेरा आँचल फट कर तार-तार हो गया है, और तुझे तुरपाई की चिन्ता हो रही है ?&#8221; साथ ही सोच रही थी कि कैसे मानूँ यह अनपढ , गँवार है |कितनी सुन्दर व कटु अभिव्यक्ति है इसकी !  &#8216;बोल न शबनम&#8211;!&#8217;-मैंने फिर कहा| मेरे स्नेहपूर्ण आग्रह से अभिभूत हो वह पिघल उठी | मानो पैर की बवाई फूट रही हो और वह असह्य पीड़ा से छटपटा रही हो | बोली, &#8221; मेरा मर्द घर नई ए ,बीबी ! तैनूँ दसया सी न! ओदे पिच्छों मेरे सौरे ने मैंनूं जबरदस्ती इस्तेमाल करना शुरू कर दित्ता ए | कैंदा&#8211;ओ कित्थे जावे?<br />
कर दी ही गल्ल ए तैनूँ कि फ़रक पैसी? तेरे नाल ते मरद ही होसी न,<br />
तूँ अक्खाँ नूटी रक्खीं |नूरे दे वापस आण ते मैं कदे तेरे कोल नई आवाँगा | तूँ जुबान बंद रक्खीं |बस चल्लड़ दे |&#8211;मैं की कराँ बीबी ?मेरा पल्ला ते फट गया ए न ! छोटी सी ताँ माँ करदी सी तुरपाई, हुण ऍदी तुरपाई कौण करसी? दस्स न बीबी !!!&#8221;<br />
( बोली, मेरा मर्द घर पर नहीं है, मैंने तुझे बताया था न! उसकी अनुपस्थिति में मेरे ससुर ने मुझे इस्तेमाल करना शुरू कर दिया|कहता है वो कहाँ जाए ? तुझे क्या फर्क पड़ता है? तेरे साथ तो मर्द ही होगा न! तूँ आँखें बंद रखना |नूरे के वापिस आ जाने पर मैं कभी तेरे नज़दीक नहीं आऊँगा |तूँ अपनी जुबान बंद रखना | तबतक ऍसे ही चलने दे &#8212;अब मैं क्या करूँ बीबी ? मेरा आँचल तो फट गया न! छोटी थी तो कपड़े फटने पर माँ सी देती थी , अब किसके पास जाऊँ? बता न कभी हो सकती है इसकी सिलाई? बीबी !!)-इतना कह वह छाती पर मुक्के मारकर विफरने लगी | उस की पीड़ा से तड़प मेरी भी आँखें सजल हो उठी | मेरी आलोड़ित होती संवेदना उसके दर्द की संवेदना से संपृक्त होने को आतुर हो उठी | उसे स्नेह से पकड़कर मैंने अपने पास बैठाया| मैंने हथियार ड़ाल दिए | क्या कहूँ&#8211;? क्या करूँ&#8211;? कैसी सलाह दूँ&#8211;? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था | एक ब्याहता अपना सर्वस्व अपने पति को ही मानती है ,उसमें किसी और की गुँजाइश ही कहाँ होती है? फिर जो रिश्ते से आदर योग्य , भरोसे योग्य , रक्षक हो वही खेत की बाड़ बनकर खेत को ही खा गया हो तो किससे गिला कीजे?किसका भरोसा कीजे? मुझे लगा जैसे सम्पूर्ण नारी-वर्ग एक संवेदनशील<br />
प्राणी न होते हुए एक निर्जीव-वस्तु है, जिसे ज़रूरत पड़ने पर कोई भी इस्तेमाल करे और फिर&#8211;छोड़ दे | ऍसे क्रूर सामाजिक यथार्थ के समक्ष<br />
हम हार जाते हैं| हमारे हाथ बँध जाते हैं | हम नकारे हो जाते हैं |पुरुष<br />
-जाति के प्रति मेरा मन वितृष्णा से भर उठा | कई दम्भी पुरुष सारे नारी-वर्ग के लिए असहिष्णु बने रहते हैं | अपनी बेबसी भरी रातों का<br />
दर्द सँभाल वह अपने फटेहाल आँचल को मेरे पास लाकर &#8216;तुरपाई&#8217; की गुहार लगा रही थी |<br />
   मैं उसका पीड़ा से मथित चेहरा पढ रही थी | औरत ना होकर जैसे वो एक उतरन बन गई थी |सोच रही थी- इंसान भूखा भेड़िया बन गया है , तभी तो अपनी भूख और हवस मिटाने को वो इतना नीचे गिर पाता है | मैं केवल शबनम का दर्द साँझा कर सकती थी क्योंकि वे अंजान लोग थे | मेरी असमर्थता वो भी समझ रही थी , तभी तो वो अचानक उठ खड़ी हुई, रोज की तरह | बच्चे को पीठ पर बाँध , अपनी भेड़-बकरियाँ हाँक फटाफट छोटे -गेट से बाहर चली गई |मानो कुछ हुआ  ही ना हो | बस, दिल हल्का कर लिया था उसने, एक नारी की पीड़ा को दूसरी नारी से साँझा करके | मेरी दृष्टि दूर तक उसका पीछा करती रही पर , वो फिर कभी वापिस नहीं आई |मैं हर दिन छोटे- गेट पर नज़र टिकाए उसकी राह तकती थी |<br />
      हाँ, कुछ दिनों बाद एक सजीला ,गठीला गबरू बकरवाल उन्हीं भेड़-बकरियों को हाँकने छोटे -गेट से भीतर आया | मैं समझ गई यही मेरी शबनम (अपनी लगने लगी थी ) का नूरा है | तभी मेरा उद्वेलित मन शान्त हो गया | लगा अब वक्त के साथ-साथ नूरा कर देगा उसकी &#8216;तुरपाई&#8217; | </p>
<p>वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
]]></content:encoded>
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		<title>दहलीज़</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Sep 2011 05:22:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[Inquisitiveness is a natural instinct, but it troubles a lot to a kid. They can not digest the changes in daily life.When adolesence knocks to their door step they just astonished.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>  उसके धूल-धुसरित छोटे-छोटे नँगे पाँव हरी-ताज़ी दूब पर लाँन में यहाँ से वहाँ भाग रहे थे | दोनो हाथ सामने की ओर फैल चुपके-चुपके तितलियों को पकड़ लेने की भंगिमा में खुले हुए प्रयत्नशील थे | कितना कौतुक&#8212;!,कितना उत्साह&#8211;, उतनी ही चपलता थी उसके हाव-भाव में | बेखबर थी वो आसपास से |खिले फूलों पर ही तितलियाँ क्यों मँड़रा रही हैं? क्या करती हैं ये उन पर बैठकर? माँ कहती है, &#8216;रस चूसती हैं फूलों से &#8216;|वो खोजती है , कहाँ है रस ? वह गुलाब की एक-एक पँखुड़ी तोड़कर रस ढूँढती है-नहीं पा सकी वो रस |माँ भी तो उसे ,&#8217;मेरी गुलाबो&#8217; कहती है |वो भी तो फूल सी है, तो फिर ये उस पर क्यों नहीं मँड़राती हैं ? ये उसके हाथों से क्यो ड़रती हैं ? वह तो उनके रंगों को छूकर दुलारना चाहती है | बस इतनी सी बात भी नहीं समझती हैं ये | हैरान व परेशान है बाल-मन ! कौतुहलता है !!!!<br />
       थक हार कर धरिणी पर ही पसर जाती है | उसे धूप से बचाता , छाँव देता पास ही खड़ा वृक्ष मुस्कुरा उठता है | सोचता है , फूल खिलते हैं -मुर्झा  जाते हैं , लेकिन इनका आकर्षण बाल-मन, प्रेमियों, भक्तों, भँवरों और तितलियों आदि को लालायित किए रहता है | वृक्ष तो सन्नाटों के पहरेदार बने सब लीलाओं के दृष्टेता हैं | गवाह हैं ये वहाँ घटी सब घटनाओं के | इस नन्ही जान को नित बाग़ में दौड़ते देख वह भी मन भरमाए रखता है |<br />
        उस दिन उसके साथ ढेरों सखियाँ थीं |सभी नवरात्रि की कँजकें&#8211;!सब के माथे पर लाल सिन्दूर की बिन्दी और कलाई पर लाल धागे बँधे थे | उनकी खिलखिलाहट से बहार आ गई थी |उन्हें देख ढेरों तितलियाँ भी उन्हें रिझाने आ गईं थीं | वे आपस में लुका-छिपी खेल रही थीं| किलकारियों से गूँज उठा था सारा माहौल | हमजोलियों के संग उसकी खुशी असीम थी |सब इधर से उधर बेपरवाह दौड़-दौड़कर तितलियों को पकड़ने का यत्न भी कर रही थीं |<br />
       जब आम का बौर झरा तो कच्ची कैरियों ने बाल-मनों को ललचा दिया | उसे भी कैरी की मिठास भाती, वह भी सखियों संग छुप-छुपकर  कच्चे आम खाती थी | माली को दूर से ही आते देखकर सब शैतानी से भाग जातीं |उसके डर से भागने का मज़ा ही कुछ और था | पेड़ों पर झूले पड़ गए थे | मधुमक्खी के छत्ते की तरह ढेरों कन्याएं आ जाती थीं, पींगें चढाने | अपनी पारी आने पर इसकी बाँझें खिल जातीं |इसमें एक नया जोश आ जाता था | उनका अनुसरण कर वह भी शारीरिक प्रवाह बढाती, उसमें अनोखी ऊर्जा भर जाती |और पीछे छूट रहा था तितलियों का आकर्षण -उसका स्थान ले रही थी पींग ऊपर चढाने की उमंग !झूले की  उडान उसे इतनी ऊपर ले जाती कि उसके मन में आसमान छूने की ललक जाग उठती | कल्पनाओं की उड़ाने आकाश में उड़ती पतंगों की डोर बन जातीं |<br />
 डोर&#8211;! डोर जो ऊँची उठकर कभी भी कटकर , कहीं भी गिर जाती है | पतँग की ऊँची उड़ान को ज़मीन की भेंट चढाकर | अदृश्य व अनिश्चित मंज़िल का जामा पहनाकर पींग धीरे-धीरे वापिस आ ठहर जाती , अपनी धरा पर | और ठहर जाती &#8211;उसके संग ही उसके कोमल मन की उड़ान !<br />
     रात&#8211;छत पर बिस्तर में लेट , मुग्ध हो वह अनगिनित जगते-बुझते  रोशनी के पुँज तकती | उनका अनुसरण कर अपनी पलकों को भी कभी खोलती तो कभी बंद करती | सोचती , वो भी इस विराट का हिस्सा इक टिमटिमाता तारा है | उसके भीतर से भी प्रकाश की किरणें<br />
फूटकर  जगमग-जगमग कर रही हैं | सप्त-ऋषियों को तारों के झुंड़ में  खोज , वो उनका आकार हथेलियों पर बनाती | ध्रुव तारे की कहानी दादी ने सुनाई थी | उत्तर दिशा में उसे वो श्रद्धा से नमन करती | चाँद&#8211; हाँ , चाँद को निहार कर वो बाँवरी हो जाती थी | खोजती , पर चरखा कातती बुढिया उसे दिखाई नहीं पड़ती थी | हर रात चाँद का आकार बदलता देखकर वह अपने आकार को दर्पण में निहारती | वो भी तो माँ की &#8220;चँदा &#8221; है | उसका आकार भी तो बदल रहा है | लेकिन चाँद की भाँति एक माह पश्चात उसका आकार पुनः वैसा ही नहीं हो जाता | वो तो निरंतर बदल रही है शायद!!<br />
       पिछवाड़े मुर्गियों का झुंड़ हरियाली में भागता है | उनका लीडर मुर्गा जोर से बाँग लगाता है&#8217; कुकड़ू कूँ&#8217; ! मुर्गीखाने में बैठी मुर्गी जैसे ही बाहर आकर &#8216;कद्दैं-कड़ैं &#8216;का शोर मचाती है ,तो वह दूर से दौड़ी जाती है , उसका अंडा देखने | कहाँ से आ जाता है मुर्गी के नीचे अंडा ? हैरान होती है | कौतुहलता है कि मुर्गा वहाँ जाकर क्यों नहीं बैठता ? वह अंडा क्यों नहीं देता ? ढेरों प्रश्न छोटे से दिमाग़ को परेशान कर देते हैं | लेकिन कुछ ही पलों में वो भूल जाती है- यह प्रश्नों का सिलसिला | रोज़<br />
ही सोचना, हैरान होना , उत्सुक होना और रोज  ही भूलना &#8211;यही क्रम चलता रहता है |<br />
     उसके भीतर एक सूरज का प्रकाश प्रतिदिन आलोकित होता है | प्रकाशमय कर देता है भीतर के अंधकार को |कब आई आँधी , कब पत्ते झर गए, परिसर भर गया धूल व पेड़ से टूटे पत्तों से &#8211;उन्हें झरता देख<br />
उसका मन क्यों दुखता है? उसे लगता, वृक्ष रो रहा है | असमय की टूटन वह सह नहीं पाती | पिछवाड़े की सीढियों पर बैठ अकेली वह वक्त की दौड़ती रफ्तार को बाँधने का यत्न करती | माँ की ड़ाँट मन पर चोट कर जाती है | समझ नहीं पाती कुछ | &#8220;अकेली मत जाना सहेलियों के घर , अब तुम छोटी नहीं रही | &#8221; अब और तब (जो बीत गया है) उसके बीच के अन्तर को समझने का यत्न विफल हो जाता है | गुड़े-<br />
गुड़िया का ब्याह तो वो अभी भी रचाती है सब सखियों के संग | वो तो ब्याह कर भी उसके संग रहते हैं | पर सामनेवाली दीदी ब्याहकर रोती हुई दूर चली गई है |न जाने क्या गोल-माल है ? बहुत परेशान है&#8211;!<br />
    त्यौहारों पर उसे काँच की चूड़ियाँ पहनने का बहुत शौक है | टूटी हुई चूड़ियाँ बटोरकर ऊपर छत पर वो उनको जोड़-जोड़कर  फूलों के ड़िज़ाईन बनाती है , पर भैय्या आकर सब बिगाड़ देता है | कितना भला लगता था न ; रात को भैय्या के साथ गलबैंय्यां ड़ालकर सोना ! लेकिन माँ ने अब अलग बिस्तर लगाने शुरू कर दिए हैं |वैसे तो अच्छा है भैय्या की टाँगें  और नहीं खानी पड़ॅंगीं |<br />
उसके भीतर कोलाहल मच जाता है जब बंद कमरे से तरह-तरह की आवाजें आती हैं | भीतर झाँकने का प्रयत्न करती है , लेकिन अँधकार अपने में सब लील लेता है |आख़ीर चाचा-चाची दरवाजे के भीतर शोर क्यों करते हैं ? प्रश्नों की कतार फिर उसके भीतर कोलाहल मचाती है | चाची अस्पताल जाकर छुटकी मुनिया ले आई है | वो भी अपनी एक मुनिया लाना चाहती है | उसे क्यों कोई मुनिया दिलाने अस्पताल नहीं ले जाता ? बेबसी में रास्ते खो गए हैं ! वो जाए भी तो किधर&#8211;? कुछ नहीं सूझता !<br />
        रानी ने स्कूल में बताया कि अब वह बड़ी हो गई है , इसलिए उसके घर अगले हफ्ते उसकी पूजा है,  उस दिन वो स्कूल नहीं आएगी |<br />
उसने भी घर आ माँ से पूछाः&#8221; माँ! मेरी पूजा कब होगी?&#8221;<br />
माँ ने अर्थ भरी मुस्कुराहट चेहरे पर लाते हुए कहाः &#8216;हमारे में पूजा का रिवाज़ नहीं है |  हाँ , तुम्हे दूर बैठा दिया जाएगा | खाना भी वहीं मिलेगा | पर अभी नहीं , बड़ी होने पर !&#8217;<br />
बड़ा होना&#8211;क्या अभिशाप है? नहीं होना उसे &#8216;बड़ा&#8217; | दादी ने कहानी सुनाई&#8211;&#8217;पारो बड़ी हो गई थी | पारो ने चूड़ीवाले से चूड़ियाँ चढवाईं |<br />
वही चूडियाँ उसे डस गईं | &#8216;साँप तो डसता है, लेकिन चूड़ियाँ डस गईं ?<br />
नहीं पार पा सकी वो इस कहानी का! परेशान है&#8212;!और,<br />
वह दिन भी आया , जब उसके भीतर का बचपन फट पड़ा | जवानी की दहलीज पर कदम रखकर बाहर निकलने के लिए | माँ ने उसे अलग बैठा दिया |खाना भी वहीं दिया, रानी की तरह पूजा नहीं करवाई | नवरात्रे फिर आए | घर- घर कंजकें बिठाई गईं | कंजकों में पहले वो पड़ौस के घरों से प्लेट में हल्वा, पूड़ी,काले चने और पैसे लेकर घर आती थी |गुल्लक में पैसे डालकर खुश होती थी | अब उसे माँ ने समझाया कि वो &#8216;कंजक&#8217; नहीं रही | वह बड़ी हो गई है , वह वहाँ नहीं बैठेगी | उसके पैर कोई नहीं पूजकर धोएगा अब |<br />
उसे नहीं भा रहा था, &#8221; बड़ा होना&#8221; | स्वच्छन्द हवा में साँस लेना अब नियंत्रित हो गया था |उसके गले में गुठली फँस गई लग रही थी , जो न निगलते बनती थी न थूकते !!<br />
                                                      वीणा विज &#8216;उदित&#8217;<br />
                                                        सितम्बर &#8216;११</p>
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		<title>अपूर्व पूर्णत्व</title>
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		<pubDate>Thu, 08 Sep 2011 04:32:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[A wife is never complete if her husband does not understand her fully.She wants a special place in his life to be adored.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>       भावनाओं को चोट पहुँचने से गार्गी को जो वेदना और कसक उठती ,वो एक अंधड़ बन जाती और फिर उसकी कलम की स्याही स्वंय को काग़ज पर मिटाकर एक कविता या नज़्म का रूप धरकर ही थमती |गार्गी छुप-छुपकर अपनी डायरी के कोरे पन्नों पर आत्मानुभूति के उदगार उकेरती रहती|घर-परिवार में सब कुछ होते हुए भी उसके भीतर एक रिक्तता बनी रहती |उसके भीतर की बेचैनियाँ उथल-पुथल मचाए रहतीं |जब भी काम से निपट वो निढाल हो बिस्तर पर पसरती तो उसमें बर्फ़ की ठंडक सी सिहरन सदा व्याप्त रहती |कभी किसी ने ध्यान ही नहीं दिया |ध्यान देता भी कौन ?पति तो व्यवहारिकता के स्तर पर जीवन जीते थे |भावनात्मक पहलू उन्हें छू तक नहीं गया था |घर का अस्तित्व तो केवल उनकी प्रतिदिन की जरूरतों के साथ बँधा था |उससे परे भी कुछ है ,यह जानने की शायद वो आवश्यकता ही नहीं समझते थे | दोनो बच्चे शिशिर और मूर्ति पहले पढाई-लिखाई फिर क्रमशः सैट होकर ,ब्याह कर दूर शहरॉं में जा बसे थे |उनका अपना जीवन, अपना संसार , अपना दायरा बन गया था |समय कहाँ था उनके पास भी औपचारिकता निभाने के सिवाय |<br />
        एक अकेलापन घेर गया था गार्गी को, जिससे उबरने के ढेरों माध्यम वो खोजती रहती थी | टी.वी आँन करके ;उसमें मन रमाने की सोच वह चैनल ही बदलती रह जाती थी | मन कहीं ठहरता ही नहीं था| हाँ कभी पुरानी फिल्मों के नग़में टी.वी पर चल रहे होते तो अतीत में घुसकर उसका कुछ वक्त गुज़र जाता था|एक दिन -किसी पुराने नग़में को सुनते हुए उसके भीतर से एक लय चली और उसकी उँगलियाँ मेज पर थिरक कर थाप दे संगत देने लगीं |<br />
अपनी थिरकती उँगलियों को देख उसे कुछ याद आया |गार्गी ने दसवीं के बाद टाइपिंग का कोर्स किया था |उसने सुना था कि कम्प्यूटर सीखने में इससे मदद मिलती है |तो क्यूँ न वो कम्प्यूटर ही सीख ले ? घर में कम्प्यूटर भी था , लेकिन  पतिदेव की सख्त हिदायत थी कि इसे मत छूना |मन में ललक तो उठी थी लेकिन&#8212;किया क्या जाए , दुविधा थी |<br />
      &#8221; जहाँ चाह, वहाँ राह&#8221; ! उन्हीं दिनों मूर्ति ममी-पापा के पास दो महीनों के लिए रहने आई, क्योंकि उसके पति राघव को किसी कोर्स के लिए अचानक यू.एस जाना पड़ गया था |गार्गी की तो मानो ईश्वर ने सुन ली |मूर्ति को सारा दिन कम्प्यूटर पर ही रहना होता था | माँ के आग्रह पर उसने उन्हें ई-मेल करना सिखा दिया | हिन्दी के लिए उनका रुझान देखते हुए हिन्दी फाँन्ट भी अपलोड कर दिया और याहू डाँट काँम पर अकाउंट खोल दिया | आज गार्गी को लगा कि मूर्ति ने अपने दूध का ऋण चुका दिया , माँ को जीवन की एक नई दिशा दिखाकर |उसने माँ के सम्मुख एक नया संसार खोलकर रख दिया था | गार्गी को जीने का एक सम्पूर्ण मकसद समक्ष दिख रहा था | उसकी अतृप्त -आकांक्षाओं को तृप्त करने का आधार सामने था उसके |अब वर्जनाएं टूट रही थीं |जैसे वेगवती धारा आगे बढने को बेचैन हो |<br />
             मूर्ति ने माँ से पहली ई-मेल भैया को भिजवाई| शिशिर की उसी पल जवाबी ई-मेल आ गई माँ के अकाउंट में |साथ ही फोन भी आ गया |उसे इस उम्र में माँ के उत्साह ने अभिभूत कर दिया था |उसे माँ पर गर्व हुआ |उसने मूर्ति को भी सराहा कि उसने माँ के जीवन में रंग भर दिए थे |गार्गी ने दामाद को भी ई-मेल भेजी |वह भी सासू माँ के इस ओर बढ्ते कदमों से बेहद प्रसन्न हुआ |<br />
       गार्गी की टाइपिंग के लिए यह चुन्नौतिपूर्ण कार्य था | जो उंगलियाँ बरसों से चूल्हे-चौके में लगीं अपनी थिरकन गँवा चुकी थीं , अब वो सक्रिय हो उठी थीं | एक रात सोने से पूर्व गार्गी कम्प्यूटर पर जा बैठी , पतिदेव ने देख लिया | वे गुस्से से बोले, &#8216; अरे तुम इसे क्यों छेड़ रही हो? यह बच्चों के खेलने की मशीन नहीं है |और खराब कर दोगी |&#8217;  पापा की आवाज सुन मूर्ति अपने कमरे से बाहर आई ,और बोलीः<br />
&#8220;पापा! ममी कम्प्यूटर चलाना सीख गई हैं |&#8221; लेकिन प्रत्युत्तर<br />
में वहाँ भावों का कोई उतार- चढाव नहीं था |<br />
     माँ की समझ व स्पीड देखकर मूर्ति प्रसन्न थी | गार्गी ने जब वहाँ अपनी पहली कविता लिखी , तो मूर्ति ने उसे डाँक्यूमेंट्स में सेव करना , साथ ही अन्य ई-पत्रिकाओं को प्रेषित करना भी सिखा दिया |इसी तरह दो महीने कब पूरे हो गए पता ही नहीं चला |मूर्ति चली गई, दे गई माँ को उसका अभीष्ट&#8212;!<br />
      गार्गी एक नए संसार में पदार्पण कर चुकी थी |उसकी बरसों से संचित भावनात्मक दौलत जो उसकी डायरी के पन्नों में कैद ; ज़िन्दा रहने को केवल साँसे ले रही थी, वह अब खुली हवा में साँस ले पनपने लगी थी और मुखरित हो उठी थी आने वाले युग के लिए |अपने घर में बहती विपरीत<br />
हवाओं से लड़ वो तेज कदम भरकर चलने का साहस जुटा रही थी |<br />
          गुग्गल-सर्च में जाकर गार्गी ने ई-पत्रिकाओं के नाम ढूँढे | एक-दो को उसने अपनी कविता व नज़्म भेजीं |प्रत्युत्तर में उसे प्रशंसकों की ई-मेल्स आईं |इससे उसका हौंसला बढ गया | अब उसे नई ई-मेल्स का इंतज़ार रहता |वो उठ-उठकर आधी -रात को स्टडी में जाती , ई-मेल्स चैक करती |वह आँन-लाईन रहने लगी थी | सर्फिंग करती, बैठे-बैठे डाक्यूमेंट्स निकालती, उनको बार-बार पढती &#8211;आनन्दित होती |उसे अब अकेले जीने में संतोष मिल रहा था |<br />
       किसी &#8216;श्यामल&#8217; की नई ई-मेल थी&#8211;&#8217;इतनी बढिया रचना के लिए बधाई स्वीकारें &#8216;| एक और प्रतिक्रिया, &#8220;मर्मस्पर्शी कविता के लिए बधाई !ऍसे ही लिखती रहिए | एक और&#8211;&#8221;प्रत्येक पंक्ति संवेदनापूरक अभिव्यक्ति से लबरेज़ है &#8220;| इतनी प्रतिक्रियाएं पाकर गार्गी स्तब्ध रह गई |उसने झट से कम्प्यूटर बंद किया व किंकर्त्तव्यविमूढ सी<br />
वही बैठी रह गई | आँखों से अविरल धाराएँ बह रहीं थीं खुशी के मारे | उसे लगा उसकी रचनाओ में कुछ तो है ,जो उसे पहचान मिल रही है ! उसकी लेखनी को लोगों ने परखा था, सराहा था | अगले दिन उसने सबको धन्यवाद लिखा और आरम्भ हो गया अनवरत सिलसिला | वह अपनी भावनाओं की दौलत सब से साँझी करने लग गई | साथ ही साथ उसकी पढने की प्रक्रिया भी शुरु हो गई थी | ई-पत्रिकाएँ खोलकर वह उच्चकोटि के साहित्यकारों व गुणी विद्वानों की रचनाएँ पढकर अपना ज्ञानभंडार बढाने में लग गई थी | उत्साह का सृजन होने से उसकी जीने की उमंग विभिन्न रचनाओं के संसर्ग में आलोड़ित हो उठी थी | जड़ हो चुके व नैराश्य से घिरे  दिमाग के कोने सजीव हो उठे थे | उनसे अप्र्त्याशित शब्द फूटने लग गए थे | देश -विदेश की ई-पत्रिकाओं को अपनी रचनाएं भेजकर वो यश पा रही थी ,कि तभी उसे लखनऊ से एक निमंत्रण-पत्र  मिला कि उसकी रचनाओं के लिए उसे पुरस्कृत किया जा रहा है |वे अगले माह स्वंय आकर सम्मेलन में अपना पुरस्कार लें |उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था&#8211;आज वो खुशी से भीतर तक सिहर उठी थी |उसने सोचा कि क्या यह उसके जीवन में संभव था ? वह पतिदेव से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी | उनका व्यवहार ऍसा होता था मानो गार्गी का दिमाग है ही नहीं | उनके लिए वो घरेलू काम-काज करने की मशीन थी केवल | लखनऊ जाकर पुरुस्कार पाने की बात तो दूर रही , उल्टे उन्होंने उसका उपहास उड़ाना था | लेकिन ख्याति पाना या पुरुस्कृत होना भी तो बहुत बड़ी बात थी , इसे वो नकार नहीं सकती थी |वो बेचैन हो उठी अपनी खुशी बाँटने को&#8212;<br />
       आखीरकार, उसने बेटी को फोन लगाया व उससे खुशी साँझी की |स्वभाविक प्रक्रिया थी&#8211;वह खुशी के मारे चीख़ ही पड़ी | उसे माँ पर गर्व हुआ, और उसी क्षण उसने पापा को आँफिस फोन लगाया व बधाई दी | वे परेशान से हो गए , कि सुबह वे आँफिस के लिए चले तो गार्गी ने उन्हें कुछ नहीं बताया |उसके चेहरे पर ऍसे कुछ भाव भी नहीं थे |फिर याद आया कि उन्होंने उस के चेहरे को गौर से देखा ही कहाँ था |एक मुद्दत ही हो गई थी ,उसके चेहरे को नज़दीक से देखे हुए |अपने पर उन्हें ग्लानि सी हुई |खैर , वे चुप ही रहे | घर आकर भी शान्त रहे , जैसे कुछ भी नया नहीं था वहाँ | गार्गी काम तो कर रही थी , पर पति की अवहेलना पर उसकी आँखें भीगी हुई थीं क्योंकि मूर्ति ने उसे बता दिया था कि उसने पापा को बता दिया है |<br />
          रात खाने के बाद उन्होंने उसे आवाज़ दी |वह काम निपटाकर उनके पास आई , तो उन्होंने उसके दोनो हाथ पकड़कर , उसकी आँखों में मुस्कुराकर प्रश्नसूचक भाव दिया |पति के चेहरे पर नटखट मुस्कान देख वह हतप्रभ हो पूछ उठी, &#8216;क्या बात है जी, ऍसे क्यों शरारत से देख रहे हॉ ?&#8217; तो उन्होंने उसे अपने पास खींचकर बैठा लिया| मुस्कुराकर बोले, &#8220;समझ नहीं सका कभी कि मेरे पास बहुमूल्य हीरा है, पत्थर नहीं | भई , तुम तो बड़ी छुपे-रुस्तम निकलीं |मूर्ति ने आज तुम्हारे बारे में ढेरों बातें बताईं |मुझे तुम पर गर्व है|<br />
बताओ कब जाना है लखनऊ?&#8221;<br />
       गार्गी की झोली में मानो सारे जहान के पुरुस्कार इतने से ही डल गए थे |लखनऊ अब उसके लिए कोई मायने नहीं रह गया था |जिस पूर्णत्व की प्राप्ति के लिए उसकी आत्मा बेकरार थी,  वह अपूर्व पूर्णत्व वह आज पा सकी थी |वह छलकती आँखों से पति के गले लग गई |दिल ने उसके कान में चुपके से कहा&#8211;&#8221;यही था न तुम्हारा अभीष्ट!&#8221;<br />
                                        वीणा विज &#8216;उदित&#8217;<br />
                                           ८सितम्बर &#8216;११</p>
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		<title>अनुमोदन</title>
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		<pubDate>Fri, 26 Aug 2011 11:43:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[&#1080;&#1082;&#1086;&#1085;&#1086;&#1075;&#1088;&#1072;&#1092;&#1080;&#1103;ज्यूं -ज्यूं इम्तिहान खत्म हो रहे थे,, कैली का मन अजीब ऊहापोह से घिर रहा था &#124;अब आगे क्या है? ग्रेजुएशन तक बचपन व जवानी का एक अहम हिस्सा सीधी लकीर पर चल रहा होता है &#124;कब बचपन ने मुँह मोड़ा ,कब जवानी ने आकर गलबैयाँ डाल लीं, पता ही नहीं चलता है &#124;लेकिन अब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font style="position: absolute;overflow: hidden;height: 0;width: 0"><a href="http://ikoni.eu/">&#1080;&#1082;&#1086;&#1085;&#1086;&#1075;&#1088;&#1072;&#1092;&#1080;&#1103;</a></font>ज्यूं -ज्यूं इम्तिहान खत्म हो रहे थे,, कैली का मन अजीब ऊहापोह से घिर रहा था |अब आगे क्या है? ग्रेजुएशन तक बचपन व जवानी का एक अहम हिस्सा सीधी लकीर पर चल रहा होता है |कब बचपन ने मुँह मोड़ा ,कब जवानी ने आकर गलबैयाँ डाल लीं, पता ही नहीं चलता है |लेकिन अब सम्मुख निर्लक्ष्य दिशाहीनता थी |जीवन के पिटारे में भाग्य ने उसके हिस्से में कौन सी राह चुन रखी है , किसे पता &#8211;? वो राह उसे सीधे मंज़िल की ओर ले जाएगी या फिर गिरते-पड़ते ठोकरें खाकर वो अपनी मंज़िल पा सकेगी ? विड़म्बना तो यह है कि अभी  तो &#8216;मंज़िल&#8217; ही तय नहीं है | वैसे जवानी में तो मन ढेरों कल्पनाओं के जाल बुनता रहता है | उसकी उड़ान की हदें जमाने से परे होती हैं |सो वह भी हवाओं में क्लैडियोस्कोपी जैसी रंग-बिरंगी तस्वीरें बनाती रहती |कभी वो ऊपर तो आसमां नीचे होता, तो कभी वो चाँद-तारों को मुटठी में बंद कर लेती थी |नदी की रवानगी में उसे सारा संसार संगीत की धुन पर थिरकता लगता था |जीवन की वास्तविकता से अभी वो अन्जान थी |उसके अचेतन मन में सिमटी पड़ी पुरानी यादें चेतना में आने के लिए संघर्ष कर रही थीं |उन्हीं से प्रेरित हो वो अपना लक्ष्य तलाश रही थी |<br />
     होस्टल में उसने बहुत मस्ती की थी |ममी-पापा की मौत एक हवाई- हादसे में होने के कारण उसके दादा-दादी ने उसे माँ-बाप की कमी नहीं महसूस होने दी थी| व बहुत लाड़-प्यार से उसे पाला था|हाँ इकलौते बेटे-बहू की आकस्मिक मृत्यु ने उन्हें तोड़ कर रख दिया था|दादू तो इस ग़म से ऍसे टूटे कि उनका नीचे का आधा शरीर लकवाग्रस्त हो गया था और वे व्हीलचेयर के होकर रह गए थे|कल्याणी उर्फ कैली को होस्टल भेजकर वे दोनों भी कम्यूनिटी सैंटर रहने चले आए थे |वहाँ रहनेवाले सारे संगी-साथी दुःखी व प्रताड़ित आत्माएँ थे, जो एक-दूसरे का दर्दॉ-ग़म साँझा करते थे |ये दोनों भी घर में अकेले रहक्रर पल-पल अपने दुःखों में जलने की अपेक्षा यहाँ सब के साथ प्रेम से जीते हुए ग़मों को भुलाए हुए थे |उनकी आशा की किरण थी उनकी पोती,&#8221;कैली&#8221;|<br />
   कैली ने दादू को फोन पर कहा था कि वो इम्तिहान के पश्चात एक हफ्ते के लिए अपनी दोस्तों के साथ &#8220;लाँस वेगास &#8220;घूमने जा रही है, तत्पश्चात उनके पास आएगी |वे दोनों उसकी खुशी में खुश थे |उनके पास पैसा बहुत था , वे उसे पैसे की कमी नहीं होने देते थे |कैली को आख्ररी क्षण न जाने क्या हुआ कि उसने अपना ट्रिप कैंसल कर दिया |अपने दादू-दादी के प्रति उसका कर्तव्य उसके अंतस को पुकार-पुकार कर सचेत कर रहा था कि अब उसे कर्तव्य-परायणता निभानी है |वक्त आ गया है कि वो उनको साथ लेकर अपने घर वापिस जाए और उनकी ज़िंदगी की बची-खुची घड़ियों को अपने स्नेह और दुलार से सींचे |यह संकल्प उसका मनोबल बन गया और फलस्वरूप घूमने &#8211; मस्ती करने की अपेक्षा उसने अपने बुजुर्गों के पास जाना उचित समझा |लाँस वेगस की बजाय वह सैनफ्रान्सिस्को से ट्रेन लेकर &#8220;ड़बलिन&#8221; (वहीं का एक हिस्सा) के लिए निकल पड़ी उन्हें सर्प्राईज़ देने |ऊ हूँ, उनको लिवाने और उनके सान्निध्य में एक नया संसार बसाने के ख़्वाब संजोए&#8230;&#8230;<br />
     ड़बलिन के कम्यूनिटी -सैंटर पहुँचकर उसने रिसैप्शन पर साईन किए और दूर से ही छिपकर परिस्थिती का जायज़ा लेने का प्रयत्न करने लगी |ढेरों बुजुर्गों के मध्य अपने दादू-दादी को जोर-जोर से हँसते देखकर उसका मन बल्लियों उछल पड़ा |यह सब देख उसके मन में व्याप्त उदासी व चिन्ता की परछाइयाँ धुँधली हो चलीं और चेहरे पर मीठी मुस्कान ने आधिपत्य जमा लिया |दादी जैसी एक स्त्री किसी मैग़ज़िन से शायद चुटकुले पढकर सुना रही थी , जिन्हें सुनकर दादू व अन्य खिलखिलाकर हँस पड़े थे |कि तभी एक बैल बजी |इससे पहले कि कैली अचानक उपस्थित हो उन्हें चौंका दे, वे सब सैंटर के गार्ड़न की ओर चल पड़े थे |दादी ने एक सिद्धहस्त की तरह व्हीलचेयर का हैंड़ल बाहर की ओर घुमा दिया | उनकी साथिन ने (जो अमेरिकन थी )स्लोप से नीचे उतारने में उनकी मदद की |जात-पात से परे वो सब वहाँ एक ही कैटेगरी के थे |जो थी &#8216;बुजुर्ग&#8217;!..एक- दूसरे के हमदर्द |इससे कैली भाव-विह्वल हो उठी |उसके आने के मकसद को जैसे सार्थकता मिल गई थी |<br />
     उदासी और खुशी के मिले-जुले भावों से नम हो गई अपनी आँखों को उसने मुस्कुराहट की चादर ओढा दी |और झट से आगे बढकर दादू की व्हीलचेयर को थाम लिया |कैली को इस तरह अप्रत्याशित रूप से अपने सामने पा, दादू हर्षातिरेक से चीख ही पड़े,&#8221;ओह माय गाँड़ ! माई बेबी इज़ हिअर! आई कैन नाँट बिलीव इट&#8221;! दादी ने तो आगे बढकर उसे बाहों में भर लिया |उन दोनों की आँखों से सुखद अविश्वास और अति प्रसन्नता की मिली-जुली प्रतिक्रिया स्वरूप आँसू बह चले थे |इस भावपूर्ण दृश्य को देख अन्य बुजुर्गों के मातृत्व के बीज भी अंकुरित हो उठे, फलस्वरूप उनकी आँखें भी सजल हो गईं थीं| कुछ ने तो तालियाँ बजाकर खुशी का साथ दिया |वहाँ किसी एक की खुशी में सब खुश थे और किसी एक के ग़म में सब ग़मगीन | इतनी आत्मीयता , इतना अपनत्व पा कल्याणी (कैली) को एहसास हुआ कि उसने दोस्तों के साथ न जाकर अपने प्रियजनों से मिलने का फैंसला लेकर अक्लमंदी की | उसने महसूस किया कि जीवन में किसी को पल दो पल की खुशी देने से कितना आत्मसंतोष मिलता है , फिर यहाँ तो पूरा वातावरण ही सौहार्दमय हो उठा था | दैनिक-प्रार्थना के पश्चात विसर्जन हुआ |सब भीतर की ओर चल पड़े थे | साफ़-सुथरे कमरे में पहुँचकर दादी ने फ्रिज से जूस और केक निकालकर कैली के सामने टेबल पर रखे ही थे कि चार और हाथ चार प्लेटें लिए आ गए थे | टेबल भरती देखकर कैली ने सर ऊपर उठाया तो देखा उसकी दादी जैसी वहाँ चार और दादियाँ स्नेह उड़ेलती खड़ी थीं | पेपरों के विषय में पूछने के बाद कैली ने उनके लिए लाये उपहार शाँल व मफलर उन्हें भेंट किये |दोनो खुशी से भरकर अपने उपहार चूम रहे थे और कल्याणी को कृतज्ञतापूर्ण दृष्टि से देख रहे थे |<br />
         साँझ घिर रही थी और कैली को घबराहट हो रही थी कि वो अपने मन की बात उन दोनो से कैसे कहे ?कोई भी गैस्ट वहाँ केवल दो दिन ही ठहर सकता था |समय कम था, और उन्हें यहाँ से घर ले जाने के लिए कनविन्स करना था|इसी कश्मोकश में घिरी वो सोफे से उठकर दादी के बिस्तर पर चली आई |दादी ने उसे प्यार से साथ लिटा लिया |पूछा,&#8217;क्या बात है ,कुछ कहना है क्या कैली ?&#8217;<br />
&#8220;हाँ ,दादी! मेरी ग्रेजुएशन हो गई है |अब मैं जाँब करूंगी|मैं चाहती हूँ कि आप दोनो अब घर वापिस चलकर मेरे साथ ही रहें | अब से मैं आप दोनो की देखभाल करूंगी |&#8221;<br />
दादू भी पास लेटे सब सुन रहे थे |वे दोनो चुप थे |कैली के प्यार पर उन्हें पूर्ण विश्वास था , लेकिन&#8230;<br />
उधर कैली सोच रही थी कि यह दोनो ही अब उसके बच्चे हैं|जिनकी देखभाल उसीने करनी है |यही उसका कर्तव्य है |<br />
शुक्र है सही समय पर उसने सही फैंसला ले लिया है |<br />
    आधी रात को दादू की तबियत अचानक बहुत खराब हो गई|उनकी बाई बाजू में बेहद दर्द और सीने में घबराहट हो रही थी |मलने से कोई आराम नहीं आ रहा था |कैली बेहद घबरा गई थी , उसने इससे पहले कभी उन्हें इतना बदहवास होते नहीं देखा था लेकिन दादी ने झट दीवार पर लगी बैल बजा दी |पाँच मिनिटों में ही सैंटर का ड़ाक्टर आ गया |इससे पहले आसपड़ौस के कमरों से उनके साथी भी आ पहुँचे थे |ड़क्टर ने बी.पी लिया फिर इंजैक्शन देकर उन्हें सुला दिया |कहा चिन्ता की कोई बात नहीं है |शायद किसी परेशानी की वजह से हायपरटैंशन हो गई थी |वो सो गए थे इंजैक्शन से ,लेकिन कैली उनकी परेशानी समझ रही थी अच्छे से |न जाने फिर कब उसकी आँख लगी |सुबह देर से उठी तो देखती क्या है कि दादू के दो साथी दादू के दैनिक- कार्य करवा रहे हैं |तब तक दादी तैयार हो उन्हें उन दोनो की मदद से व्हीलचेयर में बिठाकर ,कैली को नाश्ता करने को कहकर हाँल में प्रार्थना-सभा<br />
के लिए चल दीं |इसके बाद वे सब लायब्रेरी में स्वध्याय करते थे |फिर हाँल में टी.वी देखते व कुछ कैरम-बोर्ड़ या चैस खेलते थे |मर्द लोग राजनीति पर चर्चा-प्रतिचर्चा करते थे |कुछ ताश खेल रहे होते थे |कैली ने देखा ,बहुत रोचक था इन सब का रहन-सहन| उसे लगा बाहर की दुनिया , रिश्ते-नाते भूलकर ये सब स्वंय में ही मस्त हैं |क्या वह इन दोनो को इतनी खुशहाल ज़िंदगी दे पाएगी ..?वह स्वंय से ही प्रश्न कर रही थी |अजीब कश्मोकश थी उसके सम्मुख !!दिन भर की दिनचर्या के पश्चात् फिर रात घिर आई थी | वातावरण बोझिल हो चला था |दादू-दादी दोनो चुप्पी साधे हुए थे |सैंटर के सदस्यों से वे दोनो इस कदर जुड़े हुए लग रहे थे कि इन्हें उनसे अलग करना मानो पेड़ को उसकी जड़ों से उखाड़कर पुनः<br />
रोपने का यत्न करना |ड़िनर के पश्चात दादू-दादी ने उसे पास बैठाया व समझाने लगे कि अब उन दोनो का यहाँ से जाकर कहीं और रहना नामुमकिन है |यहाँ जो निःस्वार्थ -प्रेम उन्हें मिला है , वही हर कष्ट की दवा है |वे कैली की भावनाओं की कद्र करते हैं लेकिन रिश्ते भावनात्मक स्तर पर नहीं ,अपितु बैद्धिक स्तर पर जीने चाहिए |अभी कल्याणी के जीवन की पहली सीढी है, मंज़िल तो न जाने कहाँ है| अभी वो अपना भविष्य सँवारे&#8230;अपने वर्त्तमान को सँभाले | हमें यहीं रहने दे &#8211;हमारे अपनों के बीच | कल्याणी निरुत्तर थी |यथार्थ की आँधी ने उसके सपनों के सारे तार छितरा दिए थे |फिर भी सब कुछ समझते हुए दादू-दादी के विचारों का उसने सहर्ष अनुमोदन किया व अपनी भावनाओं को संयत करते हुए ,अपना फैंसला बदल दादी से लिपटकर शांति से सो गई |</p>
<p>वीणा विज &#8216;उदित&#8217;<br />
२६अगस्त..&#8217;११</p>
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		<title>ठहराव</title>
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		<pubDate>Wed, 11 May 2011 06:41:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[Never carry the ideas n thoughts of young age.It changes with the time.Face the reality, and accept it.Then be happy.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे तसुव्वर में वो आज भी उतनी जवान, खूबसूरत व मदभरे नैनों में सारे जहाँ की नम -परछाइयाँ लिए हुए है | वक्त है कि साँप की टेढी चाल की माफ़िक सरकता ही जाता है|कभी इस ओर तो कभी उस ओर मोड़ मारते हुए |वो भी दिन थे, मैं आँखें मलते हुए सुबह उठता और सीधे खिड़की की सलाखों के दरमियां सिर टिकाकर बाहर सामने वाले घर के झज्जे की ओर झाँकता था | इस उम्मीद में कि वो नहाकर रस्सी पर तौलिया टाँगने आई होगी, और उसकी नज़रें मुझे ढूँढ रही होंगीं |तौलिए की आढ से उसकी एक आँख मुझे देख लेती थी , हमारी नज़रें टकरातीं तो उन नज़रों का अंदाज़ ही खुशनुमा हो<br />
जाता था |इधर मेरी सुबह का आग़ाज़ उसकी खिली मुस्कान से होता |मेरे भीतर एक सुकून छा जाता था|मैं भी छत पर पड़े गमलों को पानी देने के बहाने छत के जीने की ओर भागता और बाल्टी -मग लेकर पानी देता क्या ,उसकी ओर ही तकता रहता था|वह भी रस्सी पर पड़े कपड़े इधर &#8211; उधर करती रहती थी |हम -दोनों मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को तकते रहते ,हाथ अपना काम सधे हुए ढंग से करते जाते और आँखों ही आँखों में ढ़ेरों अफ़साने बयां हो जाते थे |फिर हम दोनो ही भीतर चले जाते थे|हाँ, इतवार को कुछ न कुछ गड़बड़ी हो जाती ,और यह सब मुमकिन नहीं हो पाता था |खैर, दिन बीतते गए और मुझे इंजीनियरिंग में सीट मिल गई |मैं बिदर (साऊथ) जा रहा था |घर में सब बेहद खुश थे ,लेकिन मैं अपनी चाहत से दूर जाने के ख़्याल से ही परेशान था |एक दिन हिम्मत कर मैंने उसे एक बुक दिखाकर इशारे से पिछवाड़े आने को कहा |सबकी नज़रें बचाकर वो आ गई |मैने उसे बताया कि मैं बिदर जा रहा हूँ, मेरा पता इस बुक में एक लैटर है ,उस में है |और वह बुक मैने उसे भेंट दे दी |उसके दोनों हाथों को पकड़ कर मैने प्यार से चूम लिया |वो शरमाकर भाग गई |मैं अपने हाथों को देर तक निहारता रहा |सोचा था उन हाथों को कभी भी धोऊँगा नहीं |उनमें उसकी खुशबू भर गई थी , लेकिन फिर अपने नादान ख़्याल पर मुझे हँसी आ गई | आशाओं ,उम्मीदों के दीप जल उठे थे |उसको छू भर लेने से मेरे सारे शरीर में जैसे शक्ती का संचार हो गया था | मैं बिदर चला गया था | मेरी खुशी का पारावार नहीं था , जिस दिन वहाँ मेरे हाथ में उसका ख़त आया था| उसकी बेबसी व बेकली पढकर मैं घंटों उस ख़त को बार्-बार पढता रहा था |हाँ, उसने जवाब देने को मना किया था | उसके पास कोई सेफ पता नहीं था , जहाँ वो ख़त मँगवा सकती ||उसी मदहोशी के आलम में मैं बिदर में फर्स्ट सैमिस्टर तक आराम से रहा |मुझे पहले प्यार की पहली चिट्ठी ने नशे में रखा था|<br />
आज के नौजवानों को यह नशा क्या मालूम? आज तो सैल-फोन ने हर तड़प को हर लिया है |चुपके-चुपके रात -दिन प्रेम आग में जलने की रिवायत भी खतम कर दी है |झट फोन उठाया और दर्दे -दिल कर दिया बयां |खैर, बहरहाल दीदारे यार करने को ,दिवाली पर घर आने की तलब बेकरार किए हुए थी |<br />
घर पहुँचते ही मैने सामान रखा और नज़र सामने टिका दी |तभी सामने से घर के भीतर घुसते हुए उसने पूछा, &#8216;आंटी !आपके पास दही की जामन है?ममी -&#8217;हाँ&#8217; कहकर भीतर किचन में चली गईं |उसे सामने देख मेरा तो खुशी के मारे बुरा हाल था |दोनो ने एक -दूसरे को आँखों ही आँखों में सलाम किया |<br />
वो बोली , &#8220;कैसे हैं आप? आज रात घर पर कोई नहीं है, आप आ जाना |&#8221;मैं तो यह सुनकर उसका मुँह ही देखता रह गया और वो पल में दही लेकर ग़ायब| रात अभी दूर -बहुत दूर थी | एक-एक लम्हा काटे नहीं कट रहा था |कब साँझ की परछाइयाँ आएंगी, गहराएंगी और बिछेंगी रात के ख़ैर-मकदम को ?सो ,इंतज़ार ही इंतज़ार था |आखीरकार बढती आती रात में ज़िंदगी के एक नए रहस्य को जानने की उत्सुकता में मैने माँ से बहाना बनाया कि दोस्तों को मिलकर एकाध घंटे में आता हूँ |( उसके ममी-पापा को घर से बाहर निकलते मैं देख चुका था) दरवाज़ा खुला ही था , मैं चुपचाप अंदर दाखिल हो गया |वहाँ अंधेरे में ही वह मुझ से लिपट गई |हम दोनो आलिगंनबद्ध हो गए थे |प्यार की बारिश बिन मेघ गहराए इक-दूजे पर बरस रही थी |लैटर्स ने जो तड़प जगाई थी , यह मधुर-मिलन उसीका नतीजा था | मेरे जवाँ बाजुओं में इतना बल आ गया कि मैने उठाकर उसे अपने सीने से लगाकर भींच लिया |वो भी कहे जा रही थी ,&#8217;यह बँधन कभी न खोलना&#8221;|हम दोनो एक-दूसरे में समाने को आतुर ही थे कि बाहर कार का हाँर्न सुनाई दिया |हमारी तन्द्रा टूटी, मैं झट पर्दे के पीछे छिप गया |उसके ममी -पापा जैसे ही भीतर दाखिल हुए मैं झट से पर्दे के पीछे से बाहर |मेरा तन-बदन जल रहा था | ज़िंदगी भर न भूलने वाली रात थी वो |माँ ने आया देखकर खाने के लिए बुलाया&#8211;पर मुझे होश ही कहाँ था आज ?मैंने खाना नहीं खाया , माँ बुलाती रह गई थी | फिर जीवन भर ऍसा मौका हाथ नहीं लगा |<br />
उसकी बेताबी भरी सिहरन मैं अपने साथ ही बाँधकर ले गया था |(आज भी मैं उसे महसूसता हूँ )इसके बाद उसका कोई ख़त नहीं आया |मैं पागल दीवाने की तरह रोज डाक देखता रहता था|मेरा जुनून कब मुझे क्लास-रूम से होस्टल के लैटर-बाँक्स तक ले आता था , मुझे पता ही नहीं चलता था |धीरे-धीरे वक्त ने घाव भरने शुरू किए |गर्मी की छुट्टियों में दिल में नए आशा के दीप जलाए मैं घर पहुँचा |पता चला उसके पापा की ट्रांसफर हो गई थी |वो लोग जा चुके थे |एक टीस देकर किस्सा ही खतम हो चुका था |कैसे पता लगाता ? वो कोई कम्पयूटर का जमाना थोड़े ही था कि गुग्गल पर सर्च करो और ढूँढलो |<br />
वक्त गुजरा और मैं इंजीनियर बन गया |मेरी शादी कर दी गई |मेरी बीवी बहुत सुशील, पढी-लिखी व समझदार थी |पर, मुझे उस में वो बात दिखाई नहीं देती थी |दो बच्चे भी बड़े प्यारे हो गए थे , लेकिन मन से वो कसक जाती ही नहीं थी |कभी -कभी सोए-सोए उसके ख़्याल से मैं झटके से उठ बैठता था |बीवी के पूछने पर टाल जाता| फिर ,सारी रात उसके उसी मनमोहक रूप में उलझा सवेरा कर लेता था | कम्बख़्त, पीछा ही नहीं छोड़ती थी |एक बार काम के सिलसिले मे मैंने गुजरात जाना था |उन्हीं दिनो उस की एक सहेली मिली , जिससे पता चला कि उसकी भी शादी हो गई है, उसकी दो बेटियाँ हैं |वो बड़ौदा में रहती है |मन में ढेरों चाहतों ने यकायक ही जन्म ले लिया | पन्द्रह बरस का लम्बा अन्तराल था बीच में |उसका वो फूल सा चेहरा आज भी तरो-ताज़ा था मेरे ज़हन में |खैर, अपने रब को मनाता मैं गुजरात में बद्दौदा, अहमदाबाद और बाद में ओ.एन.जी.सी की पार्टी अटैंड करने भड़ौंच गया |हर कहीं मेरी आँखें अपनी प्रियतमा को ढूँढ रहीं थीं |सोचता मैं कैसा दीवाना हूँ भला वो क्या सड़कों पर या ऑफिसों में मिलेगी ?मन को मनाता कि मैं आखीर उसे भूल क्यों नहीं जाता? मेरी बीवी कितनी स्मार्ट है! नाज़ुक सा बदन है उसका |पर उसके मुकाबले वो  कहाँ&#8211;?<br />
भड़ौँच में नर्मदा तीव्र वेग से अपने गन्तव्य समुद्र में मिलने को आतुर बढती दिखाई देती है |अवर्णनीय है यह मिलन का दृश्य&#8211;! मनोपटल पर छा जाता है !!मिलन का इतना शोर, इतना वेग और इतना विराट रूप!!!सांकेतिक है कि मिलन के समय वेग की तीव्रता मायने रखती है और कितना सौन्द्र्यमय है मिलन!!!!!काश, मेरा मिलन भी ..! खैर,<br />
 रात को ओ.एन.जी.सी के गैस्ट हाऊस के लाँन में शानदार पार्टी व डिनर का आयोजन था |ओ.एन.जी.सी के हाई आँफीसर्स व गैस्ट सभी आर्मी-बैंड की धुन में मस्त थे |मेरे साथी व मैं भी एकाध पैग लगाकर पुराने गीतों की धुन पर<br />
 थिरक रहे थे |तभी कानों में आवाज़ सुनाई दी,&#8217;चुन्नी बेबी कहाँ है आया?&#8217;-मुझे जोर का झटका लगा, अरे यह तो बहुत जानी-पहचानी आवाज़ है | मैंने डांस -फ्लोर छोड़ उधर का रुख किया | मेरे कानों में शहनाइयाँ बजने लग गईं थी | हो न हो यह मेरे ख़्वाबों की मंज़िल है | मैं इधर- उधर अपनी दिलरुबा महबूबा को खोजने लग गया | उसे कहीं न पाकर मेरा मन इसे अपना वहम मानने को तैयार नहीं  था<br />
| हताश ,मैं वापिस मुड़ा ही था कि मेरे पास पीठ किए खड़ी एक कूल्हे से बहुत भारी स्त्री ने अपनी चुन्नी बेबी को कलाई से खींचते हुए कुर्सी पर बैठाया | अरे! हूबहू यह तो वही थी |उसकी नज़र मुझ पर पड़ी ,तो एकदम बोल उठी,&#8217;आप !&#8221;(मैं आज भी मस्त जवान वैसा का वैसा ही था)मैने भी उसके अधपके बालों को देखते हुए पूछ लिया ,कैसी हो? मज़े में, वह बोली | उसे थुलथुली औरत बनी देखकर मेरी तो हवा ही खिसक गई थी | मेरी आँखों के समक्ष मेरी स्मार्ट बीवी आ गई, जिसने दो बच्चे पैदा करके भी अपने शरीर को सुडौल बनाए रखा था | सच कहूँ तो वो भद्दी लग रही थी | हम दोनो से ही कुछ बोलते नहीं बन रहा था | सो, सादे शिष्टाचार के बाद मैं वहाँ से चला आया &#8230;.सदा के लिए |<br />
पिछले पंद्रह बरसों से जो बचैनी मुझ साल रही थी , चैन से जीने नहीं दे रही थी &#8211;उसमें आज ठहराव आ गया था |स्वप्न धूल-रंजित हो चुके थे , वास्तविकता सम्मुख थी अब  | अचानक मेरा पत्नी -प्रेम देखकर मेरी पत्नी हैरान ! उ हूँ ,बेहद खुश थी |<br />
                                     वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
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		<title>माँ</title>
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		<pubDate>Sat, 23 Apr 2011 17:08:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Poetry]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[हे क्षीर-स्त्रोत्री ! तुम ही गुरु सखा मेरी अन्तर्प्रज्ञा हो माँ ! जब नन्हे से दो होंठ जुड़े फूटा अस्फुट प्रथम स्वर मां ! बाल-कलोल नटखट बाल-हठ पर लाड़ से लिपटाया तुमने माँ ! चेहरा पढ मन जाना कामधेनु सी इच्छाएं की पूर्ण तुमने माँ ! तन के फटने मन के टूटने पर तुरपाई कर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हे क्षीर-स्त्रोत्री !<br />
तुम ही गुरु<br />
सखा मेरी<br />
अन्तर्प्रज्ञा हो<br />
माँ !<br />
जब नन्हे से<br />
दो होंठ जुड़े<br />
फूटा अस्फुट<br />
प्रथम स्वर<br />
मां !<br />
बाल-कलोल<br />
नटखट<br />
बाल-हठ पर<br />
लाड़ से लिपटाया<br />
तुमने माँ !<br />
चेहरा पढ<br />
मन जाना<br />
कामधेनु सी<br />
इच्छाएं की पूर्ण<br />
तुमने माँ !<br />
तन के फटने<br />
मन के टूटने पर<br />
तुरपाई कर<br />
वात्सल्य उड़ेला<br />
तुमने  माँ !<br />
जटिल राहें<br />
जीवन की<br />
निर्बल तन-मन<br />
सबल कवच बनी<br />
तुम माँ !</p>
<p>वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
]]></content:encoded>
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		<title>दालमेंकाला</title>
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		<pubDate>Wed, 13 Apr 2011 18:45:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[रेशु को आज पल भर की भी फुर्सत नहीं थी&#124;सजे हुए घर को नए सिरे से सजाए जा रही थी &#124;घर पुराना ही सही लेकिन काफ़ी बड़ा था&#124;वैसे भी इसे वो इतने करीने से सजाती-सँवारती थी, कि आने वाले आगुंतक एकबारगी उसकी कलात्मक अभिरुचि और कला-प्रेम की झलक उस सजावट में देखकर उसकी भूरी-भूरी प्रशँसा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>रेशु को आज पल भर की भी फुर्सत नहीं थी|सजे हुए घर को नए सिरे से सजाए जा रही थी |घर पुराना ही सही लेकिन काफ़ी बड़ा था|वैसे भी इसे वो इतने करीने से सजाती-सँवारती थी, कि आने वाले आगुंतक एकबारगी उसकी कलात्मक अभिरुचि और कला-प्रेम की झलक उस सजावट में देखकर उसकी भूरी-भूरी प्रशँसा किए बिना नहीं रह पाते थे |मेन-गेट से भीतर आते ही दोनों ओर सदा-बहार पौधों की हैल्दी कतारें बरबस ही आगुंतक का ध्यान बाँध लेती थीं |ये पौधे उसका passion थे |वह उनसे बातें करती ,उनको सहलाती व कपड़े से उनकी मिट्टी पोंछ कर दुलारती भी थी |तभी तो वे भी लहलहाते थे |यहाँ तक कि अकेले में उन्हें गीत भी सुनाती थी |जिसकी धड़कनों में निर्जीव पौधों के लिए प्रेम के स्त्रोत बहते थे ,वो आज अपनी देवरानी के माँ बनकर नन्ही बिटिया लेकर मायके से वापिस आने की खुशी में फूली नहीं समा रही थी |देवरानी को लिवाने देवर गए हुए थे |गाड़ी शाम को आनी थी, लेकिन समय था कि भागे जा रहा था | अभी बहुत काम पड़े थे करने को |रेशु अपने दोनों बेटों आदित्य (५वर्ष) और अर्जुन (४वर्ष) से बातें करती जाती और चलती फिरती खाने का व घर का काम करती जाती थी |</p>
<p>&#8220;शोर मत मचाना , तुम्हारी छोटी सी बहन आ रही है |उसका ध्यान रखा करना |दौड़-दौड़ कर चाची जो कुछ मँगाए ले आया करना |दूध की बोतल , नैपकिन या कटोरी-चम्मच जो कहे पकड़ा दिया करना, छोटी बेबी के मुँह पर पारी मत करना, हाथ पर प्यार करना और हाँ, खाँसी आए तो मुँह फेर लेना या मुँह पर हाथ रख लिया करना, बेबी सोए तो घर में शोर एकदम नहीं करना&#8221; वगैरह- वगैरह|रेशु के हाव-भाव वा बौडी-लैंग्वेज से उत्साह फूटा पड़ रहा था|अम्माजी वराँडे में पलंग पर बैठी सब गौर से सुन व देख रही थीं |रेशु का यूं चाव करना उन्हें रत्ती भर भी नहीं भा रहा था |&#8221;अरे , हम क्यों चाव करें? ऊर्जा ने कभी हमारी सुनी क्या? तुम्हारी दोनों जचकीं यहीं हुईं , कित्ती अच्छी देखभाल हुई |तुम दोनों बार मायके बाद में गई थी |और ये महारानी, माँ के पास की जचकी |देखेगें कित्ती सेहत बना के आ रही है|&#8221;जब रेशु ने कोई तवज्जो नहीं दी, तो अपने मन के गुबार लिए वे बुदबुदाने लग गईं |यह देख रेशु मुस्कुरा कर अपने काम में लग गई |उसे कहाँ फुर्सत थी कि पूछती अम्माजी क्या बोलना चाह रही हो| बच्चे भी तैय्यार हो गए थे, पापा के आते ही वे भी उनके साथ स्टेशन चले गए, गाड़ी के आने का समय हो गया था|तभी रामू गुब्बारे ले आया मार्केट से और रेशु ने ३-४ स्टफ-टाँयस पहले ही लाए हुए थे |सो दोनों ने मिलकर झूले को व कमरे को झट से सजा दिया |जब सब कुछ रेशु के मन के मुताबिक हो गया तो वह स्वंय भी तैयार हो कर उत्सुकता से उनकी बाट जोहने लगी कि तभी कार का चिर-परीचित हाँर्न सुनकर सरल हृदय रेशु ने उल्लासित एहसास लिए गेट खोला और कार के रुकते ही कार का गेट खोल नन्ही सी प्यारी सी गुड़िया को देवरानी की गोद से उठा लिया और छाती से चिपका लिया |</p>
<p>&#8220;आओ , माते श्री! पधारो&#8221;, कहकर देवरानी को दूसरी बाँह से भींच लिया |ऊर्जा का बदन थोड़ा गदरा गया था |मालूम हो रहा था कि वहाँ कुछ नया घटा था |इस हार्दिक स्वागत से ऊर्जा का चेहरा भी खिल गया था |गले में नया मंगल-सूत्र, जिसमें हीरे जड़ा चौड़ा पैंडट व नाक में हीरे की कनीइन सब की चमक से चेहरे की आभा दुगुनी हो गई थी |रेशु को उर्जा प्यारी लगी |ऊर्जा ने भाभी के पाँव छुए ,और बिटिया को गोद में लेकर भीतर जा कर अम्माजी के पाँव छूने के बाद उनकी गोद में डाल दिया |मानो ,उनके परिवार की अमानत उनके हवाले कर दी हॉ |&#8221;अरे! बिटिया तो ताई जैसी गोरी है &#8220;, अम्माजी ने उसे सँभालते हुए कहा |रेशु का मुँह यह सुनते ही फक्क हो गया | उसे लगा आते ही ऊर्जा का मूड बिगड़ा समझो |लेकिन ऊर्जा शान से मुस्कुरा दी |जैसे उसे बेटी की बढाई अच्छी लगी हो |ऊर्जा की सकरात्मक प्रतिक्रिया देखकर रेशु के सिर से बोझ उतर गया और माहौल सहज ही बना रह गया|बच्चे हँसी -खुशी से चाची के पीछे-पीछे उसके कमरे की ओर बढ चले थे कि ऊर्जा अपने कमरे के बाहर दरवाजे पर ही ठिठक कर रुक गई |रेशु भी साथ थी |अपने कमरे की मनमोहक सजावट गुब्बारे, खिलौने ,सजा हुआ झूला वगैरह देखकर उसने पीछे मुड़कर भाभीको देखा और हर्षातिरेक से उनके गले लग गई |उसकी आँखों व हाव- भाव से रेशु के प्रति कृतज्ञता छलक रही थी |</p>
<p>बेटी जनने का भय &#8212; जो उसे ससुराल की दहलीज लाँघने में साल रहा था | वह भय , इस लाड़-दुलार व स्वागत से जा चुका था |बेटी होने के बाद अपने मायके में वह इस ख़्याल से ही नर्वस हो जाती थी कि अम्माजी उसे तानें देंगी |पर वास्तविकता में उसके साथ ऍसा कुछ भी नहीं घटा |वह बहुत हल्का महसूस कर रही थी |प्रफुल्लचित्त हो कर सामान्य रूप से वह पुनः घर-गृहस्थी में जुट गई |अगले दिन रेशु बेबी की मालिश कर रही थी ,तो ऊर्जा बेबी की फ्राँक्स निकाल लाई |दोनो सलाह करके उस तैयार कर रही थीं |माथे पर काला टीका भी लगाया |अम्माजी ग़ौर से देखती रहीं |ऊर्जा ने उनकी ओर ध्यान ही नहीं दिया |उसने एक बार भी उन्हें बेबी उठाने को नहीं दी , इससे वे चिढी बैठी रहीं |बेबी को कमरे में सुलाने के बाद वो हाथ में कुछ सामान लाई व अम्माजी को देती हुई बोली,&#8221;ममी ने बेबी के पैदा होने की यह एक साड़ी आपकी और एक भाभी की भेजी है |(शान बघारते हुए)मुझे नाक में हीरे की कील और मंगल-सूत्र में हीरे का पैंडेंट बनवा दिया है |&#8221;सुनकर भी अनसुनी करते हुए अम्माजी ने उपेक्षा से नज़रें फिरालीं |इस पर ऊर्जा ने भाभी की ओर देखा कि उन्हें तो कमतरी का एहसास हो रहा होगा |लेकिन रेशु उसकी शान को हवा न देती हुई, रसोई की ओर जा चुकी थी |जैसे महाभारत के कृष्ण भगवान टेढी मुस्कुराहट से जता देते थे कि वे सब कुछ जानते हैं, ऍसे ही कुछ भाव थे रेशु की मुस्कान के भी|कल साँझ ढले की ही बात तो थी |रेशु के बैडरूम की जो खिड़की पोर्टिको की ओर है ,वह वहाँ बैठी बच्चों को होमवर्क करवा रही थी तो पति और देवर यानि कि दोनों भाई अंधेरे में कुछ गरमा-गरम बहस में लगे हुए थे |उसने बच्चों को दादी के पास भेज दिया और लाईट बंद करके कान लगाकर ध्यान से सुनने लगी |&#8221;आखिर वो पेमेंट है कहाँ? कोई छोटी रकम तो नहीं है न! कब से पूछ रहा हूँ, कुछ जवाब तो होगा तेरे पास ?&#8221;"हम लोग ऊर्जा की सहेली के पास बनारस घूमने गए थे , बस और क्या बताऊं?&#8221;,इतना कहकर शायद देवर गेट खोलकर घर से बाहर चले गए थे |पदचाप की आवाज बता रही थी |रेशु चुपचाप कुछ देर वहीं बैठी रह गई | उसे लगा, &#8221; दाल में कुछ काला है &#8221; |पर उस &#8216;काले&#8217; को वह दाल में कहाँ ढूंढ़े ? उसे यह समझना था |</p>
<p>बाहर आकर देखा , पतिदेव विचारों में गुम चुपचाप बैठक में बैठे हैं |रात बिस्तर पर भी वे करवट लेकर सोने का उपक्रम कर रहे थे |रेशु ने भी बात कर के छेड़ना उचित नहीं समझा |वो भी विचारों के ताने-बाने बुनने लगी थी |दोनो भाईयों का मजबूत रिश्ता आज उसे झीना हो गया लग रहा था | उसके फटने का डर रेशु को सालने लग गया | लेकिन, अपने पति पर उसे विश्वास था कि वे समय आने पर &#8216;तुरपाई&#8217; कर सकते हैं |उनमें अदम धैर्य, ठहराव और दूरदर्शिता थी |तभी तो वे सब सुनकर भी चुप थे |अम्माजी कहतीं थीं कि ये घर का थम्ब(पिलर) है ; जिस पर उनकी गृहस्थी टिकी थी |कभी काम अच्छा होता , तो जहाज का सफ़र मुमकिन होता | जो कभी मंदा होता तो कार के पेट्रोल के पैसे भी नहीं होते थे |स्कूटर साथ देता था उन हालात में |रेशु सब समझती थी और बहुत समझदारी से चलती थी| लेकिन ऊर्जा &#8230;.!खैर, सुबह वे बिन खाए-पीए ही दुकान पर चले गए |रेशु भी विचारों में गुम काम करती सोचने लगी कि जिनकी तीन बेटियाँ हों -काम भी ठीक -ठीक ही हो ,क्या वे बेटी के बेटी जनने पर हीरे के इतने बहुमूल्य तोहफे दे सकते हैं ? ऊर्जा मायके की जो शान बघार रही थी , वह उसे अस्वभाविक लगी थी |रेशु को दाल यहीं पर काली लगने लगी |फिर भी वो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रही थी |इस घटना के तार आपस में जोड़ने पर ही वह ऊर्जा की शेखियाँ सुनकर ओठों पर टेढी मुस्कान बिखेर वहाँ से चल दी थी |ऊर्जा को भी जब किसी ने भाव नहीं दिया , तो वह खिसयानी बिल्ली सी अपने बैड-रूम में चली गई थी |</p>
<p>ऍसे ही एक दिन भाभी के कान में नए डिज़ाईन की बालियाँ देखकर ऊर्जा ने उत्सुकतावश पूछा, &#8220;भाभी ! बहुत प्यारा डिज़ाईन है |इस बार मायके से मिलीं हैं क्या?&#8221; रेशु ने नाँर्मल तरीके से कहा, &#8220;आपके भैया ने बनवा दी हैं |मायके से तो खास वाँयल की साड़ी मिली है , जो मैने परसों पहनी थी |&#8221; &#8220;कमाल करती हो भाभी आप भी! क्यूँ बताया घर में यह ? आप कह देतीं कि मेरे बाबूजी ने बनवा दी हैं बालियाँ | साड़ी में भी अपने पास से और पैसे डालकर बढिया सी ले आतीं |आपकी शान बढ जाती और किसी को कुछ पता भी नहीं चलता| हमने तो खुद खरीदकर अम्माजी को कह दिया है कि मायके से यह सब मिला है | &#8220;, झट ऊर्जा ने कहा |यह सुनते ही रेशु को ऊर्जा की चुस्ती और चालाकी में पति की कमाई का निरादर प्रतीत हुआ |लेकिन , उसे समझ आ गया था कि &#8220;दाल में काला&#8221;यहीं पर है |<br />
वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
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		<title>बर्फानी बाबा की दुर्लभ यात्रा</title>
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		<pubDate>Sat, 01 May 2010 19:31:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[शिव शंकर , भोले-भन्डारी, कैलाशपति, विश्वनाथ ब्रम्हाण्ड के कण-कण में व्याप्त इस जगत को जागृत करने हेतु विभिन्न स्थानों पर भिन्न- भिन्न रूपों में पूजे जाते हैं&#124;उन सब में सर्वोपरि कश्मीर में स्थित अमरनाथ धाम है &#124;उत्त्त्तर भारत में कश्मीर की बर्फीली पहाड़ियों में श्री अमरनाथ बर्फानी शिवलिंग के रूप में प्रगट होते हैं &#124;शिव [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>  शिव शंकर , भोले-भन्डारी, कैलाशपति, विश्वनाथ ब्रम्हाण्ड के कण-कण में व्याप्त इस जगत को जागृत करने हेतु विभिन्न स्थानों पर भिन्न- भिन्न रूपों में पूजे जाते हैं|उन सब में सर्वोपरि कश्मीर में स्थित अमरनाथ धाम है |उत्त्त्तर भारत में कश्मीर की बर्फीली पहाड़ियों में श्री अमरनाथ बर्फानी शिवलिंग के रूप में प्रगट होते हैं |शिव भक्तों<br />
की सारी उम्र की पूजा &#8211; आराधना श्री अमरनाथ जी के दर्शन होने से ही पूर्ण मानी जाती है | और यह दर्शन रक्षा-पूर्णिमा के दिन करना परम सौभाग्य माना जाता है |<br />
शास्त्रों में लिखे अनुसार एक बार माँ भगवती पार्वती ने शिव भोले से अमर-कथा सुनाने का आग्रह किया, वे भी शिवभोले की तरह अमरत्व पाना चाहती थीं |तत्स्वरूप शिवजी उनको कथा सुनाने एकांत व शांत हिमालय की ओर ले गए |कथा सुनाने से पूर्व उन्होंने अपने ऊपर धारण किए चन्द्रमा, गंगा ,शेषनाग व अपने वाहन बैल को वहीं राह में विश्राम करने को छोड़ दिया |<br />
सर्वप्रथम बैल को छोड़ा&#8211;वह स्थान बैलगाम , जो कालांतर में पहलगाम बन गया |<br />
उसके पश्चात चंद्रमा&#8211;वह स्थान चंदनवाड़ी कहलाया |<br />
शेषनाग को जिस झील मे छोड़ा &#8211;वह शेषनाग झील कहलाई|<br />
एवम गंगाजी को पंचतरणी का नाम मिला |<br />
तत्पश्चात भोले भंडारी ने एक भीष्मकाय पर्वत के आँचल में स्थित एक गुफा में पार्वती को अमर-कथा का श्रवण कराया | कथा सुनते- सुनते पार्वतीजी की आँख लग गई, किन्तु हामी भरने की आवाज़ आती रहने से शिवजी ने पूरी कथा सुना दी |किवदन्ती है कि वहीं पास बैठा एक कबूतरों का जोड़ा कथा को सुन कर &#8216;हूँ, हूँ&#8217; करता रहा और वह अमर हो गया | आज भी दर्शनार्थ आए भक्तगण उन्हें देख पाते हैं |(इस बात की सच्चाई पता नहीं)<br />
प्रति वर्ष गुरु पूर्णिमा से जम्मू एवं कश्मीर की सरकार पहाड़ों का बर्फीला रास्ता साफ करवा के तीर्थ यात्रियों के लिए खोल देती है |गुरु पूर्णिमा से लेकर रक्षा-बंधन की पूर्णिमा तक हजारों (अब लाखों) श्रद्धालु भक्तजन तुषारलिंग के दर्शानार्थ अमरनाथ गुफा में दर्शन करने हेतु पहुँचते हैं |<br />
यात्रा प्रारम्भ&#8212;&#8211;<br />
रेल ,बस, टैक्सी व कार से आने वाले यात्री जम्मू तवी पहुँचते हैं| यहाँ रजिस्टरेशन करवा के वे अपने -अपने वाहन से बम-बम भोले के जयकारे लगाते हुए अगली सुबह कारवाँ के साथ मंज़िल की ओर चल पड़ते हैं| राह में स्वयं सेवी संस्थाओं के लगाए लंगर उनकी भूख व प्यास मिटाते रहते हैं | हर दिन जम्मू से सुबह चलकर यह कारवाँ रात को पहलगाम पहुँच जाता है | पहलगाम से एक कि.मी.  नीचे ही &#8216; नुनवन&#8217; में यात्री बेस कैम्प पर पहला पड़ाव होता है| यहाँ सुरक्षा बलों द्वारा जाँच-पड़ताल के पश्चात कैम्प में लगे तम्बुओं में यात्रियों के ठहरने की अच्छी व्यवस्था होती है| कैम्प के भीतर ही छोटा सा बाज़ार भी होता है, जहाँ आवश्यकता की प्रत्येक वस्तु जैसे ;बरसाती, छडी, कंबल, गरम कपड़े, मोजे, जूते, दवाई इत्यादि सब मिलते हैं | यहाँ देश के विभिन्न स्थलों से जैसे दिल्ली, आगरा, मेरठ, लख्ननऊ, अंबाला, सिरसा, जलंधर, जम्मू, बुडलाडा मंडी आदि से स्वयं सेवी संस्थाएं देसी घी के लंगर लगाती हैं और बहुत आदर -सत्कार से यात्रियों को भोजन कराती हैं |हर पड़ाव पर डाक्टरों की पूरी व्यवस्था होती है व दवाइयाँ फ्री मिलती हैं | अगली सुबह मौसम ठीक होने पर ही सरकारी तौर पर सुबह पाँच बजे यात्रियों को बढने दिया जाता है | यात्री जन पैदल, खच्चर पर या सूमो टैक्सी में बैठकर चंदन वाड़ी की ओर प्रस्थान करते है| जो १६ कि. मी. के फासले पर है | चंदनवाड़ी में बर्फ के पुल को लांघकर यात्री पिस्सू घाटी की सीधी चढ़ाई चढते हैं जो शेषनाग नदी के किनारे चलती है | १२ कि. मी. का लम्बा नदी का किनारा शेषनाग झील पर जाकर समाप्त होता है | यही तो नदी का उदगम स्थल है | (यही नदी पहलगाम से नीचे जाकर झेलम दरिया में मिल जाती है) चारों ओर बर्फ के श्वेत धौलाधार पर्वत ,ऊपर बादलों के शरारती खेल व नीचे मध्य में गहरे फिरोज़ी रंग की झील! मानो, चाँदी की अंगूठी में फिरोज़े का नग जड़ा हो | बहुत ही मन- लुभावना, मनोरम स्थल है |अनुपम सौन्दर्यमय !!!!<br />
जनश्रुति है कि भाग्यशाली भक्तों को इस झील में शेषनाग जी के साक्षात दर्शन हुए हैं, जबकि कोई साक्षात प्रमाण नही हैं| फिर भी कई साधु झील किनारे इस आस में कई दिनों तक धूनी रमाए बैठे रहते हैं | इस पड़ाव पर भी ठहरने व खाने- पीने की उचित व्यवस्था है |जिन्हें यहाँ ठहरना होता है वे तम्बुओं में आरामदायक बिस्तरों पर फ्री सोते हैं| नहीं तो आगे पंचतरणी की ओर प्रस्थान करते हैं| जय शिव शम्भु, बम-बम भोले ,शंकर भोले के नारों से रास्ता गुँजायमान रहता है | अब सामने १५ हजार फीट की ऊँचाई पर &#8216;महागुनस टाँप् आता है | इतनी अधिक ऊँचाई पर आँक्सीजन की कमी हो जाती है, इसलिए दिल के रोगियों को इस यात्रा के लिए मनाही की जाती है | महागुनस टाँप चढने के बाद पंचतरणी की ढलान प्रारम्भ हो जाती है | शेषनाग से पंचतरनी का फासला १२ कि.मी. का है |<br />
पंचतरणी&#8212;&#8211;<br />
अर्थात पाँच धाराओं वली नदी | स्वच्छ, शांत, निर्मल व पारदर्शक जल | इसके धरातल की गोद में बिखरे काले, सफेद व रंगीले छोटे व बड़े कंकर- पत्थर नगीने बिखरे पड़े दिखाई देते हैं | प्रकृति की इस अनुपम छटा को निहारते हुए ,दुर्गम रास्ते की सारी थकान मिट जाती है | मन-मयूर नाच उठता है | किसी और लोक में विचरने का आभास होता है |यहाँ डाक-बंगला व कई सराय यात्रियों के ठहरने के लिए बनी हैं | सरकार का इतनी दूर बर्फ के प्रदेश में इतनी अच्छी व्यवस्था करना सराहनीय है | यहाँ भी ढेरों तम्बू लगे होते हैं, एवम खाने -पीने की पूर्ण -व्यवस्था होती है|पवित्र गुफा की दूरी अब केवल ६ कि.मी.रह जाती है| इसमें पहले ३ कि.मी. के रास्ते को &#8216;संत सिंग की पौड़ी&#8217; कहते हैं| यह ऍसी पगडंडी नुमा रास्ता है, जिसके एक ओर पहाड़ व दूसरी ओर गहरी खाई है | पर भोले के नाम जपते सब रास्ते आसानी से कट जाते हैं |<br />
अमर गंगा&#8212;-<br />
छैः कि. मी. समाप्त होते ही सामने बर्फ की पतली सी धारा दिखाई देती है, जिसे अमरगंगा कहते हैं | इसी में स्नान करके भक्त जन हाथ में नारियल आदि का चढावा ले श्री अमरनाथ जी के दर्शन करते हैं | पहले टेढे-मेढे रास्ते से गुफा में जाया जाता था, किन्तु अब सीढियाँ चढकर जाना होता है |<br />
भव्य पवित्र गुफा&#8212;<br />
दीर्घकाय पर्वत के मध्य में स्थित यह भव्य पवित्र गुफा करीब १०० फीट लम्बी और १५०<br />
फीट चौड़ी है| इतनी लम्बी व कठिन यात्रा करके आए भक्त जनों की भीड़ में जैसे-जैसे यात्री नारे लगाते गुफा के करीब पहुँचते जाते हैं, उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहता | वे मंत्रमुग्ध से पर्वत के गर्भ में हिमनिर्मित शिवलिंग के इतने विशालकाय (करीब १६ फीट्) आकार के दर्शन कर श्रद्धा से नतमस्तक हो धन्य हो जाते हैं | पत्थर की गुफा में बर्फ के शिवलिंग या बर्फानी बाबा &#8212;-का होना, मानव परिकल्पना से परे ईश्वरीय शक्ति का आभास कराते हैं | पास में व सामने की ओर माँ पार्वती व श्री गणेश जी के हिम पिंड के भी दर्शन होते हैं |हर तीर्थ स्थल की तरह यहाँ भी भक्तों ने लाल-पीले धागे व लाल चुनरियाँ वहाँ गड़े हुए त्रिशूलों पर बाँधकर मन्नतें मानी हुई हैं | श्वेत व गाढे रंगॉं के सम्मिश्रण दूर से ही अति सुंदर दिखाई देते हैं |<br />
गुफा के भीतर की छत से बूँद-बूँद जल पूरी गुफा में टपकता रहता है| कहते हैं कि आशीर्वाद के रूप में भक्त जनों पर यह छिड़काव होता है | भक्तजन शिवलिंग को अब छू नहीं सकते हैं, क्योंकि वहाँ अब लोहे की रेलिंग लगा दी गई है | अधिक भीड़ से गर्मी के कारण हिम शिवलिंग के पिघलने का खतरा हो जाता है, इसलिए भीड़ को दूर से ही दर्शन करने पडते हैं |<br />
हैलीकाँप्टर सर्विस&#8212;-<br />
पहलगाम से पंचतरणी तक के लिए २००९ में हैलीकाँप्टर की सर्विस प्रारंभ कर दी गई है | इससे आने-जाने का किराया १०,००० रू.प्रति यात्री है| यात्री ५ मिनट में हवाई रास्ते से पंचतरणी पहुँच जाते हैं | वहाँ भाड़े पर टट्टू व डोली गुफा तक जाने के लिए मिल जाते<br />
हैं |अब तो दिल के रोगी भी बर्फानी -बाबा के दर्शन करने के अरमान पूरे कर सकते हैं |<br />
एक और विकल्प&#8212;-<br />
श्री नगर से सोनमर्ग (लेह रोड पर) बालताल होते हुए भी श्री अमरनाथजी की यात्रा कम समय में की जा सकती है | कभी सेना के जवानों ने अपनी सुविधा के लिए इस रास्ते को बनाया था, जिसे लोग शाँर्ट-कट बना बैठे हैं |यहाँ से भी हैलीकाँप्टर सर्विस है गुफा के लिए | किंतु पारम्परिक अमरनाथजी की यात्रा का लाभ व महत्ता पहलगाम वाले रास्ते से ही है| शुद्ध, सात्विक मन से प्रभु की भक्ति में लीन हो यात्रा प्रारम्भ करके राह में मिलते दीन-दुखियों ,भक्त जनों की सहायता करते हुए  दर्शन करना ही पुण्य की प्राप्ति करना है |<br />
&#8212;-वीणा विज &#8216;उदित&#8217; </p>
<p>क़ादम्बिनि July 2010 मे यह आलेख पब्लिश हुआ है</p>
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		<title>पुनर्जीवन (second Part)</title>
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		<pubDate>Thu, 21 May 2009 18:56:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[विशा फटी आँखों से रोहण को तक रही थी &#124;किसी तरह अपने को सँभाल वह उसका हाथ झटक कर वहाँ से हट गई &#124;आँखों में अटके सागर को उसने बेरोक बह जाने दिया &#124;भरे-पूरे घर में तो उसे सिसकी लेने पर भी रोक थी ,अभी तक जो बात पर्दे में थी वह खुल सकती थी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>विशा फटी आँखों से रोहण को तक रही थी |किसी तरह अपने को सँभाल वह उसका हाथ झटक कर वहाँ से हट गई |आँखों में अटके सागर को उसने बेरोक बह जाने दिया |भरे-पूरे घर में तो उसे सिसकी लेने पर भी रोक थी ,अभी तक जो बात पर्दे में थी वह खुल सकती थी |वह अपने जीवन की समस्या से आप निपटना चाहती थी | अपने जीवन को अपने अनुरूप जीना चहती थी |<br />
विशा आखीर इस नए शहर में किससे ग़म साँझा करे? वैसे वो नावल्स पढने की शौकीन थी, किन्तु अब पुस्तक उसके सामने खुली रहती, पन्ने फड़फड़ाते रहते&#8230;और उसकी नज़रें शून्य में भटकती रहतीं |अपना दर्द अकेले सहने की ताकत उसमें है ..यह तो उसे भी नहीं पता था |विशा की नींदें उड़ गईं थीं| उसे अम्मा के आँचल की तलाश होती , जिसमें छिपकर वो चैन की नींद सो सके | तभी उसके भाई की शादी का न्यौता आया व भाई आकर उसे पीहर लिवा ले गया |वहाँ सभी नाते- रिश्ते के लोग जमा थे , खूब रौनक थी |विशा के रिश्ते की एक भाभी ने विशा के चेहरे पर बेरौनकी देखकर उसे पकड़ ही लिया |दोनो जनी छत पर जाकर एक खटिया पर लेट गईं, वहीं विशा ने भाभी से अपना ग़म साँझा कर ही लिया |विशा रो रही थी, उसके ग़म में भाभी भी रो रही थी | उसने उसे सीने से लगाकर भींच लिया |लेकिन समस्या का निदान उसको भी नहीं सूझा | विशा के रिसते छालों पर भाभी के दुलार की मरहम लगी , तो उसे कुछ राहत मिली | शादी में दामाद की खानापूर्ति करने के लिए रोहण भी वहाँ दो दिनों के लिए आ पहुँचा था | बाबूजी व अम्मा की खुशियों को देखते हुए विशा चुपचाप रोहण के साथ विदा होकर चल पड़ी थी | रास्ते में वो कार में चलती कैसेट को सुनने का नाटक कर आँखें मूँदकर पड़ी रही | जो झंझावत उसके भीतर चल रहा था , उसका शोर सहने के लिए बाह्य रूप से शांति आवश्यक थी |<br />
यह कैसा त्रिकोण बन गया था , उसे लगा कहीं उसने यह पढ़ा था , पत्नि अपने पति की प्रियतमा से मिलने जा रही है | क्योंकि रोहण ने उसे बताया कि वह कल ही उसे उससे मिलाने ले जा रहा है | इश्क तो जवानी में बहुत लोग करते हैं, क्षम्य है यह कार्य ! विशा भी इसे अपराध नहीं मानती | लेकिन , दूसरा रिश्ता बनाना, और उसे अपनाना नहीं&#8230;यह तो अपराध ही कहलाएगा न!!!विशा को लगा बात खुलते ही घर-घर में चर्चा होगी, उनकी | उसे स्वयं पर ग्लानि हो रही थी कि उसका पति इतने कमज़ोर चरित्र का है |रोहण उसकी नज़रों में गिर गया था |<br />
खैर, दूसरा दिन भी आ गया |लम्बे इंतज़ार के बाद विशा के सम्मुख फैंसले की घड़ी थी | उसके पास चाँदी की पायल, बिछुआ और नई सिन्दूर की डिब्बी अल्मारी में थी |सुहाग के तीनों शगुन साथ में लिए वो चल पड़ी अपने प्रियतम के साथ एक अजीबो ग़रीब अभियान पर&#8230;.!पूरे रास्ते दोनो चुप्पी साधे रहे | शायद दोनो के विचार अपनी-अपनी लीक पर दौड़ रहे थे |जिस ओर वे सैर को जाते थे ,<br />
वहाँ से और आगे कुछ कच्चे घरों की कतारें दिखाई दे रही थीं |वहीं से दाहिनी ओर मुड़ने पर पेड़ों के झुरमुट थे | सूर्य की किरणें वहाँ लड़-झगड़ कर ही घुसने का दुस्साहस कर पाती होंगी | रोहण शांत व निर्विकार चेहरा लिए आगे-आगे था | लेकिन विशा के चेहरे पर एक रंग आ रहा था, तो एक रंग जा रहा था | अलीबाबा को &#8220;खुल जा सिम-सिम&#8221; कहते हुए भी वो बचैनी नहीं हुई होगी जो आज विशा के भीतर थी |यहाँ भी तो बहुत बड़े राज़ से पर्दा उठना था&#8230;..!<br />
आख़ीर वो कौन होगी ..?विशा क्यूंकर उसका सामना कर सकेगी ?आज विशा अपने पति &#8211;अपने सुहाग को बाँटेगी |हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बँटवारे में जमीनें बँट गईं, जनता बँट गई लेकिन &#8230;.ऍसा बँटवारा!! ये तो तब भी नहीं हुआ था | विशा को लगा वो सह नहीं पाएगी |हर पल वो भीतर ही भीतर टूटती जा रही थी | कलाई घड़ी की सुई जैसे-जैसे आगे बढ रही थी , उसी रफ्तार से ढेरों बम फटने से विशा के टूट कर बिखर जाने के पल करीब आ रहे थे |उसने देखा कि रोहण के कदम एक घनी झाड़ी की ओर बढ रहे थे| शायद उसे भी इसी घड़ी का इंतज़ार था | विशा के सीने में जोरों का दर्द उठा, उसने हाथ से सीना भींच लिया |उधर साँझ का धुँधलका बढता जा रहा था | विशा के दर्द की शिद्दत भी बढती जा रही थी , उसे लगा कि उसका दम निकलने लगा है&#8230;कि देखती क्या है कि रोहण ने एक सफेद साड़ी के आँचल को झाड़ी के पीछे से खींचकर अपनी ओर किया | उस डरी सी , सिमटी सी नारी ने दोनो हाथों से अपना चेहरा ढाँपा हुआ था | शायद विशा की इल्ज़ाम देती आँखों की तपिश सहने की जुर्रत वो नहीं कर पाएगी..यह सोचकर !! उसे देखते ही विशा पहचान गई |विशा तो मानो पहाड़ से खाई में जा गिरी | वह धक्क रह गई |वो..वो रक़ीब!&#8212;कोई और नहीं, उसके घर काम करने वाली , सारा दिन उसका हाथ बँटानेवाली &#8220;सुम्मी&#8221;नौकरानी थी | पल भर को तो उसकी धमनियों में बहता रक्त मानो थम सा गया | अगले ही पल विशा ने हाथ मे पकड़े हुए तीनों सुहाग के शगुन उसकी झोली में डाल दिए | उसकी उदारता देखकर रोहण स्तब्ध रह गया | बिना कुछ कहे-सुने विशा वापिस मुड़ गई |अब और कुछ पूछने या जानने को रह भी क्या गया था ?<br />
विशा की आँखों के सम्मुख ढेरों घटनाएं चल-चित्र की तरह आती चली जा रही थीं |जिनका अर्थ उसे अब बाख़ूबी समझ आ रहा था | सुम्मी जब फ़र्श पर पोचे लगाती थी तो रोहण उसकी बाल्टी छिपा देता था, या फिर जब वो रसोई में खाना बना रही होती थी तो रोशनदान से भीतर उसे कंकर फेंककर तंग करता था | विशा जाकर देखती थी तो शरारत से मुस्कुरा देता था |विशा उसे अपने लिए की गई छेड़खानी समझती और उसे इन बातों पर प्यार आ जाता था | उसकी नाक की सीध में यह खेल चल रहा था, और वो बुद्धू बनी छली जाती रही |<br />
विशा ने तो रोशनी की ओर कदम बढाए थे, लेकिन उसकी राह तो अँधेरों की गर्त में जाकर कहीं खो गई थी | लुटी हुई लाश को ढोए वो कब घर पहुँच गए, उसे पता ही नहीं चला | उसे अपने आपसे भी घिन हो रही थी | अपने इतने सुन्दर शरीर का होना, उसके लिए कोई मायने ही नहीं रखता था | सुम्मी व स्वयं को एक ही तराजू के दो पलड़ों पर तौलने की<br />
कोशिश की तो, उसे नाँन स्टैंडर्ड सुम्मी अपने से भारी लगी | उसके बराबर स्वयं को रखना मितली आने जैसा था |उसके मन में रोहण के प्रति वितृष्णा बढती जा रही थी |उसने रोहण से कोई भी अपेक्षाएं रखना छोड़ दिया |स्वयं को उससे विमुख कर लिया | लेकिन मजबूरी&#8212;-परिवार के सम्मुख दोहरा जीवन जीने के लिए परिस्थितियों ने उसे विवश कर दिया था| कि तभी एक घटना घटी&#8230;&#8230;<br />
विशा के ससुर के परीचितों में से मिस्टर एंड मिसेस गुलाटी थे | उनकी आर्किटेक्ट बेटी होस्टल से घर आई थी |विशा की तारीफ़ ममी-पापा से सुनकर वो उनके साथ उसे मिलने व देखने चली आई थी | बिन पूछे ही उसने विशा के दोनो हाथों को अपने हाथों में लेकर हल्के स्नेह से दबाया और प्रशंसा व प्यार से बोली कि वह बहुत सुन्दर है |इस सौन्दर्य को बनाए रखना उसका सर्वोपरि कर्त्तव्य है | सुन्दरता ईश्वर प्रदत्त नेमत है |जीवन में चाहे जैसे भी हालात आएं, अपनी ओर पूरा ध्यान देना |अपने भीतर विश्वास जगाए रखना | जीवन को भरपूर जीना, क्योंकि जीवन जीने के लिए ही तो है |<br />
जैसे तूफान आने से पूर्व आकाश में क्षण भर को बिजली चमक उटती है , उसका पूर्वाभास कराते हुए ; उसी प्रकार शमा गुलाटी विशा के जीवन में आशा की किरण बन कर आई| विशा के सूने जीवन में जीने की तमन्ना जगा गई |विशा ने किसी की भी परवाह न करते हुए सामान बाँधा और चल पड़ी अपने अम्मा-बाबूजी के घर पुनः जीने की तमन्ना लेकर | वो क्यूं बाँटॅ अपने पति को???उसने उसी क्षण रोहण का त्याग कर दिया | टुकड़ों में बँटकर वो नहीं जी पाएगी | वो तो अपना जीवन भरपूर जीएगी |एक ही जीवन मिला है हमें पूरा जीने के लिए&#8230;..ऍसे शब्द ही उसके ज़हन पर छाते जा रहे थे | संसार से ट्कराने की हिम्मत उसमें आ गई थी &#8212;-पुनः जीने के लिए !!!!<br />
वीणा विज &#8216;उदित&#8217;</p>
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		<title>पुनर्जीवन(First Part)</title>
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		<pubDate>Thu, 21 May 2009 14:45:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Veena</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi Short Stories]]></category>

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		<description><![CDATA[दिन भर फुर्सत में बैठे रहने से विशा का मन नहीं लगता था &#124;नौकर-चाकर ही सब काम कर दिया करते थे &#124;उसने पेंट करके ग्रीटिंग-कार्ड़ बनाने की सोची &#124;विशा का हाथ ड़्राईंग-पेन्टिंग में बहुत माहिर था &#124;उसने बहुत ही प्यारे-प्यारे कार्ड़स बनाए &#124;इससे उसका समय रचनात्मक-कार्यो में बीतने लगा, साथ ही घर में बड़े-बूढ़े,व बच्चे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>दिन भर फुर्सत में बैठे रहने से विशा का मन नहीं लगता था |नौकर-चाकर ही सब काम कर दिया करते थे |उसने पेंट करके ग्रीटिंग-कार्ड़ बनाने की सोची |विशा का हाथ ड़्राईंग-पेन्टिंग में बहुत माहिर था |उसने बहुत ही प्यारे-प्यारे कार्ड़स बनाए |इससे उसका समय रचनात्मक-कार्यो में बीतने लगा, साथ ही घर में बड़े-बूढ़े,व बच्चे सभी उसकी तारीफ़ के पुल बाँधने लगे |उनका संयुक्त परिवार था, घर में बहुत रौनक थी |एक शाम रोहण ने घर आते ही उसे घूमने चलने को कहा |विशा को मानो मन की मुराद मिल गई |उनका हवेलीनुमा बंगला वैसे ही शहर की भीड़-भाड़ से दूर था |फिर भी दोनों सुनसान रास्तों पर टहलते काफी आगे दूर निकल आए थे |विशा ने महसूस किया कि रोहण किसी ऊहापोह में फँसा हुआ है, वो कुछ कहना चाहता है |परन्तु कुछ कह नहीं पा रहा है |या फिर शब्दों का चयन नहीं कर पा रहा है |<br />
इधर विशा भी स्वच्छन्द पक्षी की भांति चहकना चाह कर भी ,उसका रवैया देखते हुए शांत बनी रही | दोनो ही औपचारिक बातें करते हुए ,सैर करके वापिस आ गए | रोहण उससे कटा-कटा सा रहता था | आज अचानक रोहण के सैर के निमंत्रंण से विशा स्तब्ध थी |उसके मन में कहीं कुछ खटक भी रहा था | वैसे उनका आपसी संबंध औपचारिक बातों तक ही सीमित था |आज का व्यवहार &#8230;खैर, विशा प्रसन्न थी |आशा के विपरीत ,उसके बाद की हर शाम जीवन में सहजता लाती चली गई |विशा से कटा- कटा व गुमसुम रहनेवाला रोहण अब उससे बातें करने लग गया था |एक शाम सैर करते हुए विशा थक कर एक चट्टाननुमा पत्थर पर चढकर सुस्ताने लगी |उसे थका देखकर रोहण आगे बढकर उसे बाहों में लेते- लेते न जाने क्यूं पीछे हट गया | लगा, जैसे किसी ने उसके हाथों को रोक दिया हो | विशा, जो पति की बढती बाहों को देखकर हल्के से कम्पित हो उठी थी, उसकी सोई हसरतें करवट लेने ही वाली थीं कि दम भरने से पहले ही वे हसरतें दम तोड़ गईं | रोहण के व्यवहार से वो क्षुब्ध हो उठी थी |<br />
उससे अगली शाम को रोहण काम से थका &#8211; माँदा घर लौटा, तो आते ही लाँन में नीचे बैठी मैग़ज़ीन पढती विशा की गोद में सिर रखकर वहीं घास पर ही लेट गया | विशा के आँचल में मानो ढेरों फूल खिल उठे | उसके अरमानों ने पुनः अँगड़ाइयाँ ले लीं | रोहण की प्यार भरी नज़र से उसे अँधेरों में उजालों के नन्हे क़दम अपनी ओर बढते नज़र आने लगे | रोहण उसे भी भीतर आने का इशारा करके स्वयं भीतर चला गया | रोहण की इस अदा से विशा का अन्तर्मन खिल उठा | उसे लगा आज आख़िरकार वो घड़ी आ ही गई, जिसका उसे पल-पल इंतज़ार रहा |वह भी उसके पीछे बिना विलम्ब किए भागी |रोहण ने उसे अपने पास पलंग पर बैठाकर उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया |हाथ को सहलाता हुआ वह बोला ,&#8221; बहुत दिनों से तुम्हे एक बात बताना चाह रहा था |मेरे जीवन में तुम्हारे आने से पूर्व कोई और भी आ चुकी थी &#8221; |<br />
नियति की कठोरता के समक्ष विशा सहज नहीं हो पाई | भीतर आते ही उस पर ग़ाज़ गिरेगी&#8212;वह कहाँ जानती थी? वह हक़लाते हुए बोली,&#8221;कौन है वो?&#8221;और वहीं ढह गई |रोहण ने उसका हाथ जोर से पकड़ लिया मानो स्वयं को संबल दे रहा हो | उसने उसे सँभाला और उसे होश में लाने का यत्न करने लगा | थोड़ी देर बाद सजग होते ही उसने रोहण का हाथ जोर से झटक दिया |वह चीखी, &#8221; तो फिर यह &#8230;सब ! ..क्यों?&#8221;आखीर क्यूं???वह फटी आँखों से उसे तक रही थी | उसकी मचलती हसरतों का उबाल ,एकदम बर्फ़ानी हवा में बदल गया था | उसने स्थिर होकर पूछ ही लिया, &#8220;कहाँ है वो?&#8221; प्रत्युत्तर<br />
में जवाब था कि यहीं पर है, मिलाने ले चलेगा किसी दिन |</p>
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