वक्त की तपिश

चार दिन हो गए थे बारिश रुकने का नाम नही ले रही थी । बिजली भी कभी आती , कभी चली जाती थी । जीवन अस्त व्यस्त हो गया था । दुकाने बंद ,स्कूल बंद, सारा कारोबार ठप हो गया था ।पानी के शोर में सब अवाजे विलीन हो गई थी ।बारिश का ऐसा कहर टूटा था कि बरबादी होने में कोई कसर बाकि नहीँ थी ।सब भयभीत थे कि उनके घरों में कहीँ पानी न आ जाए ।पूरी कश्मीर घाटी पर बादलों ने काली चादर फैला रखी थी। न मालूम उस चादर मेँ कितना जल भरा था कि वो द्रौपदी के चीर सा खत्म ही नही हो रहा था । चारोँ ओर खड़े पहाड़ो पर बरसता जल भी तेज़ रफ़्तार से घाटी में भर रहा था ।उस जल में लाल मिटटी मिली होने से उसका रंग ख़ूनी लग रहा था।..और उसकी फितरत भी ख़ूनी हो गई लग रही थी।
गुरदीप सिग ने इंद्रानगर( श्रीनगर) में ज़मीन से दो फुट ऊचा घर बनवाया था। यह सोचकर कि कभी बारिश ज़्यादा आ जाए तो बचाव रहे । स्वयं ऊपरी हिस्से में रहते थे और नीचे किराएदार मि. मेहता रहते थे । कल रात ही मिसेस मेहता ने अपने कालीन लपेटकर उनके पास ऊपर रखवाए थे । यह सोचकर कि बारिश के रंग ढंग कुछ ठीक नहीं लग रहे हैँ—कहीँ पानी का स्तर बढ़ गया और पानी भीतर आ गया , तो खराब हो जाएंगे ।और हुआ भी यही । सुबह तक 10″ पानी कमरोँ व घर में भर गया था । मिसेस मेहता पानी में चलकर रसोई में गई, और अपनी चार वर्ष की बेटी को नाश्ता देने लगीं, तो पीछे से दरवाजो को तोड़ता तेज पानी का रेला भीतर घुस आया । उन्होंने गुड़िया का हाथ पकड़ा और उस रेलें के साथ बहने लगीं कि सीढ़ियाँ उतरते गुरदीपसिंग ने यह नज़ारा देखा । उन्होंने झट एक हाथ से सीढ़ी की रेलिंग को पकड़ा व दूसरे हाथ से मिसेस मेहता की बाँह पकड़कर ऊपर खींच लिया । मानो मौत के मुँह से बाहर निकाल लिया हो ।
मेहतासाब तो टूर पर दिल्ली गए हुए थे । वो वहाँ ख़्वाब में भी नहीं सोच सकते थे। कि उनके परिवार के साथ ऐसी अनहोनी घट रही होगी । उनका तिनका – तिनका जोड़कर बनी गृहस्थी को पानी अपने साथ बहाकर ले गया होगा । उधर ,मिसेस मेहता ऊपर पहुँच अपने और गुड़िया को जीवित देखकर अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीँ क़र पा रहीं थीं । गुड़िया को अपने से लिपटा वे दोनों जोर जोर से रो रहों थीं । कृतज्ञता के भाव चेहरे की हर लकीर में थे , लेकिन रोने से ज़ुबान मानो तालू से चिपक गई थी ! गुरदीपसिंग उस भाव को समझ रहे थे क्योंकि उस क्षण का मौन ही मुखर हो उठा था । उनकी पत्नी का देहान्त हो चुका था । घर में बहू थी । उन्होंने उसे बैडरूम से बुलाया । बाहर आते ही वह पानी ऊपर आता देख और सारी स्थिति को भाँप , डर से चीख उठी । उसकी चीख सुनकर पति सनी और दोनों बेटे हैरी और जिमी जो क्रमशः 8 और 12 वर्ष के थे…सब बाहर आ गए और घबरा गए ।
डैडीजी ! अब क्या होगा ?
‘हौंसला रखो । रब है न , उस पर भरोसा रखो । वो ही रस्ता दिखाएगा ” ।
कह तो दिया लेकिन उनका भी अंदर से बुरा हाल था । पानी जिस गति से ऊपर बढ़ रहा था, वह भयावह थी । और नीचे वाले घर का सारा सामान पानी के तेज वेग में बहता देख वे भी भविष्य की कल्पना करके भीतर से डर रहे थे । मिसेस मेहता अपने घर को लुटते और समाप्त होते देखकर कांपे जा रही थीं । उसके तो हाथ – पल्ले भी कुछ नहीं था । रात को सोते समय आम औरतों की तरह वो भी चेन., टॉप्स, चूड़ी वगैरह उतारकर सिरहाने रख देती थी ।फिर सुबह काम से निबट नहा धोकर पुन: पहन लेती थी । अब पैसा धेला, गहना तो क्या कपड़े भी उसने बेबी भाभी के उधार के पहने हुए थे । वक़्त ! इंसान को कब क्या दिखा दे, कुछ पता नहीं । उसकी आँखों की कोरें भी बाँध तोड़कर इसी पानी के बहाव सी बहे जा रही थीं । इतना ही अंतर था — वो बहाव सब कुछ लूटकर ले जा रहा था और आँखों का बहाव उस लूट को देख कर बह रहा था ।
गुरदीपसिंग के बेटे सनी ने नीचे देखा., उनकी दोनों कारें पानी में डूब चुकी थीं । दिमाग अब तेजी से चल रहा था । सनी ने बहादुर से कहा कि टाईगर( कुत्ता ) बहुत भौंक रहा है, इसे ऊपर बाम (छत) में बाँध आए और जल्दी वापिस आकर गैस का चूल्हा और सिलेंडर ले जाए । हैरी , जिमी दोनों भी सर पर तकिए रखकर घबरा कर ऊपर की ओर भागे । बेबी ने घर में जो भी खाने का सामान था, इकट्ठा कर के ऊपर भेजा । बाम में तो घर का पुराना सामान व लकड़ी के फट्टे पड़े थे । ठीक से बैठने की जगह भी नहीँ थी । गुरदीपसिग फोन पर फोन किए जा रहे थे पर कोई सिग्नल नहीँ था । पूरी कश्मीर घाटी का सिग्नल ख़तम हो गया था । न बिजली थी न फोन था । उधर पानी का स्तर बढे जा रहा था । अब पूरी सीढ़ियां पानी के भीतर थीं । ऊपर से बादलों का शोर , तिस पर मूसलाधार बारिश ! कोई करे भी तो क्या ? पानी की सिर्फ़ चार बोतलें फ्रिज में थीं अन्यथा घर में पीने का पानी नहीं था । कारण यह था की नल में पानी आता ही रहता था । भर कर रखने का चलन ही नहीँ था । जल्दी से दाले और चावल भी रख लिए गए , यह बात अलग है की पानी की कमी के कारण उन्हें कभी पकाया नहीँ जा सका । किसी का भी ध्यान दवाईयों और कपड़ो की तरफ नही गया । ग़ज़ब की ठण्ड होने वाली थी , पर उस वक्त पानी को ऊपर आते देख सब घबरा गए थे । इसी हबड़ा दबड़ी में देखते हैं कि पलंग और बिस्तर पानी में डूब गए हैं । सबका दिल बैठा जा रहा था । दोपहर तक तीन फुट पानी ऊपर भी भर गया था । सभी ऊपर बाम से नीचे झांक रहे थे ।
सात सितम्बर का दिन विनाशकारी काली गहन रात्रि में तब्दील हो गया था । चारो ओर जहाँ तक दृष्टि जाती थी , पानी ही पानी था । जल थल सब एक हो चुके थे । दूSS र गुरूद्वारे के निशान साब यानि कि झन्डा बहुत ऊँचे होने के कारण पानी के समुद्र के बीचों बीच दिखाई दे रहे थे । अब तो निश्चित ही जलसमाधि के आसार नज़र आ रहे थे । मिसेस मेहता संकट मोचन हनुमान का जाप कर रही थी । तो बेबी भी पहली पौढ़ी का पाठ दोहराए जा रही थी । उसे लग रहा था कि सारे देवी देवता कहीँ छुट्टी मनाने चले गए हैं , नहीँ तो जग के पालनहार ऐसे बेपरवाह कैसे हो सकते है ? यह तो प्रलय आ रही है । गुरदीपसिग अपनों को यूँ मुसीबत में घिरा देखकर मन ही मन वाहेगुरु से लड़ाई कर रहा था , क्योंकि वह हर मुसीबत ज़दा की मदद करता था ।
बाहर से हैलिकॉप्टर की आवाज़ आ रही थी । सबने बाहर झांका तो देखा कि उससे कुछ पैकेट नीचे गिराए जा रहे थे और पानी की बोतलें भी । लेकिन वो इनसे काफी दूर थे । साँझ आ चली थी । भूखे पेट कब तक रहा जा सकता था ? बच्चों ने कुछ खाने को माँगा तो सब ने बिस्कुट खाए । टाईगर को भी डाले । पानी से घिरे होकर भी साफ़ पानी नहीं था सो दाल चावल नहीँ पका सके । गैस थी, बर्तन भी थे , पर सब बेकार । अलबत्ता मल मूत्र त्यागने की मुश्किल थी । जिसे जरूरत होती वो कोने में जाकर निबट आता , पानी के अथाह सागर में । ओफ़्फ़ोह…यह नारकीय जीवन !
मौसम काफी सर्द हो गया था । रजाई और गर्म कपड़े नही थे वहाँ बाम में । हां छोटे बच्चे अपनी अपनी माँ की गोद में दुबके पड़े थे । जिमी अपने दादाजी के साथ चिपका था । बुढ़ापे में गुरदीपसिग को बार बार पेशाब आता था ठण्ड के कारण । वे उठते और पानी के सागर में धार मार आते थे । जिमी के जवान जिस्म.की गर्मी से उन्हें कुछ राहत मिली । उधर सनी ने अपनी बीवी बेबी और छोटे बेटे हैरी को दोनों बाँहो के घेरे में ले लिया था ,मानो उनके हर कष्ट को मिटा देगा । बड़ों को नींद तो क्या आनी थी , हाँ एक दूसरे के बदन की गर्माहट में ठण्ड से थोड़ा बहुत निज़ाद मिल रहा था । वैसे सूरज देवता के दर्शन हुए अब तो कई दिन गुज़र चुके थे । इंसान जितनी भी पीड़ा या कष्ट में हो आधी रात के पिछले पहर में कुछ पलों के लिए नींद की एक झपकी सभी को आ घेरती है । ऐसे ही पलों में नौकर बहादुर ने भी टाईगर के साथ चिपटकर एक झपकी ले ली ।
जैसे कप में पानी भर जाने पर उसका अपने आप बाहर निकलना संभव नहीँ है , वैसे ही वादी में झेलम नदी का पानी उफान पर था । बारिश का जल पहाड़ों से आ आकर उसमे स्तर को बढ़ा रहा था । और झेलम अपनी जगह से उठ सारे शहर में बह रही थी । आठ सितम्बर को ख़तरा होने पर डल गेट को खोल दिया गया । पानी का बहाव डल झील की ओर हो गया । शहर को बचा लिया गया अलबत्ता झील के पानी का स्तर 20 फुट ऊपर हो गया । सारी हाऊसबोट आपस में रस्सियों से बाँध दी गईं । और ़खाली करा ली गईं । चारों और पानी ही दिखता था । अब नावें चल रही थीं उसमें । शहर में भो नावे चल रही थीं । 1-2 ,नावे दिखने पर सनी भी कमीज़ उतार कर हिला हिला कर कश्मीरी में चिल्लाने लगा ” वला यूरे – वला यूरे ” अर्थात इधर आओ , इधर आओ । तभी नाव में से एक आदमी चिल्लाया , ” अपने दो आदमी बच्चे या बूढे दे दो । अभी हम सबको नहीं ले जा सकते । डल झील के पार पहाड़ी पर मिलिट्री के टैंट लगे हैं , वहीं सबको रख रहे हैं । धीरे धीरे सब को ले जाएंगे । जल्दी करो
।” किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था कि किसे भेजें । सबने कहा दोनों बेटे भेज दो । बच्चे कभी कहीं अकेले नहीं गए थे इससे पूर्व । लेकिन यहां रहकर जीवित समाधिस्थ होने से तो इनका जीवित रहना बेहतर था , सो मिन्नतें कर , कसमें दे के सबने उन्हें नाव में उतरवाया ।
बच्चे भी भयभीत थे । अन्जान लोगों के साथ जा रहे थे, अंजानी मन्ज़िल को । उनको भेजने के बाद उनकी माँ का रो रोकर बुरा हाल था । गुरदीपसिंग और सनी भी पत्थर के बुत से हो गए थे ,मानो उनकी जान कोई निकालकर ले गया हो । वैसे मुसीबत के वक्त पुरुष की सहन शक्ति , धैर्य व साहस बढ़ जाते हैं शायद ।
“हे वाहे गुरु! यह कैसा इम्तिहान है? मेहर कर , हम पर मेहर कर !!” कहते हुए गुरदीपसिंग भी आख़ीर रो पड़ा । उनके होंठ काँप रहे थे और दाँत किटकिटा रहे थे । उनसे पाठ भी नहीं हो पा रहा था । जब दू:ख दर्द ,कष्ट की कोई सीमा न रहे तो भगवान् का नाम भी नहीं ले पाता आदमी । सो नाव के दोबारा आने का इंतज़ार बना रहा पर उस दिन नाव नहीं आई । आई तो वही काली अँधियारी रात फिर से आ गई । एक तो गज़ब की ठण्ड , ऊपर से भूख , तिस पर
अनजान हाथों में बच्चे । सभी का बुरा हाल था । आँखों के भीतर से समुन्दर बाहर निकल रहे थे , कौन किसे समझाए ?
मीलों लम्बी रात हो गयी थी । आँखें अँधेरे को एकटक तक रहीं थीं कि कब पौ फटेगी,सुबह का चेहरा दिखेगा और नाव आती दिखाई देगी । आँखें फटने को आ गयी थी कि सुबह दूर से नाव आती दिखी । सब को चैन आया । अब बूढे गुरदीपसिग और नन्ही गुडिया के जाने की पारी थी । गुडिया माँ को नहीं छोड़ रही थी । समय कम था, सो उसे रोते बिलखते नाव में अँकलजी को दे दिया गया । वह डर से उनके साथ चिपट गई । गुरदीपसिग ने जोर से बोला,”मैं बचचो को लेकर ललित होटल की तरफ मिलूगा, वहीं सब आ जाना । ‘
पडौसी रशीद मियां भी उसी नाव में थे । कार पार्क करने की जगह को लेकर उनसे कभी कभार तकरार हो जाया करती थी । आज वे भी हालात के मारे उसी नाव में सवार थे । वो एकदम बोले.,”हम भी वहीं पहुँच रहे है । फिर हम सब इकट्ठे हमारे एक रिश्ते दार के घर शरण लेगे , आप साथ ही रहना । ‘ गुरदीपसिग को कुछ हौसला हुआ । उंहोने रशीद मियां के हाथ पर अ
पना हाथ रख दिया ।
पहाड़ी पर पहुँच कर बच्चे ढूंढने में २.३घंटे लग गए । जब तक बचचे नहीं मिल रहे थे , तब तक वो ढेरों मौतें मरता रहा । साँझ ढलने से पूर्व ही बेबी और मिसेस मेहता भी आ गई । सनी नहीं आया । वह नौकर बहादुर और टाईगर के साथ वहीं बाम में रह गया था । सब रशीद मियां के रिश्तेदार के घर गए । उंहोने बडे पयार से सब को खाना, कपडा , दवाईया और सोने को बिस्तर दिए । इंसानियत का जज्बा था हर तरफ । बेटे का गम गुरदीपसिंग को चैन नहीं लेने दे रहा था । वो हाय सनी ! हाय सनी !बोले जा रहे थे । और फटी आखों से शून्य में ताके जा रहे थे । मानो डिपरैशन में हों । बेबी भी बेटों को छाती से चिपकाए रोए जा रही थी । जिमी इन गर्दिश के दिनों में ही बड़ा हो गया था । वह बहुत कुछ समझ रहा था । उसने कुछ सामान जैसे गरम कपड़े , खाना ,पानी और कुछ दवाईयां पैक करवाई और पापा के पास वापिस घर जाने की जिद पकड़ ली । “उलटे बाँस बरेली को” देख नाव वाले ने भी उसे समझाया , पर वो अंगद के पाँव सा टस से मस नहीं हुआ । अगली सुबह ही वो घर के लिए रवाना हो गया । आज वह अपने पापा की दाहिनी बाजू बन गया था ।
गुरदीपसिंग यह देख अब खुशी के आंसू रो रहे थे । नौवें दिन जाकर बारिश रुकी । काल रात्रि का अंत हो , नई विहान आती दिखाई दी । बहुतों ने बहुत कुछ खोया । आग की तपती भट्टी में से निकल खरे सोने से रिश्ते थे सामने । बस मोल समझना था अब ।

वीणा विज “उदित ”
५१५४,परसिमौन डराइव
डबलिन (सी ए )९४५६८
यू.एस .ए
फोन..९२५.४७५.४३२१

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