हिन्दी का स्वरूप

सर्व- भाषाऑं में सरल ग्राह्यकारी
हिन्दी-भाषी भरता रंगों की पिचकारी
भाषा का रंग जिस-जिस पर पड़े
बतियाते वे हिन्दी रंग जो चोखा चढे ||
*
हिन्दी की जड़ से निकली शाखाएँ
हर दस कोस पर बदलती भाषाएं
तोड़-मरोड़ हिन्दी को बदलते स्वरूप
गाँव-गाँव में विचर बनती अनूप ||
*
मातृ-भाषा हिन्दी की ढेरों बेटियाँ
बृजभाषा, मैथली,बुंदेलखंडी बोलियाँ
इसकी चरण-रज में जन्मीं ढेरों कथा
हिन्दी से आँगन में बिखरी शुभ्र-विभा||
*
हिम के उत्तुंग शिखर पर विराजी हिन्दी
साहित्य ने कथा-काव्य से सजाई हिन्दी
अन्तर्राष्ट्रीय शब्दकोष में सम्मिलित हिन्दी
जय हे!जय हे! के नारों से गूँजी पृथ्वी ||
वीणा विज ‘उदित्’

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