Archive for August, 2014

ग़ज़ल—रक़ीबों की चाह

Saturday, August 23rd, 2014

मग़रिब से आती हवाओं के रुख़ से ज़िंदगी-ए-आम डगमगाने लगी है | हाक़िम ख़ुद क़ज़ा की दवा देते हैं सुन कफ़स में कैद रूहें फडफडाने लगी हैं | आँधियों को गुलिस्ताँ में पनाह देने से सिली-सिली शबनम भी गर्माने लगी है | तंग आ चुके हैं ख़तो-खिताबत से वस्ले यार मेरा सब्र आज़माने लगी है […]

मैं और मेरा दोस्त

Friday, August 22nd, 2014

मानव की ग़्यानपिपासा उसे उद्वेलित करती है ,वह आगे बढ़े, कुछ खोजे व कुछ पाए | शायद इसी कारण ग्रेजुएशन के पश्चात अपने मित्र महेन्दर को साथ ले मैं कश्मीर-भ्रमण को निकल पडा | वहाँ के नैसर्गिक सौन्दर्य के मोहपाश में न चाहते हुए भी मैं बँधा जा रहा था | कि तभी देखता हूँ […]