Archive for October, 2009

आँचल में बाँध सिसकी

Wednesday, October 28th, 2009

अपने अल्फ़ाज़ों के नश्तर
मेरे अन्तस में चुभोकर
शराफ़त का मुखौटा ओढ़े
तुम बन जाते महान सदा!
नख से शिख तक काँप उठती
आसमां सिर से ज़मीं पर आ गिरता
तन में बहता लहू लावा बन जाता
मूक रुदन से दब जाता लावा!
झूठी चमक ओढ़ चेहरे पर
खिलखिलाती मेरी सूनी बहार
रुके-रुके शबनम के क़तरे
ज़हन को चीरते बन मल्हार!
साँसों की रवानगी बढ़ जाती
अहसासों को [...]

हाहाकार

Tuesday, October 27th, 2009

झोपड़िया की टूटी छत से
टप-टप टपकता जल
जीवन भिगोता, कँपकँपाता
इमारतें बनानेवाला तन!
फटे चिथड़ों में लिपटते
रेशमी परिधान बनानेवाले
पिचके पेट, अन्न को तरसते
जग का पेट भरने वाले !
कूड़े के ढेर पर पलते
कूड़ों का ढेर उठाने वाले
घुटने पेट में गाड़,ठिठुरते
नरम कंबल ,रजाई बनानेवाले!
अन्याय का हाहाकार–
अत्याचार, असंतोष की लपटें
करेंगी भस्म !
धुरंधर समाज बनाने वाले !!!!!!
वीणा विज ‘उदित ‘

भीतरी बारिश

Wednesday, October 14th, 2009

सूखे तन पे बरसती
भीतरी बारिश में
भीग-भीग जाती हूँ
मैं अन्तर्मन से !
गीली मेरी धोती
चिपकी मुझ से
क़ोफ़्त है कितनी
उघड़ा है बदन !
भीतर चल रहे अंधड़
कँपकँपा जाते हैं
दिखती हूँ जीवन जीती
भीतर ही भीतर रिसती!
चैन ले लूँ मैं भी
आँधियाँ तो थमें
निचोड़ लूँ गीली धोती
ढ़ँक लूँ अंग उघड़ा!
जो मिल जाए उधार
खुशी की इक किरण भी
भीतरी बारिश से धो
संजो लूँ अपने [...]

नोबेल प्रश्नचिन्ह के दायरे में!

Sunday, October 11th, 2009

अमरीकी राष्टृपति बराक ऑबामा को वर्ष २००९ का शान्ति का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा होने पर सारा विश्व असमंजस में है | शांति स्थापित करने का प्रयास करना एवं बेहतर भविष्य की उम्मीद जगाना (वो भी भाषणों में)…इससे वे शांतिदूत की पदवी कैसे पा गए? हैरानी होती है नार्वे की नोबेल पुरस्कार समिति पर| [...]