निर्झर
Friday, July 31st, 2009नूतन देहयष्टि का लिया
प्रथम आलिंगन
अनछुए बदन में
मचली सिहरन !
तन-बदन के सहस्त्र छोर
तक सका न जिन्हें कोई और
चप्पा-चप्पा, हर इक पोर
तुम्हारे स्पर्श से हुए विभोर !
सूर्य-किरण जहाँ न जा पाए
उन अँधियारों में जा समाए
हो तुमसे आत्मसात
मचले अरमान !
बाँहों में भर पाऊँ
तुम जाते निकल
पल-पल प्रतिक्षण
आता नव जल !
कितने नटखट हो
गुदगुदाते, छेड़खानी करते
अरमान जगा
झटसे जाते निकल !
निर्झर…..!
तुम हो [...]