Archive for January, 2009

कैसे..?

Saturday, January 31st, 2009

>online casino netĿल के परवाज़ की सिसकी
सुलग़ते धुएँ में लिपटी
ख़ाक होते ख़्यालों को
नींद की आग़ोश मिले कैसे..?
पलकें पत्थर का बुत हुईं
हरक़त हो तो झपकें
उनींदे हो चुके ख़्वाब
अपने होने का ग़ुमां करें कैसे..?
रेशमी सिलवटों पर चला
करवटों का सिलसिला
ख़्याल पंखों पर उड़ते रहे
रात का आलम मुके कैसे..?
आँखों का आँचल बोझिल
स्पंदन करने को आतुर
धुएं के अम्बार छाए ऍसे
क़हर [...]

इक पन्ना

Tuesday, January 27th, 2009

वो भी ग़ज़ब की
शाम थी अल्साई सी!
ज़ुल्फ़ों के घने साये
तेरे शाने पर बिखरे- बिखरे थे!
तभी
ज़िन्दगी की किताब का
इक पन्ना
उनमें उलझकर
अटक गया वहीं पर!
बयाँ होने को थी
इक दास्तान
अभी इरशाद कहा ही था
अफ़साने करवट लेने लगे!
कि, लफ़्ज़ दर लफ़्ज़
साँसों की रवानगी में छिपी
अनकही बातें
बाख़ूबी समझ आईं!
रोशनाई कहाँ थी इतनी
कि तराशकर
रंग भर कर अफ़साने
इक ज़ुबाँ बन पाते!
मसला यूँ [...]

अहम् का आवेग

Thursday, January 15th, 2009

असीम आवेग से
पानी में मार कर तलवार
छोटे-छोटे टुकड़े
बनते- बिगड़ते
तितर- बितर जाते
अपना अस्तित्व नकारते
अखण्ड ब्रम्हांड में
दारुण व्यथा सुनाते
टुकड़ों में न बँट कर
पंचभूत प्रकरेण बने रहते
* * *
अनहोनी प्रक्रियाएँ
सत्य से परे
भावनाएँ रौंदकर
प्रताणना सहतीं
यथार्थ के धरातल से परे
पानी में
चलातीं तलवारें
* * *
कटती हवा सी चीत्कार
स्वरूप नहीं जल का|
आवेग को सह
करता तृप्त फिर भी
मानव के अहम को |
छिपी बैठी [...]

जाँ बनकर

Thursday, January 15th, 2009

तमाम उम्र गुफ्तगू चली
चैन आया न क़रार आया
ज़िदंगी तेरी चौख़ट पर
मिली सहर बन कर…
ख़ैर मक़दम को उनके
आसमां ज़मीं हो चला
महताबे रोशनी से सरोबार इश्क
लिपटा सिहरन बनकर…
ता उम्र बेपरवाह-पूछा न किये
अदाओं के नश्तर चुभाते रहे
क़ातिल मेरी आग़ोश में
सिमटा जाने जाँ बन कर…
हमनवास, हमराज़, हमसफ़र
जिसकी दोस्ती का भरम था
अल्फ़ाज़ों के खंजर चुभाये
दुश्मने जाँ बन कर…..
वीणा विज