आत्मीय
Tuesday, July 10th, 2007एक भोली भाली
साधारण सी
पर
सबसे उदासीन
इक अजनबी थी वह
प्रथम दृष्टि में..
धीरे-धीरे
निरंतर उसे तकते रहने से
वह नवागुंतक
जिज्ञासा जगाती
लेकिन कटी-कटी रहकर
सबको अपनी ओर
आकृष्ट करती
अंजान सी
सतत आत्मीय लगने लगी थी
और अब,
उसकी उदासीनता
अवगुंठिता सी लगती है….
वह जुड़ी है
किसी और से
जो शायद दूर होकर भी
उसके क़रीब आ जाता है.
उसे सबसे अलग कर जाता है.
उसी में ख़ोयी-ख़ोयी
सबसे अनभिज्ञ
टकटकी लगाए
निरंतर तकती रहती है
शून्य […]