रुसवाई

разтегателни диваниहाले दिल बयां करूं भी तो किससे
माज़ी अपना ही कनारा कर गया..
रस्मे- वफ़ा निभाते रहे उफ़ न किए
बेरुखी से दामन चाक-चाक कर गया..
ज़मीं से फ़लक तक सजदा किए
नाकामियों का मंज़र अता कर गया..
अश्कों का समंदर लहू संग बहे
ऍसे ही जीने का इशारा कर गया..
इश्क में ड़ूबते तो बेख़ुदी समझते
भरी बज़्म में रुसवा यारा कर गया..
लम्हा-लम्हा मरते,रहमते ज़िंदगी जिए
बहारों को अलविदायग़ी कर गया..
हबीब को रक़ीब समझने की भूल कर
शबे-विसाल को शबे-हिज़रा कर गया..!

वीना विज’ उदित’
अर्थ—
माज़ी= रखवाला, फ़लक= आसमान, बज़्म= महफिल
शबे-विसाल= मिलन की रात, शबे-हिज़रा= जुदाई की रात

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