भीतरी बारिश

सूखे तन पे बरसती
भीतरी बारिश में
भीग-भीग जाती हूँ
मैं अन्तर्मन से !
गीली मेरी धोती
चिपकी मुझ से
क़ोफ़्त है कितनी
उघड़ा है बदन !
भीतर चल रहे अंधड़
कँपकँपा जाते हैं
दिखती हूँ जीवन जीती
भीतर ही भीतर रिसती!
चैन ले लूँ मैं भी
आँधियाँ तो थमें
निचोड़ लूँ गीली धोती
ढ़ँक लूँ अंग उघड़ा!
जो मिल जाए उधार
खुशी की इक किरण भी
भीतरी बारिश से धो
संजो लूँ अपने भीतर!!!!!
वीणा विज ‘उदित ‘

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