प्रणय- वेला

आज सन्नाटॉं ने ज़ुबां खोली है
तन्हाई भी गुनगुनाने लगी है
घबराहट से तरबतर तन देखकर
बारिश की बूँदें भी शरमा उठी हैं
*
आज तो पर्वतों की गोद में बादलों ने
अठखेलियाँ करने की ठानी है
ढलती साँझ ने तिरछे से मुस्कुराकर
अपनी अरुणिम रश्मियाँ बिखेरी हैं
*
बदरा भी लजाकर ग़हरा चले हैं
नव-युगल की प्रणय-वेला आ चली है
दुधिया चन्द्र-किरणों के मधुर आलिंगन
नवयौवन को मदहोशी में डुबो चले हैं ||
*
वीना विज ‘उदित’

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One Response to “प्रणय- वेला”

  1. समीर लाल Says:

    सही है.

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