पत्थर खुदा बन गया !

उच्च हिम-शिखरों से
हो अवतरित
पर्वतांगों से खिलवाड़ कर
कंकड- पत्थर को
लेकर संग नदी
इठलाती-बलखाती चली
सागर से करने मिलन !
आपनों से टूटने
धारा संग बहने का विद्रोह
पत्थर का ,जल के
दुलार ने भुलाया विछोह |
बाल-सुलभ हठ को
स्नेह-स्पर्श से बहा चली वो !
लुढ़क-लुढ़क कर
वक्त की धार से जूझकर
रूप बदलता रहा
टूट्-टूट कर
अंगद स्वभिमान चूरकर !
अंततः
उत्तुंग शिखर से
धरा पर पहुँच
पत्थर का
देव-रूप सा
निखरा स्वरूप
आकार पाया
शिव-लिंग का
वही
पत्थर, खुदा बन गया!!!!

वीणा विज ‘उदित’

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