निर्झर

नूतन देहयष्टि का लिया
प्रथम आलिंगन
अनछुए बदन में
मचली सिहरन !
तन-बदन के सहस्त्र छोर
तक सका न जिन्हें कोई और
चप्पा-चप्पा, हर इक पोर
तुम्हारे स्पर्श से हुए विभोर !
सूर्य-किरण जहाँ न जा पाए
उन अँधियारों में जा समाए
हो तुमसे आत्मसात
मचले अरमान !
बाँहों में भर पाऊँ
तुम जाते निकल
पल-पल प्रतिक्षण
आता नव जल !
कितने नटखट हो
गुदगुदाते, छेड़खानी करते
अरमान जगा
झटसे जाते निकल !
निर्झर…..!
तुम हो शीतल निर्मल
कल-कल नाद करते
बढ़ते रहते अविचल !
जल-क्रीड़ा के
अनुभव से जाना
है कितना सुखद
इक-दूजे में समाना !!

वीणा विज ‘ उदित ‘

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  1. मीत का संग

One Response to “निर्झर”

  1. anoop Says:

    अनुपम भावनाओ का वर्णन
    छिपा हुआ दैहिक दर्शन
    सहज अनुभूतिया वर्णित
    कर देती यू ही विस्मित
    भावनाओ का माध्यम जल है
    कितना सुखद इक दूजे मे
    समाने का प्रतिफल है.

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