जाँ बनकर

तमाम उम्र गुफ्तगू चली
चैन आया न क़रार आया
ज़िदंगी तेरी चौख़ट पर
मिली सहर बन कर…
ख़ैर मक़दम को उनके
आसमां ज़मीं हो चला
महताबे रोशनी से सरोबार इश्क
लिपटा सिहरन बनकर…
ता उम्र बेपरवाह-पूछा न किये
अदाओं के नश्तर चुभाते रहे
क़ातिल मेरी आग़ोश में
सिमटा जाने जाँ बन कर…
हमनवास, हमराज़, हमसफ़र
जिसकी दोस्ती का भरम था
अल्फ़ाज़ों के खंजर चुभाये
दुश्मने जाँ बन कर…..

वीणा विज

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