छल का जाल

>компютриłउउउर नभ के आंचल में
डोलती नैय्या सी
इक रंगीली पतंग
मज़बूत  डोर से बँधी
टिकी अपनों के हाथ में,
नियंत्रण कर रहा
होगा शातिर दिमाग
इन सबसे अंजान
कितने इत्मीनान से
झेलती हवाओं का दबाव|
महफूज़ है वह
यही तसल्ली
लिये जा रही है उसे
अन्जानी ऊँचाईयों पर
बेखौफ् होकर…..
इल्म नहीं कि कटी तो
ना जाने कहाँ मिलेगा ठौर
और, शायद!
अस्तित्व ही ना रहे
फँस कर छल के जाल में….!!!

वीना विज ‘उदित’

Share and Enjoy:
  • Print
  • del.icio.us
  • Facebook
  • Google Bookmarks
  • Add to favorites
  • email
  • IndianPad
  • PDF
  • StumbleUpon
  • Twitter

No related posts.

2 Responses to “छल का जाल”

  1. kush Says:

    ज़िंदगी की एक सच्चाई आपने पतंग के मध्यम से बता दी.. बहुत बढ़िया रचना

  2. समीर लाल Says:

    बहुत बढ़िया

Leave a Reply