अहम् का आवेग

असीम आवेग से
पानी में मार कर तलवार
छोटे-छोटे टुकड़े
बनते- बिगड़ते
तितर- बितर जाते
अपना अस्तित्व नकारते
अखण्ड ब्रम्हांड में
दारुण व्यथा सुनाते
टुकड़ों में न बँट कर
पंचभूत प्रकरेण बने रहते
* * *
अनहोनी प्रक्रियाएँ
सत्य से परे
भावनाएँ रौंदकर
प्रताणना सहतीं
यथार्थ के धरातल से परे
पानी में
चलातीं तलवारें
* * *
कटती हवा सी चीत्कार
स्वरूप नहीं जल का|
आवेग को सह
करता तृप्त फिर भी
मानव के अहम को |
छिपी बैठी शायद!
हृदय के इक कोने में
किंचित कोमलता
अनिष्ट न हो कोई
अहम का आवेग
फिर भी निकलता रहे……..|

वीणा विज

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