ग़ज़ल-मौत भी शायराना चाहता हूँ !

फ़िदा हुस्नो-जमाल पर तेरे ऍ मेहज़बीं
दीदारे-हुस्न से सकूने-दिल चाहता हूँ..
भटकता कूए-यार में फिरूँ
इश्को-सितम उठाना चाहता हूँ..
रफ्ता-रफ्ता चल पड़े हैं, सहरे-आगोश में
रस्मे-वफ़ा आजमाना चाहता हूँ..
दीवानग़ी में डूबकर मुर्शिद मेरे
दस्तूरे-वफ़ा निभाना चाहता हूँ..
तेरी रुसवाई की ख़लिश है सीने में
ख़लिश मरकर मिटाना चाहता हूँ..
सामने बैठो सरे-बज़्म ,तकते रहो
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ..!!!
वीणा विज ‘उदित्’

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