हिंदी का संघर्ष

जय हिन्द, जय हिंदी का नारा गूंजा था
स्वातन्त्र्य-संग्राम में जो हिन्दुस्तानी कूदा था
द्रौपदी के चीर-हरण पर कृष्ण पहुंचा था
माँ भारती की आन बचाने जन-जन टूटा था।।
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मलेच्छों-अंग्रेजों ने जाल बिछाया था
अपनी भाषा को हिंदी में.मिलाया था
सदियों से हिंदी जकड़ी रही जंजीरों में
अशुद्ध भाषाओं ने घुस असर दिखाया था।।
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वैश्वीकरण का ढोंग चहुँ ओर है फैला
मिलावट कर अंग्रेजी से ‘हिंग्रेजी’ चला
हिंदी जा उलझी अंग्रेजी के दामन से
“हैलो” ने विश्व में भाषा का जादू दिया फैला ।।
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चीखो-पुकार सुन हिंदी की राष्ट्रसंघ है जागा
ढेरों गुण हिंदी में वर्चस्व जग ने है माना
संस्कृत की वरिष्ठ आत्मजा का पद है पाया
सरस, सरल , मधुर नवरस की हिंदी धारा ।।
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क्षेत्रवादीय भाषाओं की बागडोर है संभाली
सब को एक सूत्र में पिरो माला बना ली
जनभाषा के प्राणप्रणेता मनीषियों को प्रणाम
हिंदी के अधिवक्ताओं ने किया कल्याण ।।
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चमत्कार लिपि का ,उच्चारण का हरा विकार
कश्मीर से कन्याकुमारी तक पिरोया हिंदी हार
भारतवासियों ने गाया मिल जनगन मन गान
सब की मातृभाषा हिंदी है मीठी, मधुर ,महान ।।
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सुसंस्कृत देवनागरी लिपि का ज्ञान -प्रकाश
बाँध एकता सूत्र में , करता पावन प्रयास
सब भाषाओं से अनुप्राणित हिंदी संवादित
भाषा सुरभित जन-जनकी जिव्हा पे विराजित ।।
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वसुधैव कुटुम्बकम् पाने को ऋजु पंथ गहें
वेदों का ज्ञान फैलाने को अविरुद्ध रहें
लिपि विभावरी को वैदिक लिपि का मूल कहें
संज्ञा , सर्वनाम, क्रिया हिंदी को वैज्ञानिक करें ।।

वीणा विज ‘उदित’

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