हाहाकार

झोपड़िया की टूटी छत से
टप-टप टपकता जल
जीवन भिगोता, कँपकँपाता
इमारतें बनानेवाला तन!
फटे चिथड़ों में लिपटते
रेशमी परिधान बनानेवाले
पिचके पेट, अन्न को तरसते
जग का पेट भरने वाले !
कूड़े के ढेर पर पलते
कूड़ों का ढेर उठाने वाले
घुटने पेट में गाड़,ठिठुरते
नरम कंबल ,रजाई बनानेवाले!
अन्याय का हाहाकार–
अत्याचार, असंतोष की लपटें
करेंगी भस्म !
धुरंधर समाज बनाने वाले !!!!!!
वीणा विज ‘उदित ‘

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2 Responses to “हाहाकार”

  1. M Verma Says:

    बहुत सुन्दर और सारगर्भित रचना

  2. समीर लाल ’उड़न तश्तरी’ वाले Says:

    गहरी संवेदनशील रचना!!

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