सूरज का टुकड़ा

मेरे बदन की दरो-दीवारों को छूता
इक सूरज का टुकड़ा
तिरस्कृत कर अन्धकार की काया
आगे सरक-सरक जाता
ठहरता, कभी बतियाता
तो उसकी माया जान पाता
बादलों से ऊँची मीनारों पे रहने वाला
धरा के कण-कण को टटोले तो जाने
उसके आलिंगन की प्यासी
स्याह रात
पाश में बद्ध गंवाती अपना आपा
वक्त की परतों में
सदा से है ज़िन्दगी.
सूरज का नाता
ज़िन्दगी देने वाला
अनकहा -पल रह जाता
आकाश में अटका
समय है त्वरित
कब शिला में बसा
उठती तरंगों में
आरोह-अवरोह बन जाता
ज़िन्दगी की इबारत को पढ़
करवट बदलता मेरा सूरज
टूटे -पलों को साँसों में धड़का
प्राणों में बसा रह जाता
वक्त गुजरता जाता
मेरा सूरज मेरे अन्तरतल में
पुन:-पुन: जन्मता
स्वयं की करता पहचान
अग्नि का आगार !
सोम तत्व की सौर भट्टी में
होती निरंतर आहुति
सौम्य होता अग्नि में शुद्ध होकर
आकाश में प्रक्षिप्त होता
अपना अभेद्यमौन तोड़कर
नैरंतर्य राग अनहद के गाता।।

वीणा विज उदित
15 सित.’15

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One Response to “सूरज का टुकड़ा”

  1. ,सिराज | Hindi short stories, poetry and blogs Says:

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