शाहतूश शाल

चीरू (antelope )

(शोध आलेख )

 अवधारणा… शहतूश शालें एक शहतूश नामक पक्षी के पंखों से बनाई जाती हैं ।

इसके विपरीत सच्चाई ” चीरू” नामक बेहद छोटे जानवर से संबंधित है ।

इसकी सच्चाई सिद्ध करने हेतु कई बकरवालों (nomades)से बार -बार पूछने और तथ्यों की जानकारी हासिल की गई ।अब आपके समक्ष हैं:-


शाल की चर्चा होते ही स्वभाविकतः ही ज़हन में कश्मीर का नाम आ जाता है| कश्मीर में कई किस्म की शालें बनाई जाती हैं| रफल ऊन शाल,जामावार शाल, कलमकारी, कढाई की हुई शाल,बेहतरीन पश्मीना शाल और इन सबसे नायाब “शाहतूश शाल “| भेडों से- ऊन और ऊन से -शाल बनती हैं| साधारण भेडों से आम ऊन, और पश्मीना छोटी भेडों से मँहगी पश्मीना ऊन व एक ख़ास किस्म के छोटे जानवर चीरू से शाहतूश शाल के लिए ऊन मिलती है | सदियों से कश्मीर के ऊँचे पहाडों पर बकरवाल अपनी भेड-बकरियाँ लेकर उन्हें बर्फ़ पिघलने के पश्चात नई उगी घास खिलाने के लिए गर्मियों के आरम्भ में ही चले जाते हैं| उस हरी, ताजी व नई घास को चरने से उन जानवरों से प्राप्त ऊन नर्म व गर्म होती है| ये वहीं डेरे जमा लेते हैं, तभी सुनसान ऊँचे पर्वतों पर इनके डेरों से उठता धुँआ जगह-जगह दिखाई देता है| यह सिलसिला आज भी चल रहा है, और दुनिया को एक से बढकर एक नायाब शालें मिल रही हैं |
उत्तर में मंगोलिया और तिब्बत में भी बेहद ठंड और बर्फ़ होती है| मंगोलिया में चीरू या चिकारा ( antelope )नाम के दो लम्बे-लम्बे सींग वाले छोटे-छोटे जानवर होते हैं, जिनका आकार भेड के मेमने जितना होता है| ये बेहद ठंड में अर्थात समुद्र तल से तकरीबन पाँच हजार मीटर की ऊँचाई पर बर्फ में पाए जाते हैं| ये मंगोलिया के माइगरेटरी जानवर होते हैं, जो तिब्बत में साल में एक बार अवश्य इकट्ठे होते हैं| इनको पकडने या इनका शिकार करने वाले यायावर या बकरवाल जिन्हें नोमेड्स भी कहते हैं, सब का उन दिनों वहीं जमघट लगता है| वो लोग इन्हें लाकर हिमालय की तराई यानि कि लेह, लद्दाख के फ्रीज़िंग तापमान में रखते हैं| चीरू के शरीर की खाल पर बेहद नरम-नरम बाल उगे होते हैं परन्तु ये इतने छोटे होते हैं कि इनको काटा नहीं जा सकता सो बर्फीले मैदानों में इनका शिकार करके ही अधिकतर इनके बालों को प्राप्त करते हैं| एक चीरू के मरने से केवल ५०(पचास)ग्राम बेशकीमती ऊन मिल पाती है| १५० ग्राम ऊन की एक शाल के लिए तीन चीरू को जान गँवानी पडती है| पूरे विश्व के ४०% (चालीस प्रतिशत) चीरू लद्दाख में पाए जाते हैं|
अर्थ–
“शाहतूश” एक पर्शियन शब्द है अर्थात किंग आँफ फाइन वुल | शाहों व महाराजाओं के पहनने वाली नर्म-गर्म ऊन| यानि कि शाहों के कँधों पर सजने वाली नायाब शाल !इसे ऊन का राजा इसलिए कहते हैं क्योंकि यह भेड के बालों से नहीं वरन चीरू की जान लेने से हासिल होती है| चीरू के शरीर के निचले हिस्से में ये बाल होते हैं जो उसे बर्फीली ठंड से बचाते और उसे गर्म रखते हैं| शाहतूश शाल इन्हीं बालों की ऊन से बनती हैं| तभी ये शालें अति मुलायम और ओढने में गर्म होती हैं| चीरू का शिकार करके नोमेड्स उसकी ऊन,माँस,हड़ियाँ,फर्र और सींग प्राप्त करते हैं और बेचकर पैसे कमाते हैं| चीरू की बालों वाली खाल को कश्मीर लाया जाता है| कश्मीर में इसे ऊन बनाने वाले कारीगर तौलकर खरीदते है| फिर मँजे हुए कुशल कारीगर व इस काम में सिद्धहस्त स्त्रियाँ इन बालों की सफाई करके तूश या ऊनी धागा तैयार करते हैं, जो बेहद नाज़ुक होता है| बेहद कुशल पुरुष कारीगर इसी तूश से शाल की बुनाई करते हैं, जिसे “शाहतूश शाल “कहते हैं|
इन शालों की बुनाई के ऊपर ही इनके माप और कीमत तय की जाती है| वह माप “दानी” कहलाता है|
१-एक दानी अर्थात १/१६ धागों की बनावट होती है|
इनके विशेष प्रकार होते हैंः-
पहलाः- सुराह दानी या १६ दानी अर्थात १००% तूश के धागों से तैयार शाल| यह शाल कारीगर की अँगूठी के बीच में से फिसलकर निकल जाती है|
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दूसराः- बाह दानी या १२ दानी अर्थात इन शालों में ७५% (पचहत्तर प्रतिशत ) तूश के रेशे और २५%( पच्चीस प्रतिशत)पश्मीना की ऊन मिलाई जाती है| इस पर कढाई की जा सकती है|
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तीसराः- एइथ दानी या ८ दानी (आठ दानी) अर्थात ५०% (पचास प्रतिशत) ताना तूश का और ५०% पेठा पश्मीना ऊन का यानि कि आधा- आधा मिलाने से ये शालें बनती हैं|
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इसी क्रम से इनकी कीमतें भी घटती जाती हैं| शुद्ध १००% शाहतूश शालें अधिकतर प्लेन स्वभाविक रंगों में होती हैं| क्योंकि यह इतनी मुलायम होती हैं कि इनमें सुई से कढाई करना मुश्किल होता है| पश्मीना मिली शालों पर कश्मीर में खिले फूलों से रंग चुराकर उन्हें ज्यों का त्यों इन पर उकेर दिया जाता है| शायद ही कोई टूरिस्ट होगा जॉ कश्मीर आने पर इनके सम्मोहन में नहीं फँसा होगा और इन्हें साथ नहीं ले गया होगा!
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शहमीनाः- यह शालें भी १३ दानी(तेरहदानी) की खास पश्मीना शालें होती हैं|
आतूश शालेंः- ये जापानी शालें होती हैं| जो “ऍल्म” पेड की अन्दरूनी छाल से धागा निकालकर बनाई जाती हैं| इसके लिए भी कच्चे पेडों को काटने की क्रूरता की जाती है|
विभिन्न प्रकार की शालों की फेहरिस्त होने पर भी सम्पूर्ण विश्व में सबसे बेहतरीन शाल “शाहतूश शाल” को ही माना जाता है| इनमें भी अब कई वैरायटीज़ हैं , जैसेः-
१, कानी जामावार—पूरी गुँथी हुई विभिन्न रंगों के ऊन से खडडी पर बुनकर तैयार की हुई|
२, कानी टावेल शालें—बीच में वैसी ही बुनाई लेकिन दोनो पल्लों पर उन्हीं रंगों की धारियाँ|
३, कलमकारी शाल— फूलों की पंखुडियों के बीच में रंग भरा हुआ|
४, सादा शाहतूश—मोतिया रंग, सुनहरी रंग और स्वभाविक चीरू का रंग|
५, पश्मीना शालें—बहुत आकर्षक कढाई बार्डर,पल्लू और आल ओवर करीगरी की मिसाल होती हैं| अमीर लोगों में इनसे सर्दी में गर्माइश लेने का बहुत चलन होता है| साथ ही दिखावा भी होता है|
६, गरम ऊनी शालें—भेड की ऊन से बनी शालें| इन पर सुन्दर कढाई होती है|आम जनता के लिए गरम शालें|
७, सिंथेटिक शालें—ये मशीनी शालें बनती हैं| ये असल की नकल की जाती है| देखने में सुंदर लेकिन गरम नहीं होतीं|जिनके पास पैसे कम होते हैं , वे इसी से गुज़ारा करते हैं|
८, रफल शालें—मोटा कपडा रंग के उस पर मशीनी कढाई की जाती है, आम जनता के लिए |
इस प्रकार तरह-तरह की शालें कश्मीर व अन्य स्थानों से विश्व भर में भेजी व खरीदी जाती हैं| लेकिन शाहतूश की शाल नामी दुकान से ही लेनी चाहिए न कि फेरी वालों से| इनकी कीमत लाखों में होती है| विदेशों में $५००० या$६००० में मिलती हैं| याद रखें कि सबसे कम माइकरौन काउंट होने के कारण ही ये बेशकीमती होती है|
कहा जाता है कि अक़बर के ज़माने में इन नायाब शालों का बहुत चलन था|तब इन्हें काले ,सफ़ेद, लाल और नैचुरल रंगॉं में किया जाता था | आजकल चीरू जानवरों की संख्या घटने के कारण इन शालों पर कानूनी पाबंदी लगाई जा चुकी है| कभी ये लाखों में पाए जाते थे , पर अब घटकर हजारों में रह गए हैं| पंजाब (भारत) में इन शालों की रजिस्टरेशन करवानी पडती है| इसे खुले आम बेचने की भी कानूनी पाबन्दी है| फिर भी कश्मीरी शाल बेचने वाले इन्हें बेचते हैं|ये ” स्टेटस सिम्बल” मानी जाती हैं| जो हाथ इन शालों को बुनते थे वे अब बूढे हो चुके हैं या मर- खप चुके हैं | अब ये शालें सब रंगों में मिलने लग गई हैं| बशर्ते कि असली शालें मिल जाएं……!

वीणा विज “उदित”
कश्मीर 
 

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