विस्फोट

“आमची मुम्बई”–सुनते ही पीहू असह्य वेदना से छटपटा उठती है| क्या दिया है इस मुम्बई ने ? दर्द , यातना ,बेपनाह पीड़ा और रिसते घावों का कारवाँ | इन सब झटपटाहटों का बोझ अपनी आत्मा पर ढोते हुए वह न जी पाती है , न मर पाती है | फिर कैसा अपनापन ? हवा में लहराता आँचल ज़माने से बेख़बर अपनी ही मस्ती में उड़ता था| कभी वह रौंदा भी जाएगा या फटकर तार-तार हो जाएगा -किसे ख़बर थी ? अपने भोगे हुए सत्य एवम भावपूर्ण यथार्थ को वह ढो रही थी | उसकी अन्तर्वेदना आदमी के दुस्साहस पर अर्तनाद करती हुई सामाजिक एवम सांस्कृतिक मूल्यों को नकारती हुई प्रतिशोध की ज्वाला में प्रतिपल जलती हुई जी रही थी |
एक साथ ही समूची मुम्बई के ढेरों ठिकानों पर बम-विस्फोट हुए | काँप उठी थी महानगरी व उसकी आत्मा | जातीयता , साम्प्रदायिकता एवम धर्म की ओट में राष्टृईयता को मुँह चिढाया जा रहा था | नारायण मंदिर व साथ लगी अग्रवाल चाँल भी निशाना बनेंगी ,किसे मालूम था ? इस इलाके में हरदम भीड़ रहती थी | मंदिर के प्रागंण से संलग्न ढेरों दुकानें थीं | रोज़मर्रा का सामान खरीदनें के चक्कर में साँझ ढले वहाँ मेला लगा जान पड़ता था|
पीहू और बिंदिया दोनों सखियाँ एक्-दूसरे की जान थीं | पीहू के दिल की हर धड़कन बिन्दिया के दिल से होकर गुजरती थी | तो बिन्दिया के ज़हन में भी पीहू समाई रहती थी | काँलेज से लौटकर वे दोनो ही एक-दूसरे के घर जा ,साँझ ढले तक साथ ही रहती थीं | रास्ते में मंदिर में माथा टेकते हुए आना, उनका नियम था | सर्वदृष्टा ईश्वर भी कालचक्र घुमाते हुए उनके प्रणाम को टेढी मुस्कान से स्वीकार कर , लगता गर्वित होते थे | तिस पर वे सोचतीं कि उनकी खुशियों की तरंग पर प्रभु की स्वीकृति की मोहर लग गई | आज पीहू बिन्दिया के घर आई थी | समस्त जग के दुःख-संताप का हरण करने वाले सर्वव्यापक- अदृष्टा भी भावी अनिष्ट का कोई संकेत उन्हें नहीं दे पाए थे | संसारी भोगी सदृश्य उन्होंने भी तो बहुत कुछ भोगा था | होनी टाल सकना बस में कहाँ था उनके? नहीं तो कोई दैवी या उद्दात्त करिश्मा ही हो जाता | दोनो खाना खा कर बालकनी में आ गईं थीं | इन गुइयों की बतियां थीं कि ख़्तम होने का नाम ही नहीं लेती थीं | पीहू का घर समीप ही था |सो, जल्दी की कोई बात भी नहीं थी |
किसी टाँपिक पर दोनो खूब खिलखिलाकर हँस रही थीं | बुझते दीपक की लौ जैसे बुझने से पहले जोर से जलकर फिर फडफडाकर सदा के लिए शांत हो , धुँए की लकीर पीछे छोड़ जाती है—कुछ ऍसी ही खिलती हँसी थी ये | तभी उन्हों ने सुना कोई जोर से कह रहा है कि ये मारुति वैन रास्ते के बीच कौन खड़ी कर गया है? इसे हटाओ यहाँ से | वैन का मालिक वहाँ कहीं नहीं था| वैसे तो चाल में हर ओर से आवाजें आआ कर कानों से टकरा जाती थीं | तो कुछ कानों के ऊपरी रास्ते से गुज़र जाती थीं | उधर कमेटी के नल पर साँझ ढले पानी भरने वालों का शोर और झगड़ा भी पानी के लिए चला ही रहता था| इतने शोर-शराबे में किसे परवाह थी कि वैन के मालिक को पुकारता या ढूँढता | इनकी बातें भी खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं | भीतर से ‘आई’ की पुकार सुनकर् बिन्दिया जल्दी से पीहू को ‘बाय’ कहकर भीतर भागी कि तभी पीहू जीने की ओर घर जाने को चल दी | उसी पल मारुति वैन में एक भयंकर बम का विस्फोट हुआ | और वैन के चिथड़े आसमान में छितर गए | चारों ओर आग की लपटें व चीखों -पुकार मच गई | देखते ही देखते बिंदिया के घरवाला हिस्सा धू-धूकर जल उठा | घर के सभी लोग बालकनी में चीख-चीखकर आग से जूझ रहे थे | बालकनी टूट रही थी और वे सब आग की चपेट में आ गए थे | सब कुछ इतनी जल्दी से घट रहा था कि किसी भी ओर से कोई मदद नहीं पहुँच पाई थी | पीहू की आँखों के सामने उसकी जान, उसकी परमप्रिय सखी , उसके घर के वे सब अपने और बेग़ाने भी जिंदा जल रहे थे | ऍसा भयंकर सत्य समक्ष था कि विनाश की आँधी ने स्वप्नों के सारे तार छितरा दिए थे |
इतना ख़ौफ़नाक नज़ारा—!!लोहे के घुमावदार जीने की ऊपरी मूठ को पकड़े पीहू थर-थर काँप रही थी | अंधाधुँध भागते लोगों की बार-बार ठोकर खा वो अब मूँठ पर और देर नियंत्रण नहीं रख पाई |उसका हाथ छूट गया और ऊपर से नीचे की ओर लुढकती गिरती चली गई | वह पहले पड़ाव
पर चेतनाशून्य हो गिर गई | बाईं ओर के कुछ बचे हुए कमरों से भागते भयभीत लोग जान बचाए नीचे मैदान की ओर बच्चों , बूढों व माल-असबाब को उठाए गिरते-पडते जल्दी में उतर रहे थे | पीहू बीच रास्ते में चेतनाशून्य पड़ी उनकी राह का रोड़ा बनी बेरहमी से सब के पैरों व ठोकरों तले कुचली और रौंदी जा रही थी | चारों ओर लपटों की रॉशनी में मानव अंग हवा में छितर कर गिर रहे थे | दिल दहलाने वाला भयावह दृश्य था | बीच में घड़ी भर को हल्की सी चेतना लौटने पर पीहू ने उठने का यत्न किया पर विफल रही | रात घिर आई थी | बिजली के तार भी पास के खम्बे से लटक कर जल रहे थे | आसपास घटाटोप अंधकार था| वहाँ केवल उड़ते चिथड़ों की लपटों और आग से जलते घरों का ही प्रकाश था | जिन्दा जलने से व गिरते- पड़ते लोगों की कराहटें वातावरण को बदबूदार एवम भयभीत बना रही थीं |
सुषुप्त चेतना की हल्की-हल्की जागृति और गिरने के पश्चात लोगों के पावों की ठोकरों से असह्य पीड़ा से ग्रसित पीहू को जानलेवा पीड़ा व अपने ऊपर अत्याधिक वज़न महसूस हुआ | उसने परिस्थिती को भाँपते हुए अपनी पूरी शक्ती बटोर कर उस हाड-माँस के पिशाच के वज़न को अपने से परे धकेलने का भरसक यत्न किया | लेकिन बार्-बार कुचले जाने से वो चोटों व ज़ख्मों से भरी थी | उसकी ताकत क्षीण हो चुकी थी | सो वो उसे परे हटाने में नाकाम रही | वीभत्स यथार्थ उसे निगले जा रहा था | कोई कामुक, स्त्रीलोलुप उस पर सवार चारों ओर मौत के ताण्डव मे घिरा भी–वासना-क्रीणा में लगा हुआ था | पीहू का कौमार्य उसके मुँह का ग्रास बना हुआ था | उसके दोनो कंधों पर इतना दबाव था कि परे हटाना तो दूर , वो छ्टपटा भी नहीं पा रही थी | पीहू के अंतस से चीखें निकल रही थीं , पर गले में न जाने कैसी गुठली फँस गई थी कि वे बाहर के रास्ते को ढूँढ नहीं पा रही थीं | चीखों का शोर अलबत्ता उसे अपनी कनपटियों के नीचे सुनाई दे रहा था | उसे तो समूची मुम्बई में हुए बम-विस्फोटों के धमाके निरंतर अपने भीतर
एक के बाद एक सुनाई दे रहे थे | भीतरी विस्फोटों की ज्वाला से फूटा लावा पीहू को जला रहा था | बम-विस्फोटों का सत्य वह यथार्थ में भोग रही थी | उसकी संचित निधि आज लुट चुकी थी | वह कंगाल हो गई थी |
पास से भागते लोग अपनी जान बचाने में लगे थे | किसी ने उस जानवर को नही रोका , न ही पीड़ित पीहू को उसके चंगुल से बचाया | हवस का नंगा नाच किसी की चेतना को उद्वेलित नहीं कर सका | अलबत्ता , मरे लोगों के गहने वे अवश्य उतारकर ले जा रहे थे| माल-असबाब भी लूट रहे थे | (ऍसे मौकों पर इंसान जानवर बन जाता है |स्वार्थपरता हावी हो जाती है , उसकी मूढबुद्धि पर )तभी तो जलती लपटॉं के सीने में कैसे धधकते बवंडर उठ रहे थे – कोई नहीं देख पा रहा था | वह उद्भ्रान्त पिशाच भी अपने दुष्कर्म को अँधेरे की चादर से ढाँप , उसी में लोप हो गया था | भभकती लपटॉं में किस-किस का क्या कुछ जलकर ख़ाक हो गया था —यह तो भुक्त भोगी ही जानता था | पीहू का स्वंयभुक्त -सत्य उसके समक्ष था | वो असहाय पड़ी सिसक रही थी | सब आस्थाएं आज टूट रही थीं | फिर भी अदृश्य शक्ति से हिम्मत माँग पीहू ने धीरे-धीरे अपने आप को बटोरा |
अपने तार-तार हुए आँचल को उघड़े बदन की ढाल बना अपने इर्द-गिर्द लपेटा | फिर अपने आप को सीढियों से नीचे गिराया | जैसे कोई लाश सीढियों से नीचे गिर रही हो |
फायर-ब्रिगेड व एम्बुलैंस के सायरन चारों ओर सुनाई दे रहे थे | कहीं कोई उसे देख न ले , उसने ज़मीन पर पहुँच अपने आहत बदन को
निचली सीढी के पिछली ओर छिपा लिया | काफी देर तक बिना हिले-डुले वो गठरी बनी वहीं पड़ी रही | डरती थी अब कोई और दरिन्दा पुलिस-कर्मी या
समाज-सेवक के रूप में उसे पुनः प्रताड़ित न करे | आधी रात को जब हवा में रुदन थमा और रॉशनी भी थककर निढाल हॉ गई –तो उसने अपने को घसीटना शुरु किया | वो जल्द से जल्द अपनी माँ के पास पहुँच , उसके आँचल में छिपना चाहती थी | सो, दृढनिष्ठ हो वो अपने अभियान पर निकल पड़ी | वो अँधेरी रात में सड़क पर घिसट रही थी | उसकी टाँगों में उठने या खड़े होने की हिम्मत जवाब दे चुकी थी | ज़रा सी भी आहट होने पर वह
जहाँ होती वहीं पर गठरी बन थम जाती , मानो कोई लाश या गठरी पड़ी हो | जो कुछ मिनटों का फ़ासला था , वही घंटों का फ़ासला बन गया था |
जिस घर में वह उड़ती पतंग सी पहुँच जाती थी , आज वही पतंग कट चुकी थी |जिसे अपना ठौर-ठिकाना नहीं मिल रहा था | उड़न की चाह तो पहले से भी प्रबल थी | लेकिन , हिम्मत की डोर टूट चुकी थी | टूटा हुआ इंसान पूर्णता की चाह में टूटन को तो नकार नहीं सकता ,लेकिन दृढनिश्चय की बैसाखियाँ लेकर वो पूर्णता प्राप्त करके ही रहता है | सो, निश्चय अडिग था | आधी रात से ऊबड़-खाबड़ सड़क पर घिसटने से वो जगह-जगह से खरोंचों से लहूलुहान हो रही थी | भोर की आती प्रथम किरणों को हराते हुए वह घर के दरवाजे पर पहुँच जीत गई | उसने हल्की सी थाप दी | दरवाज़ा मानो बाट जोहता , खुला ही था | क्षीण सी आवाज़ ‘माँ’ निकली | हर पल राह तकती ,सैंकड़ों देवी -देवता मनाती माँ ने आगे बढकर उसे अपनी बाहों में भर सीने से लगा कर आँचल में छिपा लिया | आँखों ने आँखों से बिना कहे निःशब्द ही सब-कुछ कह-सुन लिया | माँ उसे सीने से भींचकर बिलख उठी | घर पर बाबा व भैया नहीं थे | न मालूम वे उसे कहाँ-कहाँ पर अभी तक ढूँढ रहे थे | माँ ने बेटी का वास्तव अपने भीतर सदा
के लिए दफ्न कर लिया | लेकिन पीहू का सत्य अपने भीतर विस्फोटों की गूँज आज भी सुनता है |

वीणा विज ‘उदित’
४६९-आर माँडल टाऊन
जलंधर-१४४००३, मो-९४६४३३४११४

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