वक्त की बरबादियाँ-ग़ज़लl

दिले ग़मग़ीं का पुर सकूँ मंज़र
तेरी यादों ने आबाद किया-
ख़लिश दफ़्न थी सीने में
रुसवाई की तेरी
उन्हीं ज़ख़्मों ने बेवफाई पे
इक शेअर इरशाद किया-
तनहाइयाँ नासूर बन चुभती रहीं
वक्त के इस मंज़र को भी आदाब किया-
यूँ तो तमाम उम्र जद्दोजहद चलती रही
बिन तेरे ,ज़िंदगी का हादसा भी बर्दाश्त किया-
खुशनसीब हैं वो करते हैं बहारों का इस्तकबाल
ख़िज़ा को हमने बाअदब तस्लेमात किया –
तेरी जुस्तजू में आवारगी का थाम दामन
वक्त की इबारतों का नुक्ता मालूमात किया –
जहर ए जहन्नुम था नसीब मेरा
तेरे पाकीज़ा तसुव्वर ने आबे-हयात किया –
क्यूँकर कहिए ? किससे कीजे फरियाद?
चलता करिए जहान से अब
क्योंकि
वक्त ने मुझको, मैंने वक्त को बरबाद किया |

वीणा विज ‘उदित’

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