लौह संकल्प

मदनलाल काँलौनी के पार्क में बैठा अपने ही ख़्यालों में खोया हुआ था |उसे ऍसा लग रहा था, मानो उसके पास कुछ भी नहीं है |इतने बड़े संसार में वो नितांत अकेला रह गया है |उसके हम उम्र मित्र थोड़ी गप-शप मार कर अपने-अपने घरों में जा चुके थे |किन्तु आज उसके पैर नौ मन के हो रहे थे |उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे |संध्या के धुंधलके में उसके समक्ष पिछले तीस वर्ष चल-चित्र की भांति चल पड़े थे |……Loh Sankalp

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2 Responses to “लौह संकल्प”

  1. Submit story online Says:

    कहानि अच्चि है, पर्न्थु बहोत सरे शब्दो मे मात्रओ कि कमि है!

  2. Veena Says:

    Pl read again, there is not a singal maatra fault.Thanks for liking it.
    Regards, Veena Vij