रचना-धर्मिता

अपने प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष पुनः एक कहानी-संग्रह लेकर उपस्थित हूँ | इनमे कुछ विशेष क्षणों , किसी विशेष मनःस्थिती और किसी विचार विशेष से संलग्न सत्य हैं , जो हमारे सामाजिक परिवेष में व्याप्त हैं | एक दौड़ती लहर के वह गति-चित्र भी हैं , जो आपको लक्षित हो जाएं और आपके भीतर विचारों की आँधी चला दें–तभी ये कथानक जो अबाध गति से प्रस्फुटित हुए हैं —-अपने ध्येय में सफल हैं |
ये दादी-नानी की कल्पनालोक की कहानियों से बाहर निकल जीवन के यथार्थ धरातल पर टिकी हैं |इनमें आधुनिक समकालीन समाज की प्राथमिक जरूरतें रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा एक आँतरिक पीड़ा जो हर कहीं व्याप्त है और जो गले की फाँस बनकर दिन-रात चैन नहीं लेने देती है –उसका ज़िक्र है | इनमें मानव का द्वन्द्व व आन्तरिक द्वन्द्व , जो लहू के कतरे-कतरे में बह आत्मा को ग़ालता है — उसी को यथा संभव उकेरा गया है | एवम एक सही दिशा अपनाते हुए उसे कम करने की पुरज़ोर कोशिश की गई है |अनुभूति होने पर ही अभिव्यक्ति संभव है , फिर भावों के वेग में से अमूल्य रस ग्रहण किए बिना लेखनी की तृष्णा कहाँ बुझती है ? तभी तो इन रचनाओं में मानव-मन की पीड़ा ही नहीं अन्तर्द्वन्द्व को भी जीतकर बाहर निकलने का आत्मसुख प्रस्तुत किया गया है | इनके कण आसपास बिखरी ज़िंदगियों के यथार्थ से लिए गए हैं , जिनमें सदियों की छाती में चुभती पीड़ाएं आज भी साँस ले रही हैं| जिनसे उबरकर वे खुली हवा में साँस लेने को एक नया धरातल खोजना चाहती हैं | नित्यप्रति आसपास घटती घ्टनाओं , नेपथ्य से फूटती चीखों , आकस्मिक समस्याओं , उपेक्षित विषयों एवम निजी अनुभवों से जुड़ी हैं ये समकालीन रचनाएं जो आशावादी दृष्टिकोण लिए चलती हैं | आज के जीवन की क्लिष्टता , प्रताड़ना व परिवेश की जटिलताओं से जूझते इंसान को पूरी प्रखरता के साथ ही इन में व्यक्त किया गया है | गहरे में पैठ मानवमन के भावों , संघर्षों, इच्छाओं व उसके अन्तर्द्वन्द्व को खोल-खोलकर आपके समक्ष रख रही हूँ | क्योंकि यह संचेतन अभिव्यक्ति है |
नारी के रूढिवादी तथा आधुनिक दोनो रूपों को वाणी देकर नारी के संघर्ष के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत किया है इन कहानियों में | नारी का अपना वजूद है | वह केवल माँ , बहन ,बेटी व पत्नी न होकर स्वंय अपने वजूद को भी कायम रखना चाहती है | वह उद्वेलित हो रही है–कन्याओं व समस्त नारीजाति की अस्मिता की सुरक्षा को लेकर | अपने अस्तित्व की पहचान व अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए वह छटपटा रही है | इन रचनाओं में सत्य से उपजी संवेदनाओं का समावेश है | आज संबंधों को लेकर नई चुन्नौतियाँ सामने आ रही हैं | नारी व पुरुष के समलैंगिग संबंध ! इनसे समाज का ढाँचा अजीबोग़रीब समस्याओं को सामने पा रहा है | आप शिक्षित हैं या समझदार हैं , फिर भी भावनाएं तो ज़ख्मी हो रही हैं | इस रूप में सबंधों में नई क्रान्ति आ रही है–जिनसे जूझना आसान नहीं है |
प्रबुद्ध पाठकों के अन्तर्मन को छूते हुए ये कहानियाँ उनकी आत्मा में चिंतन की गहरी संवेदना पैदा करेंगी, जब तक कि वे पात्रों के संग न चलने लगें और कहानी की संवेदना उनकी अपनी संवेदना न बन जाए | ऍसे कि वे उसमें जीने लगें | ये स्वंय बोलेंगी |इसी विश्वास के साथ——-
अर्ज़ है—
एहसासे ज़िन्दगी जिन्दा हुई सुन कलियों की गुफ़्तगू
वरना
बरपा था हर सू ख़ामोशियों का मंज़र –!!!

वीणा विज ‘उदित्’
४६९-आर, माडल टाऊन
जलंधर -१४४००३
फोन-०१८१ २२७१६४४
सैल-०९४६४३३४११४
ई मेल-
वैब सा इट–

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