प्रकृति की कोख का बलात्कार

चीत्कारों की गूँज से दिशाएँ गूँज रही हैं,
लू लगती गरम हवाएँ शूल सी चुभ रही हैं|

दूजे के घर की आग का सेंक तो था,मन जलता न था,
अब अपनी कोख़ जली तो जलन का अंदाज़ा हुआ|

धरोहर कोख़ की ले स्वयं पर गर्वित हो इतराती,
बलात्कार उसी कोख़ का होने पर बेबस हो जाती|

रणचण्ड़ी भी बनी,रण का कारण भी यही बनी,
लुटाती तन-मन,फिर भी बलात्कार की बलि पर चढ़ी|

फूलों की कलियाँ,गेहूँ की बालियाँ कैसे खुद को बचाएँ,
रक्षक भक्षक बने,बाड़ खेत की ख़ुद को खाए|

बलात्कारियों की कैसे हो पहचान कैसे हो गिनती,
कौन सुनेगा फरियाद किससे हो रक्षा की विनती|

सदियों से लूट रहा मानव तो अस्मत नारी की,
डराकर, समझाकर या बरबस ली चाहत इसकी|

राँकेट,मिसाइल,अग्निप्रक्षेपास्त्रों से भेद प्रकृति का पाया,
धरती की छाती को चीर ,कोख़ पर इसकी बलात्कार किया|

वायुमण्डल को चीरती इक चीख़ चली सौर-मण्डल को,
बलात्कारी प्रवृत्ति की भयानकता दिखाती भूमण्डल को||
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वीणा विज’ उदित’
(सन्नाटों के पहरेदार )

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