ढलती साँझ 

” इतवार को मेरे घर में अमृतवाणी का पाठ है कावेरी ,आप आइयेगा।अरे हाँ माता जी नमस्कार ! आप कैसी हैं ?कावेरी ,माता जी को भी अवश्य साथ लेकर आना ।”कहती हुई वनिता ने ज्यूँ ही वापिस जाने को उसके घर की दहलीज़ पर  पाँव रखा कि कावेरी ने उसे धर दबोचा ।

“वनिता ,तेरा भी दिमाग काम नहीं करता । यार , मुझे बुला रही हो तो माता जी को भी बुलाने की क्या जरूरत थी ?घर पर भी तो कोई एक रहेगा न ! अब तो वो कहेंगी कि उनके जाए बिना पाठ कैसे होगा । वनिता ने उन्हे खास बुलाया है ।तूने कर दी न गड़बड़।” कावेरी के तेवर देखकर वनिता के सिर को झटका लगा। वह बिन कुछ बोले ही वहाँ से चल दी ।। उसके समक्ष बुजुर्गों को लेकर एक सवालिया निशान खिंच गया था ।

कहते हैं कि चलता हुआ आदमी और दौड़ता हुआ घोड़ा कभी बूढ़ा नहीं होता । मानसिक व्याधियाँ उपेक्षा एवम् अकर्मण्यता से जन्मती हैं जो समय से पूर्व ही शरीर को जर्जर बना डालती हैं ।शारीरिक रूप से असहाय वृद्ध यदि भावनात्मक वा मानसिक रूप से प्रसन्नवद हों तो वृद्धावस्था सुखद हो जाती है । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति का जीवन 110 वर्ष तक होना चाहिए । गिनीज़ बुक औफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज़ है कि नार्वे का एक व्यक्ति 146 वर्ष तक जिया । जापान में तो सौ वर्ष से अधिक आयु भोगने वाले तकरीबन दो हजार  व्यक्ति हैं । वहाँ लम्बी आयु का मूल कारण है उनकी व्यस्त दिनचर्या । नहीं तो बुढ़ापा वा बिमारी एक -दूसरे के पूरक माने जाते हैं । किसी भी रुग्ण वृद्ध से यदि स्नेहयुक्त दो बोल कोई बोल दे तो बहते को तिनके का सहारा मिल जाता है । कावेरी का अपनी सास के प्रति व्यवहार वनिता के दिल को कचोट रहा था । सुनियोजित प्लानिंग कर के वो अपनी सास को उसके घर पाठ पे ला सकती थी । अदृश्य भविष्य अपनी ओर इंगित करता शायद उसे दिखाई नहीं दे रहा था । 

रिटायर्ड कर्नल मेहरा की बहू रीना के पास एक ही टापिक है बात करने को । ” जब भी हमारे दोस्त विज़िट करने आते हैं , इनके डैडी बीच में आकर बैठ जाते हैं और किसी न किसी बहाने अपनी बीती दास्तानें सुनाकर सब को बोर करते हैं।” उधर प्रतिमा को गिला है कि  उसकी सास उसकी सहेलियों को जब देखो बीच में आकर बिन मांगे सलाहें देने लग जाती है । अब वे उसके घर आने से कतराती हैं ।सो, गौ़र करने की बात है कि समाज में पीठ पीछे खुले आम उनकी खिल्ली उड़ाने की अपेक्षा यदि घर में उनके पास बैठकर उन्हे प्यार से समझा दिया जाए तो कोई भी बुजुर्ग अपने बच्चों की हेठी नहीं होने देंगे । जरुरत है तो सिर्फ स्नेहपूर्ण व्यवहार की ।

आज के बदलते युग में बुजुर्गों के समक्ष सबसे भयानक चिंता है ” असुरक्षा ” की भावना । आज की युवा पीढी़ का अपने माता -पिता एवम् परिवार के प्रति बेरुख़ी का रवैया देखते हुए यह स्वभाविक भी है ।सकल परिवार का बहिष्कार और एकल परिवार का चलन बुजुर्गो के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है ।प्राचीन समय में लोग अपने बुढ़ापे के लिए धन संचित इसलिए करते थे कि बुढ़ापे में इसी धन के लालच में उनके बेटे बहू उनकी सेवा सुश्रूषा करेंगे । धन तो आज भी संचित करते हैं बुजुर्ग, लेकिन उद्देश्य भिन्न है । आज बुढ़ापे में वे किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहते । अपने इलाज के लिए  व सेवा के लिए नौकर, आया, नर्स किसी का भी प्रबंध वे स्वयं कर सकते हैं। आज किसी भी बच्चे के पास समय नहीं है। समय के साथ साथ सेवा की भावना, हिम्मत, धैर्य, इच्छा ,नीयत कुछ भी नहीं है । ज्यादा से ज्यादा वे एक बार आकर उनका हाल पूछने की औपचारिकता अवश्य निभा जाते हैं , और वे इसी से धन्य हो जाते हैं। मोह का बंधन है आखीर…।अधिकतर देखने में आता है कि न जाने क्यूँ स्त्रियों ने ही दीर्घ आयु भोगने का ठेका लिया हुआ है । तभी तो पति लोग अपने मरणोपरांत भी उनकी सुरक्षा हेतु अपना घर- जमीन आदि उनके नाम कर जाते हैं। मानो भावी खटखटाकर उन्हें सचेत करती है कि वे बच्चों से कोई उम्मीद न रखें। उनके न रहने पर पत्नि के सिर पर कम से कम  छत तो कायम रहेगी । सात फेरों के बंधन में बँधे वे अपने उत्तरदायित्व मरने के पश्चात भी निभाते हैं। फिर भी बुजुर्गों को “एकाकीपन”बहुत कचोटता है। एक दिन पारो आंटी मिली, उनकी बातें सुनकर विनीता का मन भर आया । वो तो पके फोड़े सी फूटी थीं। ” बेटी , जिस घर को तिनका -तिनका जोड़कर बनाया, जिस पर राज किया ,देवर- ननद ब्याहे ,जहाँ हमेशा रौनक रहती थी …आज उसी घर में एक बेजान वस्तु सी पड़ी रहना भी कोई जीना है ?कोई नहीं पूछता । सब के बैड रुम ऊपर हैं। समय ही नहीं है किसी के पास । वैसे माँगने से तो मौत नहीं मिलती , फिर भी ऊपरवाले से रोज मौत माँगती हूँ । काश! तेरे अंकल के साथ भगवान मुझे भी उठा लेता । ” और उनके आँसू ढलान पर बेरोक बहने लगे ।

      विनीता की किटी पार्टी में हर बार की तरह  ,इस बार यह चर्चा हुई कि अब व्यक्ति की औसतन आयु बढ़ गई है। कि तभी मिसेस गुलाटी बोली, “क्या करना है इतना लम्बा जी कर? जैसे ही हमारी जिम्मेवारियाँ पूरी हो जाती हैं हमें मर जाना चाहिए। जिस बेटे को पाल-पोसकर बड़ा होने पर जिसका ब्याह करते हैं, जो हमारा मान होता है …वह एक रात में ही अपनी दुल्हन के पल्लू में बँध जाता है। और बहू आते ही सोचती हैकि अब वो घर की मालकिन हो गई। अब सास नामक प्राणी का घर में क्या काम? आप बात करती हैं मनुष्य की औसतन आयु के बढ़ने की। भई क्या करेंगे लम्बा जीकर?इस जिल्लत भरी जि़न्दगी से जहाँ हर दिन मरते हैं,  तो मौत ही अच्छी।”वो तो ऐसे विफरीं थीं जैसे किसी ने चिकोटी काट ली हो । सारा माहौल गांभीर्य से ढक गया। कि तभी आशा जी ने भी कुछ कह विचार सामने रखे तो सब को जैसे साँप सूँघ गया । वे बोली, “मैं तो दिन-रात ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़ती हूं कि हे प्रभु, मेरे पति को मुझ से पहले उठा लेना ,नहीं तो मेरे बाद  उनको तो कोई पानी का गिलास भी नहीं पूछने वाला। सारी उम्र हुक्म ही चलाते रहे । क्यूँ सुनेगा कोई उनका हुक्म ? हम औरतों की तरह वे घर के काम काज में हाथ तो बँटा नहीं सकते फिर उनके काम कौन करेगा । तेज – तरार बहू के वाक्यों को कहाँ झेल पाएगे वे ? विधुर लोग वैसे भी बेचारे से हो जाते हैं ।”और वे भी भीगी पलकों के बोझ तले दब गईं । वातावरण बोझिल हो गया था ।ऐसे विचारों को जान कर तात्कालीन समाज के रवैय्ये के प्रति वनिता का मन ग्लानि से भर उठा ।वह सोच में पड़ गई कि यदि आज के बुजुर्ग इस समस्या से इस कदर दुःखी हैं तो आने वाली पीढ़ी का ठौर क्या होगा ? यह तो बेहद गंभीर समस्या है ।

विदेश पलायन से ममता की डोरियाँ शीघ्र टूटती दिखाई दे रही हैं हर कहीं ।आए दिन अपना घर -बार, सामान -असबाब बेच कर लोग अपने बच्चों को विदेश भेज रहे हैं । विरले ही हैं  जो मुड़कर वापिस देखते हैं । ऐसे ही एक माता-पिता से पिंगलाघर में वनिता की मुलाकात हुई कुछ दिनों बाद ।उनकी अकेली औलाद उनके इकलौते बेटे ने विदेश पहुँचकर कुछ महीने तो पैसे भेजे । परन्तु अब सालों से उसका कोई अता-पता नहीं था । वे बेचारे तो अपना सब कुछ उसकी ख़ातिर गिरवी रख चुके थे ।अब उन्होंने पिंगलाघर में शरण ली थी और यतीमों सी जि़ंदगी जी रहे थे । ऐसा बहुत परिवारों के साथ हो रहा है । कई विधवा माताएं अपने बच्चों को उनके उज्ज्वल व सुनहरे भविष्य की खातिर उन्हें विदेश भेजकर स्वयं घर में अकेली जीवन को ढो रही हैं ,कि  उनके बच्चे उन्हें भी वहाँ बुला लेंगे। यह बात और है कि बच्चे उन्हे बुलाते तो हैं ,पर विदेश के दर्शन करा के और चार दिनों की चाँदनी दिखाकर पुनः एकाकी अँधेरे में छोड़ देते हैं ।

विदेशों में बुजुर्गो का इलाज बहुत मँहगा है । वहाँ भी गरीब हैं जो अपने बुजुर्गों के इलाज करने में असमर्थ होने पर उन्हें अस्पताल ले जा कर और दाखिल करवाकर झूठा पता लिखाकर उन्हें वहीं छोड़ आते हैं । इसी कारण वहाँ “ओल्ड एज होम या वृद्धाश्रम “का बहुत चलन है । अमीरों और गरीबों के भिन्न भिन्न आश्रम होते हैं । असल में अपनी उम्र के लोगों में उनका खूब मन लगता है ।उनकी मानसिकता के स्वरूप ही उनके रहन-सहन ,खुराक, सफाई ,मनोरंजन तथा डाक्टरी जाँच का इंतजाम किया जाता है । यानि जितना गुड़ डालो उतना मीठा ….।

वृद्धाश्रमों का चलन हमारे देश में भी अत्यंत आवश्यक है। वैसे कई स्वयंसेवी संस्थाएं ऐसे कार्यों में जुटी भी हैं। दिल्ली व पंजाब में निश्चित रूप से यह विचारधारा फलीभूत हो रही है। सरकार की ओर से भी इस पर ध्यान देना आवश्यक है । जीवन के अंतिम दिनों में बुजुर्गों को उनकी मिट्टी से दूर नहीं करना चाहिए । अपने अमेरिका भ्रमण के दौरान वनिता का न्यूयार्क  में  एक भारतीय की बेकरी पर जाना हुआ । वहाँ दिल्ली की बात चली तो उनकी माता जी जो दुकान के बाहर सड़क किनारे बैठी थीं, ने सुना दिल्ली का नाम तो झट भीतर आकर याचना भरे स्वरों में बोलीं, “बेटी, क्या तूं मुझे अपने साथ दिल्ली ले चलेगी ? ” वनिता ने हाँ में सिर हिला दिया । दुकान की मालकिन उनकी बेटी थी । उसने वनिता को अंग्रेजी में बताया कि अभी माँ की वापसी की टिकट अगले महीने की है ,लेकिन ये हर दिन वापिस जाने की रट लगाए रहती हैं । स्टोर के बाहर सड़क किनारे बैठी लोगों से पंजाबी में विनती करती रहती हैं कि कोई इन्हे हिन्दुस्तान ले चले । उनकी दयनीय दशा देखकर हर कोई उन पर तरस खाता था । वनिता हतप्रभ रह गई । उसे लगा यह भी कैसे बेबस हालात हैं।वे आजाद हैं लेकिन फिर भी पराए देश में कैद हैं । एक माँ को अपनी बेटी नहीं वरन् अपने वतन की मिट्टी की गंध चाहिए । वह अपने पड़ौसियों, रिश्तेदारों और हमजोलियों के लिए तड़प रही है ।वतन में नवरात्रे , दशहरा और दिवाली के त्यौहारों के दिन आ रहे हैं । वो बेचैन है सब मनाने के लिए ।वनिता की आँखें नम हो आईं–यह भी कैसे मजबूरिये हालात थे !

शारीरिक एवम् मानसिक व्याधियाँ शरीर को जर्जर कर देती हैं । दो मीठे बोल व सहानुभूति के कुछ शब्द बूढ़े व्यक्ति के जीवन को खुशी से भर देते हैं । धन्य है वो औलाद जो अपने बूढ़े माता -पिता को पूरा सम्मान देते व दिन -रात उनकी सेवा करते हैं । किस्मत वाले हैं वे बुजुर्ग जिनको परिवार में यथोचित आदर-सत्कार मिलता है व जिन्हें बड़प्पन का एहसास करवाया जाता है ।

हम सभी को जीवन की साँझ आती तो दिखाई देती है ,लेकिन जब वो साँझ ढलने लगती है तो बाँहे फैलाए समने अंधकार बढ़ता भी दिखाई देता है । उस अंधियारी खोह का अंधेरा अप्रत्याशित लम्बा हो जाता है जो नैराश्यपूर्ण होता है । यदि वहाँ रोशनी की एक हल्की किरण दिखाई दे जाए तो उस अंधकार से डर नहीं लगेगा , न ही निराशा घेरेगी । बल्कि उस में जिया जा सकता है अन्तिम पल तक …!

इस आधुनिक प्रगतिशील युग में आज के बच्चों को ही तय करना हैकि अपने बुजुर्गों की ढलती साँझ को वे कैसे सुनहरी साँझ बनाते हैं ।

वीणा विज ‘उदित’

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