ठहराव

मेरे तसुव्वर में वो आज भी उतनी जवान, खूबसूरत व मदभरे नैनों में सारे जहाँ की नम -परछाइयाँ लिए हुए है | वक्त है कि साँप की टेढी चाल की माफ़िक सरकता ही जाता है|कभी इस ओर तो कभी उस ओर मोड़ मारते हुए |वो भी दिन थे, मैं आँखें मलते हुए सुबह उठता और सीधे खिड़की की सलाखों के दरमियां सिर टिकाकर बाहर सामने वाले घर के झज्जे की ओर झाँकता था | इस उम्मीद में कि वो नहाकर रस्सी पर तौलिया टाँगने आई होगी, और उसकी नज़रें मुझे ढूँढ रही होंगीं |तौलिए की आढ से उसकी एक आँख मुझे देख लेती थी , हमारी नज़रें टकरातीं तो उन नज़रों का अंदाज़ ही खुशनुमा हो
जाता था |इधर मेरी सुबह का आग़ाज़ उसकी खिली मुस्कान से होता |मेरे भीतर एक सुकून छा जाता था|मैं भी छत पर पड़े गमलों को पानी देने के बहाने छत के जीने की ओर भागता और बाल्टी -मग लेकर पानी देता क्या ,उसकी ओर ही तकता रहता था|वह भी रस्सी पर पड़े कपड़े इधर – उधर करती रहती थी |हम -दोनों मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को तकते रहते ,हाथ अपना काम सधे हुए ढंग से करते जाते और आँखों ही आँखों में ढ़ेरों अफ़साने बयां हो जाते थे |फिर हम दोनो ही भीतर चले जाते थे|हाँ, इतवार को कुछ न कुछ गड़बड़ी हो जाती ,और यह सब मुमकिन नहीं हो पाता था |खैर, दिन बीतते गए और मुझे इंजीनियरिंग में सीट मिल गई |मैं बिदर (साऊथ) जा रहा था |घर में सब बेहद खुश थे ,लेकिन मैं अपनी चाहत से दूर जाने के ख़्याल से ही परेशान था |एक दिन हिम्मत कर मैंने उसे एक बुक दिखाकर इशारे से पिछवाड़े आने को कहा |सबकी नज़रें बचाकर वो आ गई |मैने उसे बताया कि मैं बिदर जा रहा हूँ, मेरा पता इस बुक में एक लैटर है ,उस में है |और वह बुक मैने उसे भेंट दे दी |उसके दोनों हाथों को पकड़ कर मैने प्यार से चूम लिया |वो शरमाकर भाग गई |मैं अपने हाथों को देर तक निहारता रहा |सोचा था उन हाथों को कभी भी धोऊँगा नहीं |उनमें उसकी खुशबू भर गई थी , लेकिन फिर अपने नादान ख़्याल पर मुझे हँसी आ गई | आशाओं ,उम्मीदों के दीप जल उठे थे |उसको छू भर लेने से मेरे सारे शरीर में जैसे शक्ती का संचार हो गया था | मैं बिदर चला गया था | मेरी खुशी का पारावार नहीं था , जिस दिन वहाँ मेरे हाथ में उसका ख़त आया था| उसकी बेबसी व बेकली पढकर मैं घंटों उस ख़त को बार्-बार पढता रहा था |हाँ, उसने जवाब देने को मना किया था | उसके पास कोई सेफ पता नहीं था , जहाँ वो ख़त मँगवा सकती ||उसी मदहोशी के आलम में मैं बिदर में फर्स्ट सैमिस्टर तक आराम से रहा |मुझे पहले प्यार की पहली चिट्ठी ने नशे में रखा था|
आज के नौजवानों को यह नशा क्या मालूम? आज तो सैल-फोन ने हर तड़प को हर लिया है |चुपके-चुपके रात -दिन प्रेम आग में जलने की रिवायत भी खतम कर दी है |झट फोन उठाया और दर्दे -दिल कर दिया बयां |खैर, बहरहाल दीदारे यार करने को ,दिवाली पर घर आने की तलब बेकरार किए हुए थी |
घर पहुँचते ही मैने सामान रखा और नज़र सामने टिका दी |तभी सामने से घर के भीतर घुसते हुए उसने पूछा, ‘आंटी !आपके पास दही की जामन है?ममी -‘हाँ’ कहकर भीतर किचन में चली गईं |उसे सामने देख मेरा तो खुशी के मारे बुरा हाल था |दोनो ने एक -दूसरे को आँखों ही आँखों में सलाम किया |
वो बोली , “कैसे हैं आप? आज रात घर पर कोई नहीं है, आप आ जाना |”मैं तो यह सुनकर उसका मुँह ही देखता रह गया और वो पल में दही लेकर ग़ायब| रात अभी दूर -बहुत दूर थी | एक-एक लम्हा काटे नहीं कट रहा था |कब साँझ की परछाइयाँ आएंगी, गहराएंगी और बिछेंगी रात के ख़ैर-मकदम को ?सो ,इंतज़ार ही इंतज़ार था |आखीरकार बढती आती रात में ज़िंदगी के एक नए रहस्य को जानने की उत्सुकता में मैने माँ से बहाना बनाया कि दोस्तों को मिलकर एकाध घंटे में आता हूँ |( उसके ममी-पापा को घर से बाहर निकलते मैं देख चुका था) दरवाज़ा खुला ही था , मैं चुपचाप अंदर दाखिल हो गया |वहाँ अंधेरे में ही वह मुझ से लिपट गई |हम दोनो आलिगंनबद्ध हो गए थे |प्यार की बारिश बिन मेघ गहराए इक-दूजे पर बरस रही थी |लैटर्स ने जो तड़प जगाई थी , यह मधुर-मिलन उसीका नतीजा था | मेरे जवाँ बाजुओं में इतना बल आ गया कि मैने उठाकर उसे अपने सीने से लगाकर भींच लिया |वो भी कहे जा रही थी ,’यह बँधन कभी न खोलना”|हम दोनो एक-दूसरे में समाने को आतुर ही थे कि बाहर कार का हाँर्न सुनाई दिया |हमारी तन्द्रा टूटी, मैं झट पर्दे के पीछे छिप गया |उसके ममी -पापा जैसे ही भीतर दाखिल हुए मैं झट से पर्दे के पीछे से बाहर |मेरा तन-बदन जल रहा था | ज़िंदगी भर न भूलने वाली रात थी वो |माँ ने आया देखकर खाने के लिए बुलाया–पर मुझे होश ही कहाँ था आज ?मैंने खाना नहीं खाया , माँ बुलाती रह गई थी | फिर जीवन भर ऍसा मौका हाथ नहीं लगा |
उसकी बेताबी भरी सिहरन मैं अपने साथ ही बाँधकर ले गया था |(आज भी मैं उसे महसूसता हूँ )इसके बाद उसका कोई ख़त नहीं आया |मैं पागल दीवाने की तरह रोज डाक देखता रहता था|मेरा जुनून कब मुझे क्लास-रूम से होस्टल के लैटर-बाँक्स तक ले आता था , मुझे पता ही नहीं चलता था |धीरे-धीरे वक्त ने घाव भरने शुरू किए |गर्मी की छुट्टियों में दिल में नए आशा के दीप जलाए मैं घर पहुँचा |पता चला उसके पापा की ट्रांसफर हो गई थी |वो लोग जा चुके थे |एक टीस देकर किस्सा ही खतम हो चुका था |कैसे पता लगाता ? वो कोई कम्पयूटर का जमाना थोड़े ही था कि गुग्गल पर सर्च करो और ढूँढलो |
वक्त गुजरा और मैं इंजीनियर बन गया |मेरी शादी कर दी गई |मेरी बीवी बहुत सुशील, पढी-लिखी व समझदार थी |पर, मुझे उस में वो बात दिखाई नहीं देती थी |दो बच्चे भी बड़े प्यारे हो गए थे , लेकिन मन से वो कसक जाती ही नहीं थी |कभी -कभी सोए-सोए उसके ख़्याल से मैं झटके से उठ बैठता था |बीवी के पूछने पर टाल जाता| फिर ,सारी रात उसके उसी मनमोहक रूप में उलझा सवेरा कर लेता था | कम्बख़्त, पीछा ही नहीं छोड़ती थी |एक बार काम के सिलसिले मे मैंने गुजरात जाना था |उन्हीं दिनो उस की एक सहेली मिली , जिससे पता चला कि उसकी भी शादी हो गई है, उसकी दो बेटियाँ हैं |वो बड़ौदा में रहती है |मन में ढेरों चाहतों ने यकायक ही जन्म ले लिया | पन्द्रह बरस का लम्बा अन्तराल था बीच में |उसका वो फूल सा चेहरा आज भी तरो-ताज़ा था मेरे ज़हन में |खैर, अपने रब को मनाता मैं गुजरात में बद्दौदा, अहमदाबाद और बाद में ओ.एन.जी.सी की पार्टी अटैंड करने भड़ौंच गया |हर कहीं मेरी आँखें अपनी प्रियतमा को ढूँढ रहीं थीं |सोचता मैं कैसा दीवाना हूँ भला वो क्या सड़कों पर या ऑफिसों में मिलेगी ?मन को मनाता कि मैं आखीर उसे भूल क्यों नहीं जाता? मेरी बीवी कितनी स्मार्ट है! नाज़ुक सा बदन है उसका |पर उसके मुकाबले वो कहाँ–?
भड़ौँच में नर्मदा तीव्र वेग से अपने गन्तव्य समुद्र में मिलने को आतुर बढती दिखाई देती है |अवर्णनीय है यह मिलन का दृश्य–! मनोपटल पर छा जाता है !!मिलन का इतना शोर, इतना वेग और इतना विराट रूप!!!सांकेतिक है कि मिलन के समय वेग की तीव्रता मायने रखती है और कितना सौन्द्र्यमय है मिलन!!!!!काश, मेरा मिलन भी ..! खैर,
रात को ओ.एन.जी.सी के गैस्ट हाऊस के लाँन में शानदार पार्टी व डिनर का आयोजन था |ओ.एन.जी.सी के हाई आँफीसर्स व गैस्ट सभी आर्मी-बैंड की धुन में मस्त थे |मेरे साथी व मैं भी एकाध पैग लगाकर पुराने गीतों की धुन पर
थिरक रहे थे |तभी कानों में आवाज़ सुनाई दी,’चुन्नी बेबी कहाँ है आया?’-मुझे जोर का झटका लगा, अरे यह तो बहुत जानी-पहचानी आवाज़ है | मैंने डांस -फ्लोर छोड़ उधर का रुख किया | मेरे कानों में शहनाइयाँ बजने लग गईं थी | हो न हो यह मेरे ख़्वाबों की मंज़िल है | मैं इधर- उधर अपनी दिलरुबा महबूबा को खोजने लग गया | उसे कहीं न पाकर मेरा मन इसे अपना वहम मानने को तैयार नहीं था
| हताश ,मैं वापिस मुड़ा ही था कि मेरे पास पीठ किए खड़ी एक कूल्हे से बहुत भारी स्त्री ने अपनी चुन्नी बेबी को कलाई से खींचते हुए कुर्सी पर बैठाया | अरे! हूबहू यह तो वही थी |उसकी नज़र मुझ पर पड़ी ,तो एकदम बोल उठी,’आप !”(मैं आज भी मस्त जवान वैसा का वैसा ही था)मैने भी उसके अधपके बालों को देखते हुए पूछ लिया ,कैसी हो? मज़े में, वह बोली | उसे थुलथुली औरत बनी देखकर मेरी तो हवा ही खिसक गई थी | मेरी आँखों के समक्ष मेरी स्मार्ट बीवी आ गई, जिसने दो बच्चे पैदा करके भी अपने शरीर को सुडौल बनाए रखा था | सच कहूँ तो वो भद्दी लग रही थी | हम दोनो से ही कुछ बोलते नहीं बन रहा था | सो, सादे शिष्टाचार के बाद मैं वहाँ से चला आया ….सदा के लिए |
पिछले पंद्रह बरसों से जो बचैनी मुझ साल रही थी , चैन से जीने नहीं दे रही थी –उसमें आज ठहराव आ गया था |स्वप्न धूल-रंजित हो चुके थे , वास्तविकता सम्मुख थी अब | अचानक मेरा पत्नी -प्रेम देखकर मेरी पत्नी हैरान ! उ हूँ ,बेहद खुश थी |
वीणा विज ‘उदित’

Be Sociable, Share!

Leave a Reply