कैसे..?

>online casino netĿल के परवाज़ की सिसकी
सुलग़ते धुएँ में लिपटी
ख़ाक होते ख़्यालों को
नींद की आग़ोश मिले कैसे..?
पलकें पत्थर का बुत हुईं
हरक़त हो तो झपकें
उनींदे हो चुके ख़्वाब
अपने होने का ग़ुमां करें कैसे..?
रेशमी सिलवटों पर चला
करवटों का सिलसिला
ख़्याल पंखों पर उड़ते रहे
रात का आलम मुके कैसे..?
आँखों का आँचल बोझिल
स्पंदन करने को आतुर
धुएं के अम्बार छाए ऍसे
क़हर की रात ढले कैसे..?

ग़ज़ल….वीणा विज ‘उदित’

Be Sociable, Share!

Leave a Reply