कुदरत का न्याय (लघु -कथा)

रमा दीदी रोती-बिलखती छोटे भाई के घर पहुँची |रोती हुई बोली,’ माँ बहुत बीमार है | डा. कहते हैं हार्ट की सर्जरी होगी |करवा दो भाई, माँ बच जाएगी ‘|शशांक का दिल माँ की हालत सुनकर एकबारगी तड़प उठा | उसने सामने खड़ी सीमा की ओर देखा |सीमा का मुँह बन गया था | उसने इशारे से पति को भीतर बुलाया |बोली,’ यहाँ अपने खर्चे पूरे नहीं होते , ऊपर से दीदी माँ का रोना लेकर आ गई है |तुम ही जानो |’ उसके बिगड़े तेवर देखकर शशांक ने मजबूरी जता दी | रमा जैसी रोती आई थी, उल्टे पाँव वैसी ही लौट गई | माँ अपनी विधवा बेटी के साथ रहती थी |अब बेटी क्या करे? माँ को कैसे मरने को छोड़ दे? वह एक समाज सेवी संस्था के सचिव के पास मदद की गुहार लेकर पहुँची |उन्होंने केस की परख कर के मदद करना स्वीकार कर लिया |
उधर् शशांक एक दिन दोपहर को दोनों बच्चों को लेकर ऊपर छत पर धूप सेंकने व कुछ काम करने बैठा |माँ को लेकर उसका दिल भीतर से बेचैन था | वह अपने ही ख़्यालों में गुम था |वहाँ खेलते हुए बच्चों में झगड़ा हुआ| पावन ने मंशा को ऍसा धक्का दिया कि वो छत से नीचे आँगन में जा गिरी |जहाँ वह गिरी उस जगह पानी के नल की टूटी थी |पीतल की टूटी नीचे से आठ साल की मंशा के भीतर घुस गई |मंशा की दर्दनाक चीख सुन कर शशांक भी जोर से चीखा |तब तक सीमा और पड़ौसी भी इकट्ठे हो गए |खून के फव्वारे मंशा के नीचे से निकल कर सारे आँगन में फैल रहे थे | मंशा को गोद में उठाए वे रोते-बिलखते अस्पताल ऍमरजैंसी में पहुँचे |आँप्रेशन काफी लम्बा था |बिल भी बहुत था | रात को डा. ने बताया कि यह बच्ची ज़िन्दगी में कभी माँ नहीं बन सकेगी | ईश्वर का शुक्र है कि इसकी जान बच गई है | शशांक ने कुदरत का न्याय देखकर पीछे दीवार में सिर दे मारा ,और बच्चों सा बिलख उठा |
वीणा विज’ उदित’

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