इन्द्रधनुषी चाह

विजय की कार जैसे ही कंवल की दुकान के सामने जाकर रुकी |कंवल ग्राहक को फ़टाफट सामान पकड़ाकर बाहर की ओर भागा |उसने विजय को कसकर सीने से लगा लिया |दोनों में बेहद प्यार था |रामनाथ को दुकान देखने को कहकर, दोनो दोस्त दुकान के ऊपर के घर में चले गए |
सामने ही ऊँचे कद का छरहरा -सा जवान सरदार बैठा था | कंवल ने विजय से उसका परिचय कराते हुए कहा, “यार ! ये मेरे बचपन का दोस्त कुलजीत है | काम की
तलाश में यहाँ श्रीनगर मेरे पास आया है |विजय को कुलजीत सीधा-सादा इंसान लगा | तीनों हम उम्र साथ बैठ गए तो बातों -बातों में पता चला कि कुलजीत के पिता लुधियाना में साइकिल फैक्ट्री में काम करते थे |बी.ए पास करके कुलजीत नौकरी नहीं करना चाहता था सो , वो भी कंवलजीत सिंह की तरह पंजाब से कश्मीर में बसने का ख़्वाब लिए आ पहुँचा था ,अपने यार के पास |कंवल की शादी हुए अभी कुछ महीने ही हुए थे |भीतर पम्मी जी को आलू के परांठे बनाने को कह वो तीनों इधर- उधर की बाते करते रहे | जैसे, पंजाब होता तो आम का अचार व लस्सी का मज़ा भी होता |श्रीनगर में तो हमेशा से ताजे दूध की किल्लत रहती है |अमृतसर से पाउडर का दूध बोरियों में वादी की खपत पूरी करने के लिए मँगाया जाता है | सो, आलू के पराठों के साथ पाउडर के दूध की चाय से ही काम चलाना पड़ा | खाने-पीने के बाद दोनो ने कुलजीत को तसल्ली दी कि उसके लिए कुछ न कुछ अवश्य करेंगे |
बडशाह चौक से आगे लैम्बर्ट लेन में एक मोटर वर्कशाँप के साथ ही खाली जगह पर कुलजीत के लिए एक जगह किराए पर मिल गई |काम क्या खोला जाए, इस समस्या का समाधान ढूँढा स्वयं कुलजीत ने |उसे पापा के साथ कई बार फैक्टरी जाने का मौका मिलता था |वह ध्यान से वहाँ सब देखता रहता था |फलस्वरूप अपनी साइकिल वो
घर पर ही ठीक कर लेता था |यही सोचकर उसने साइकिल से संबंधित औज़ार बाजार से खरीदकर वहाँ अपनी छोटी सी दूकान सजा ली |इससे पहले वो कुलजीत के घर के काम करा देता था और वहीं उनके साथ ही रहने लग गया था, भाभी का देवर बनकर | सबका आपस में मन लग गया था | विजय भी कभी-कभार पहलगाम (वहाँ से तीन घंटे का रास्ता था) से उनसे मिलने आ जाया करता था | वहाँ उसका अपना काम था |
कुलजीत का काम धीरे-धीरे चल पड़ा | साठ के दशक के आखिरी दौर की बातें हैं | अभी स्कूटर ने बाजार में नया-नया कदम रखा था | साइकिल आम सवारी थी | कुलजीत ने अपने माँ बापूजी को अपने काम सैट होने की खबर दे दी | वे अपने पहचान वालों में शान से बताने लगे कि उनका बेटा कश्मीर में सैट हो गया है |(जिस तरह आजकल बेटा विदेश में सैट होने पर बताते हैं ) | बिरादरी से कुलजीत के लिए एकसे एक रिश्ते शादी के लिए आने लगे | उसके माता-पिता ने एक भले घर की प्यारी सी लड़की से उसका रिश्ता पक्का कर दिया |कुलजीत कंवल के भरोसे दुकान छोड़कर दो दिनो के लिए सगाई की रस्म के लिए लुधियाना आया | सगाई के बाद आती सर्दियों में ब्याह रखा गया | बर्फीले पहाड़ों से घिरी वादी में जाड़े में बेहद ठंड के कारण वहाँ के लोग दिसम्बर में जम्मू की ओर निकल पड़ते हैं | यहाँ तक कि सचिवालय व सारे सरकारी दफ्तर भी जम्मू शिफ्ट हो जाते हैं | फिर जम्मू छैः माह के लिए कश्मीर की राजधानी बन जाता है, व श्रीनगर में काम भी ठप्प हो जाता है |सो, सर्दियों का विवाह सको सूट करता था |फरवरी की शादी तय हो गई | कंवल, पम्मी व विजय तीनों कुलजीत की शादी में सम्मिलित होने हेतु लुधियाना पहुँचे | पंजाब में शादी की धूम-धाम ही निराली होती है |
फिर ये तो कश्मीर से आए मेहमान थे, इनकी खातिर भी खूब हो रही थी | घूँघट से मुँह छिपाए दुल्हन की मुँह-दिखाई होते ही –उसकी सुन्दरता देखकर सबके मुँह खुले के खुले रह गए |डेज़ी गोरे रंग की बेहद सुन्दर व मोटी-मोटी आँखों वाली थी |लगा ,चाँद ज़मीन पर उतर आया हो | वहाँ हर कोई कुलजीत की किस्मत पर रश्क कर रहा था | दुल्हन के नाक की कील व उसमें चमकता नग तो ग़ज़ब ढा रहा था | कुलजीत भी खुशी से फूला नहीं समा रहा था |
बहुत ही हँसी -खुशी के माहौल में शादी सम्पन्न हुई| शादी के नौगे लेकर कंवल व पम्मी जब जाने लगे तो कुलजीत ने कह ही दिया ,” पापे! रहने का इंतज़ाम भी अब आपने ही करना हैः हम दोनो अगले महीने आएंगे | “कंवल तो बड़े भाई की तरह जिम्मेवारी का बोझ
लेकर लौटा | श्रीनगर पहुँचते ही वह अपने पहचान वालों से पूछताछ करके घर ढूँढने में लग गया | कर्ण नगर के एक कश्मीरी पंडित मिस्टर धर कंवल के पक्के ग्राहक थे | उन्होंने बताया कि उनके साथवाला घर खाली हुआ है |कंवल ने बिना विलम्ब किए पेशगी देकर घर ले लिया | घर की बड़ी खिड़की सड़क की ओर खुलती थी ,पर घर में जो पहली मंज़िल पर था, पहुँचने के लिए पीछे से जीना चढना पड़ता था | पम्मी ने बाज़ार से कपड़ा लाकर उस के पर्दे भी बना दिए | अप्रैल के अख़िर में कुलजीत डेज़ी को लेकर आ पहुँचा|
डेज़ी के दहेज का फर्नीचर ,रेडियो, व बर्तन साथ लाए थे वे बस पर |चारों ने मिलकर खूब प्यार से उस घर को सजाया |पम्मीजी खाना बनाकर टिफिन में साथ ले आईं थी |मिलकर प्रफुल्ल मन से सबने खाना खाया | कुलजीत की आँखों में कृतज्ञता के भाव थे | कंवल ने डेज़ी से उन दोनो के पाँव छुआए | इससे आत्मीयता के भाव से सभी भर उठे |नए पंछियों का नीढ़ बसाकर कंवल मानो संतुष्टि से भर उठा था |
अप्रैल के महीने में भी वहाँ बेहद ठंड थी| बस में आते समय कश्मीर का मन लुभावन सौन्दर्य देख-देखकर डेज़ी का मन नहीं भरता था| श्रीनगर पहुँचकर शहर के चारों ओर बर्फ़ से ढँकी पहाड़ियाँ मनोरम दृश्य उपस्थित करतीं थीं |सैलानियों का हिलस्टेशन पर आना आरम्भ हो चुका था | डेज़ी अपने घर का काम निपटाकर सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की पर आ बैठती | रेडियो पर गाने लगा लेती | फिर ज़रा सा पर्दा सरकाकर चुपके से सैलानियों में नए जोड़ों को बाहों में बाहें डाले मस्ती करते देखती ,नेपथ्य में फिल्मी गाने —बजते रहते | बस , डेज़ी भी ख़्यालों में ग़ुम हो जाती ,व स्वयं से ही शरमा जाती |
एक इतवार की शाम खाना साथ लेकर कंवल, पम्मी व ये दोनो भी शालीमार -बाग़ पिकनिक करने गए |उससे अगले इतवार चश्मे शाही गए |डँल झील के किनारे ऊपर को चढता रास्ता | किनारे गुलाब के फूलों के बाग़–उनसे आती महक!! डेज़ी का मन झूम उठा |ऊपर पहुँचकर डेज़ी ने कुलजीत का हाथ पकड़कर धीरे से कहा, ‘चलो जी! हम भी हनी मून के जोड़े की तरह हाथ पकड़कर बाग़ की सैर करे|”इस पर कुलजीत ने शोर मचाकर कंवल से कहा, ” वीरजी ! चलो , भाभीजी का हाथ पकड़ो |हम दोनों की जोड़ियाँ हनीमून की जोड़ियाँ हैं |”इसी तरह हँसते -खेलते फोटो खींचते देर रात तक सब अपने-अपने घर लौटे |मस्ती में दिन बीत रहे थे | डेज़ी ख़्वाबों में उड़ती रहती |खुशी में फिल्मी धुनें भी गुनगुनाती रहती | एक रात तो डँल झील में शिकारे की सैर करते-करते आधी रात हो जाने पर वे घर लौटे |इतवार के इंतज़ार में छैः दिन कैसे बीत जाते पता ही नहीं चलता था |डेज़ी महकती रहती थी |
अचानक एक इतवार काम की अधिकता होने के कारण कुलजीत घूमने नहीं जा पाया |उससे अगली बार भी ऍसा ही हुआ | अब अधिकतर ऍसा ही होता था | डॅज़ी तो मुर्झा सी गई |वो गुमसुम रहने लगी |उसके होठों ने गुनगुनाना बंद कर दिया | उसे लगा काम करना, घर में पड़े रहना —यह भी कोई ज़िन्दगी है? कुलजीत का दे–र रात गए तक इंतज़ार करना |वह सारा दिन खिड़की पर बैठी रहती थी| धीरे-धीरे यही उसका रूटीन बन गया था|
एक रात देखती क्या है कि उसके घर के सामने एक बड़ी सी सफेद इम्पोर्टेड कार आकर खड़ी हुई है, उसमें से कुलजीत किसी अमीर आदमी के साथ बाहर निकला | उनके पहुँचने से पहले डेज़ी ने फुर्ती से कमरा ठीक-ठाक किया व दरवाज़ा खोला | कुलजीत ने उसे मिलाते हुए कहा ,”डेज़ी! ये ‘ज्ञान’, मेरे स्कूल का यार !लुधियाने से आया है |और ज्ञान! ये है मेरी बीवी ‘डेज़ी’ |ज्ञान तो डेज़ी के सौन्दर्य को देखता ही रह गया | उसे लगा डेज़ी की मोटी-मोटी आँखों में ऍसा उन्माद है जो उसे पागल कर देगा |डेज़ी अपनी क़ातलाना तिरछी मुस्कान बिखेरती बोली,”सत श्री अकाल जी !” ज्ञान को कुलजीत के भाग्य पर जलन
हो उठी |उसे लगा , वह रईस होते हुए भी कुलजीत के इस ख़जाने के समक्ष एकदम ग़रीब है |
ज्ञान के पिता की करोड़ों की फैक्ट्री थी लुधियाना में| वह विदेश से शिक्षा लेकर आया था |उसकी पत्नि महेन्दर कौर में स्त्री होने के अलावा कोई विशेष बात नहीं थी | श्रीनगर किसी काम से आया था |कार दिखाने को वे मोटर वर्कशाप पर खड़े थे कि कुलजीत की नज़र उस पर पड़ गई |वह फ्री था सो उसके आग्रह पर उनके घर चला आया था |पर अब वह उस क्षण को दुआ दे रहा था , जब उसने ये फैंसला लिया था| ज्ञान में भी कुछ बात तो थी ,वह आम लोगों से हट के था | ज्ञान का बैग कुलजीत के कँधे पर था, जो उसके हीन भाव का प्रतीक था |ज्ञान के अन्दर आते ही उसके विदेशी सैंट की खुशबू से
कमरा महक उठा |डेज़ी को उसका आना बहुत अच्छा लग रहा था | कुलजीत आते हुए चिकन टिक्का व फिश पकौड़े साथ लेता आया था | बैग में से इम्पोर्टेड व्हिस्की निकालकर गिलास व सामान के साथ मेज़ पर सजा दिए गए |रेडियो पर धीमे-धीमे मस्त गाने चल रहे थे |समां रंगीन बन गया था |
दोनो दोस्त स्कूल की बातें भी करते जाते थे, व खाते-पीते भी जाते थे| पास बैठी डेज़ी ने कनखियों से देखा कि ज्ञान उसी को एकटक देखे जा रहा है | ज्ञान का घूरना उसे चुभ रहा था | मालूम है वह बहुत सुंदर है, पर यूँ कोई बेगाना किसी को लगातार तो नहीं देखता रहता न!डेज़ी ने उनके पीने की बस करवाई, और खाना लगा दिया |खाना खाकर वह ड्राइवर के साथ होटल चला गया|
यह सिलसिला ऍसा शुरू हुआ कि अब हर शाम कार भेजकर ज्ञान उन दोनो को होटल ही बुलवा लेता |तीनों वहीं बैठते, ड्रिन्क्स करते फिर खाना खाने के बाद ड्राइवर उन दोनो को घर छोड़ आता| डेज़ी के ख़्वाबों को तो मानो पर लग गए थे| उसके अन्दर
इन्द्रधनुषी-चाहतें पनपने लगीं , जिनका अपने धरातल से कोई ताल्लुक नहीं होता |वो अपने को खूब सजाती-सँवारती और सबसे अहम बात्-ुसे आजकल खाना भी नहीं पकाना पड़ता था |हर दिन लम्बी गाड़ी में बैठकर उसे लगता वो कहीं की महारानी है |
आपस में तीनों बेहद बेतकल्लुफ़ हो गए थे | जब वे दोनों हर शाम पैग लेते ,तो
डेज़ी भी कोल्ड -ड्रिंक या जूस लेती , जिसमे ज्ञान चुपचाप व्हिस्की मिला देता था |डेज़ी पर भी सरूर छा जाता था ,इस पर ज्ञान कभी उसे बाँह पकड़कर उठाता तो कभी पास बैठकर उसके काँधे पर सिर रख देता या ऍसा ही कुछ और…पर कोई बुरा नहीं मानता था | एक रात ज्ञान ने बीस हजार के कड़कते नोट कुलजीत को पकड़ाए व उसे कहा कि इससे अपना काम बढ़ाए, दुकान में नई साईकिलें रखे | कुलजीत और डेज़ी दोनो ही उसकी दरियादिली के क़ायल हो गए | कुलजीत के तो इन्द्रधनुषी ख़्वाब सजने लगे |
ज्ञान ने कहा कि वो पहलगाम घूमना चाहता है |वो दोनो भी साथ चलें |कुलजीत ने हामी भर दी , लेकिन अगले दिन काम की अधिकता का बहाना बना दिया (उसका नए -नए नोटों को खर्च करने का दिल कर रहा था )| डेज़ी ने सुना तो उसका मुँह लटक गया |ज्ञान ने मौके का फ़ायदा उठाते हुए कहा कि डेज़ी को तो काम नहीं है न! वो साथ दे सकती है |कुलजीत उसके इरादों से अंजान ,एकदम बोला कि यह ठीक रहेगा |वह काम के कारण उसे घुमाने ले जा नहीं सकेगा, इसी बहाने वह भी पहलगाम देख आएगी , घूम -फिर आएगी | ज्ञान को तो मानो मुँह-माँगी मुराद मिल गई |डेज़ी ने भी पहलगाम के विषय में बहुत सुन रखा था , उसके मुँह में भी पानी आ रहा था–इस ट्रिप के लिए | कुलजीत ने उन्हें गाईड किया कि वहाँ उसके दोस्त विजय का होटल है, ये वहीं जाएं | ज्ञान ने मानो कुछ सुना ही नहीं |
कार की पिछली सीट पर बैठे, पहाड़ी रास्तों पर हिचकौले खाते, एक -दूसरे से ट्कराते, बातें करते तीन घंटों का सफ़र बीत गया और साँझ के धुँधलके में वे पहाड़ों से घिरे ४०-५० दुकानों के बाज़ार में पहुँचे |लम्बी- सीधी सड़क वाला पहलगाम, दोनो ओर दुकानें व होटल | बाज़ार में जगमगाती रोशनियों से दिन जैसा उजाला था| हनीमून के लिए आए नव-युगल एक-दूसरे पर झूलते हुए समाँ रंगीन बनाए हुए थे |जोर-जोर से गानों की आवाज़ें आ रही थीं |लिदर(पहाड़ी नदी) का शोर संगीत की लय सा सुनाई दे रहा था | ऍसा मस्त माहौल देखकर कौन ना झूम उठेगा? कार रोककर ज्ञान ने ज्यूँ ही खिड़की खोली तो बर्फ़ानी हवा के झोंके से उनके ज़िस्म काँप उठे |वहाँ बहुत ठंड थी | उसने ड्राइवर को तंदूरी मुर्गा लाने को भेजा |ज्ञान ने ड्राइवर को बाज़ार की भीड़-भाड़ से दूर एकान्त में बने एक बड़े होटल ग्रीन-व्यूह में चलने को कहा | होटल के सुवीट में दो कमरे , व हाँल था | वे वहीं रुके |डेज़ी वहाँ की साज-सज्जा देखकर हैरान थी | उसे लगा कि एक कमरा उसका व एक ज्ञान का है , सो वो निश्चिंत हो गई |उसे लगा कि काश! उसका पति भी इतना अमीर होता!!!वह ठंड से काँप रही थी |ज्ञान ने उसे ब्राँडी पीने को दी , तभी वेटर आकर वहाँ फायर-प्लेस में पड़ी लकड़ियों को आग लगा गया |आग के जोर पकड़ते ही कमरे का माहौल बदल गया | तंदूरी चिकन के साथ व्हिस्की खुल गई| बाकि खाना भी वहीं मँगवा लिया गया | डेज़ी वहीं नीचे कालीन पर आग के पास कुशन्स रखकर अधलेटी सी बैठ गई |आग की लपटों की रोशनी में डेज़ी का सौन्दर्य दुगुना बढ़ गया था |उसे यूँ देखकर ज्ञान का मन बेईमान हो रहा था |उसने सिर दुखने का बहाना किया व डेज़ी के पास आ गया |डेज़ी पर भी ब्राँडी का सरूर छाया हुआ था |बोली, ‘लाओ , मैं दबा देती हूँ| ज्ञान ने मौके का फ़ायदा उठाया | झट उसकी गोद में सिर रख दिया |आँखें बंद करके उसने उसके बदन से मुँह सटा दिया |व्हिस्की + ब्राँडी के असर में, आग की लपटों की गर्मी में कब दोनों जवाँ बदन एक हो गए..उन्हें मालूम ही नहीं चला |कमरे के स्पीकरों पर अंग्रेजी धुन बज रही थी , वातावरण मधुर हो रहा था |
सुबह की पौ फटने पर जब आग की लपटों की गर्मी ठंडी पड़ गई, तो डेज़ी ने आँख
खोली, अपने को उसने जिस हाल में पाया व पास पड़े ज्ञान को देखा…वह घबरा गई |
उसका सिर अभी भी भारी था |वह नहाने भागी| अपन बदन में समाई मैल को वो मल-मल कर धो रही थी , पर वो मैल थी कि उतर ही नहीं रही थी |ज्ञान के बदन की इम्पोर्टेड सैन्ट उसके बदन से चिपक गई थी | वह बुझते मन से तैयार होकर बाहर हाँल में आई |वे दोनो आपस में नज़र चुरा रहे थे |ज्ञान माहौल को हल्का करते हुए उसे नाश्ते के बाद शाँपिंग को ले गया |उसने उसे फिरोज़ी रंग का कश्मीरी सूट कढाईवाला और काले रंग की कश्मीरी शाँल लेकर दी |दिन के समय पोनी -राईड (घोड़े की सैर) करते वे जंगल में घूमते रहे |साँझ होने पर वे श्रीनगर के लिए चल दिए |
श्रीनगर पहुँचकर ज्ञान ने कुलजीत को बड़ी दुकान लेकर देने और लुधियाना वापिस जाकर उसकी नई दुकान के लिए माल भी भेजने का वायदा किया | डेज़ी चुपचाप सब सुन रही व समझ रही थी |
रात को कुलजीत जब थका-माँदा बिस्तर पर आकर उसके साथ लेटा तो कुलजीत क डेज़ी के बदन से ज्ञान के सैंट की खुशबू आती लगी, लेकिन उसने अपना
ध्यान बीस हजार के नए नोटों और बड़ी दुकान में लगा लिया | आज डेज़ी को अपने दिल-जानी से पसीने की दुर्गन्ध आ रही थी , जिसे वो फिरोज़ी सूट व कश्मीरी कढाईवाली काली शाँल के नीचे दबाने का व्यर्थ प्रयत्न कर रही थी | दोनों ही दिमाग को ताक पर रखकर एक-दूसरे की बाहों में समा गए थे | चारों ओर …इन्द्रधनुषी रंग बिखरे पड़े थे |

वीणा विज ‘उदित’

Be Sociable, Share!

Comments are closed.