अपूर्व पूर्णत्व

भावनाओं को चोट पहुँचने से गार्गी को जो वेदना और कसक उठती ,वो एक अंधड़ बन जाती और फिर उसकी कलम की स्याही स्वंय को काग़ज पर मिटाकर एक कविता या नज़्म का रूप धरकर ही थमती |गार्गी छुप-छुपकर अपनी डायरी के कोरे पन्नों पर आत्मानुभूति के उदगार उकेरती रहती|घर-परिवार में सब कुछ होते हुए भी उसके भीतर एक रिक्तता बनी रहती |उसके भीतर की बेचैनियाँ उथल-पुथल मचाए रहतीं |जब भी काम से निपट वो निढाल हो बिस्तर पर पसरती तो उसमें बर्फ़ की ठंडक सी सिहरन सदा व्याप्त रहती |कभी किसी ने ध्यान ही नहीं दिया |ध्यान देता भी कौन ?पति तो व्यवहारिकता के स्तर पर जीवन जीते थे |भावनात्मक पहलू उन्हें छू तक नहीं गया था |घर का अस्तित्व तो केवल उनकी प्रतिदिन की जरूरतों के साथ बँधा था |उससे परे भी कुछ है ,यह जानने की शायद वो आवश्यकता ही नहीं समझते थे | दोनो बच्चे शिशिर और मूर्ति पहले पढाई-लिखाई फिर क्रमशः सैट होकर ,ब्याह कर दूर शहरॉं में जा बसे थे |उनका अपना जीवन, अपना संसार , अपना दायरा बन गया था |समय कहाँ था उनके पास भी औपचारिकता निभाने के सिवाय |
एक अकेलापन घेर गया था गार्गी को, जिससे उबरने के ढेरों माध्यम वो खोजती रहती थी | टी.वी आँन करके ;उसमें मन रमाने की सोच वह चैनल ही बदलती रह जाती थी | मन कहीं ठहरता ही नहीं था| हाँ कभी पुरानी फिल्मों के नग़में टी.वी पर चल रहे होते तो अतीत में घुसकर उसका कुछ वक्त गुज़र जाता था|एक दिन -किसी पुराने नग़में को सुनते हुए उसके भीतर से एक लय चली और उसकी उँगलियाँ मेज पर थिरक कर थाप दे संगत देने लगीं |
अपनी थिरकती उँगलियों को देख उसे कुछ याद आया |गार्गी ने दसवीं के बाद टाइपिंग का कोर्स किया था |उसने सुना था कि कम्प्यूटर सीखने में इससे मदद मिलती है |तो क्यूँ न वो कम्प्यूटर ही सीख ले ? घर में कम्प्यूटर भी था , लेकिन पतिदेव की सख्त हिदायत थी कि इसे मत छूना |मन में ललक तो उठी थी लेकिन—किया क्या जाए , दुविधा थी |
” जहाँ चाह, वहाँ राह” ! उन्हीं दिनों मूर्ति ममी-पापा के पास दो महीनों के लिए रहने आई, क्योंकि उसके पति राघव को किसी कोर्स के लिए अचानक यू.एस जाना पड़ गया था |गार्गी की तो मानो ईश्वर ने सुन ली |मूर्ति को सारा दिन कम्प्यूटर पर ही रहना होता था | माँ के आग्रह पर उसने उन्हें ई-मेल करना सिखा दिया | हिन्दी के लिए उनका रुझान देखते हुए हिन्दी फाँन्ट भी अपलोड कर दिया और याहू डाँट काँम पर अकाउंट खोल दिया | आज गार्गी को लगा कि मूर्ति ने अपने दूध का ऋण चुका दिया , माँ को जीवन की एक नई दिशा दिखाकर |उसने माँ के सम्मुख एक नया संसार खोलकर रख दिया था | गार्गी को जीने का एक सम्पूर्ण मकसद समक्ष दिख रहा था | उसकी अतृप्त -आकांक्षाओं को तृप्त करने का आधार सामने था उसके |अब वर्जनाएं टूट रही थीं |जैसे वेगवती धारा आगे बढने को बेचैन हो |
मूर्ति ने माँ से पहली ई-मेल भैया को भिजवाई| शिशिर की उसी पल जवाबी ई-मेल आ गई माँ के अकाउंट में |साथ ही फोन भी आ गया |उसे इस उम्र में माँ के उत्साह ने अभिभूत कर दिया था |उसे माँ पर गर्व हुआ |उसने मूर्ति को भी सराहा कि उसने माँ के जीवन में रंग भर दिए थे |गार्गी ने दामाद को भी ई-मेल भेजी |वह भी सासू माँ के इस ओर बढ्ते कदमों से बेहद प्रसन्न हुआ |
गार्गी की टाइपिंग के लिए यह चुन्नौतिपूर्ण कार्य था | जो उंगलियाँ बरसों से चूल्हे-चौके में लगीं अपनी थिरकन गँवा चुकी थीं , अब वो सक्रिय हो उठी थीं | एक रात सोने से पूर्व गार्गी कम्प्यूटर पर जा बैठी , पतिदेव ने देख लिया | वे गुस्से से बोले, ‘ अरे तुम इसे क्यों छेड़ रही हो? यह बच्चों के खेलने की मशीन नहीं है |और खराब कर दोगी |’ पापा की आवाज सुन मूर्ति अपने कमरे से बाहर आई ,और बोलीः
“पापा! ममी कम्प्यूटर चलाना सीख गई हैं |” लेकिन प्रत्युत्तर
में वहाँ भावों का कोई उतार- चढाव नहीं था |
माँ की समझ व स्पीड देखकर मूर्ति प्रसन्न थी | गार्गी ने जब वहाँ अपनी पहली कविता लिखी , तो मूर्ति ने उसे डाँक्यूमेंट्स में सेव करना , साथ ही अन्य ई-पत्रिकाओं को प्रेषित करना भी सिखा दिया |इसी तरह दो महीने कब पूरे हो गए पता ही नहीं चला |मूर्ति चली गई, दे गई माँ को उसका अभीष्ट—!
गार्गी एक नए संसार में पदार्पण कर चुकी थी |उसकी बरसों से संचित भावनात्मक दौलत जो उसकी डायरी के पन्नों में कैद ; ज़िन्दा रहने को केवल साँसे ले रही थी, वह अब खुली हवा में साँस ले पनपने लगी थी और मुखरित हो उठी थी आने वाले युग के लिए |अपने घर में बहती विपरीत
हवाओं से लड़ वो तेज कदम भरकर चलने का साहस जुटा रही थी |
गुग्गल-सर्च में जाकर गार्गी ने ई-पत्रिकाओं के नाम ढूँढे | एक-दो को उसने अपनी कविता व नज़्म भेजीं |प्रत्युत्तर में उसे प्रशंसकों की ई-मेल्स आईं |इससे उसका हौंसला बढ गया | अब उसे नई ई-मेल्स का इंतज़ार रहता |वो उठ-उठकर आधी -रात को स्टडी में जाती , ई-मेल्स चैक करती |वह आँन-लाईन रहने लगी थी | सर्फिंग करती, बैठे-बैठे डाक्यूमेंट्स निकालती, उनको बार-बार पढती –आनन्दित होती |उसे अब अकेले जीने में संतोष मिल रहा था |
किसी ‘श्यामल’ की नई ई-मेल थी–‘इतनी बढिया रचना के लिए बधाई स्वीकारें ‘| एक और प्रतिक्रिया, “मर्मस्पर्शी कविता के लिए बधाई !ऍसे ही लिखती रहिए | एक और–“प्रत्येक पंक्ति संवेदनापूरक अभिव्यक्ति से लबरेज़ है “| इतनी प्रतिक्रियाएं पाकर गार्गी स्तब्ध रह गई |उसने झट से कम्प्यूटर बंद किया व किंकर्त्तव्यविमूढ सी
वही बैठी रह गई | आँखों से अविरल धाराएँ बह रहीं थीं खुशी के मारे | उसे लगा उसकी रचनाओ में कुछ तो है ,जो उसे पहचान मिल रही है ! उसकी लेखनी को लोगों ने परखा था, सराहा था | अगले दिन उसने सबको धन्यवाद लिखा और आरम्भ हो गया अनवरत सिलसिला | वह अपनी भावनाओं की दौलत सब से साँझी करने लग गई | साथ ही साथ उसकी पढने की प्रक्रिया भी शुरु हो गई थी | ई-पत्रिकाएँ खोलकर वह उच्चकोटि के साहित्यकारों व गुणी विद्वानों की रचनाएँ पढकर अपना ज्ञानभंडार बढाने में लग गई थी | उत्साह का सृजन होने से उसकी जीने की उमंग विभिन्न रचनाओं के संसर्ग में आलोड़ित हो उठी थी | जड़ हो चुके व नैराश्य से घिरे दिमाग के कोने सजीव हो उठे थे | उनसे अप्र्त्याशित शब्द फूटने लग गए थे | देश -विदेश की ई-पत्रिकाओं को अपनी रचनाएं भेजकर वो यश पा रही थी ,कि तभी उसे लखनऊ से एक निमंत्रण-पत्र मिला कि उसकी रचनाओं के लिए उसे पुरस्कृत किया जा रहा है |वे अगले माह स्वंय आकर सम्मेलन में अपना पुरस्कार लें |उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था–आज वो खुशी से भीतर तक सिहर उठी थी |उसने सोचा कि क्या यह उसके जीवन में संभव था ? वह पतिदेव से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी | उनका व्यवहार ऍसा होता था मानो गार्गी का दिमाग है ही नहीं | उनके लिए वो घरेलू काम-काज करने की मशीन थी केवल | लखनऊ जाकर पुरुस्कार पाने की बात तो दूर रही , उल्टे उन्होंने उसका उपहास उड़ाना था | लेकिन ख्याति पाना या पुरुस्कृत होना भी तो बहुत बड़ी बात थी , इसे वो नकार नहीं सकती थी |वो बेचैन हो उठी अपनी खुशी बाँटने को—
आखीरकार, उसने बेटी को फोन लगाया व उससे खुशी साँझी की |स्वभाविक प्रक्रिया थी–वह खुशी के मारे चीख़ ही पड़ी | उसे माँ पर गर्व हुआ, और उसी क्षण उसने पापा को आँफिस फोन लगाया व बधाई दी | वे परेशान से हो गए , कि सुबह वे आँफिस के लिए चले तो गार्गी ने उन्हें कुछ नहीं बताया |उसके चेहरे पर ऍसे कुछ भाव भी नहीं थे |फिर याद आया कि उन्होंने उस के चेहरे को गौर से देखा ही कहाँ था |एक मुद्दत ही हो गई थी ,उसके चेहरे को नज़दीक से देखे हुए |अपने पर उन्हें ग्लानि सी हुई |खैर , वे चुप ही रहे | घर आकर भी शान्त रहे , जैसे कुछ भी नया नहीं था वहाँ | गार्गी काम तो कर रही थी , पर पति की अवहेलना पर उसकी आँखें भीगी हुई थीं क्योंकि मूर्ति ने उसे बता दिया था कि उसने पापा को बता दिया है |
रात खाने के बाद उन्होंने उसे आवाज़ दी |वह काम निपटाकर उनके पास आई , तो उन्होंने उसके दोनो हाथ पकड़कर , उसकी आँखों में मुस्कुराकर प्रश्नसूचक भाव दिया |पति के चेहरे पर नटखट मुस्कान देख वह हतप्रभ हो पूछ उठी, ‘क्या बात है जी, ऍसे क्यों शरारत से देख रहे हॉ ?’ तो उन्होंने उसे अपने पास खींचकर बैठा लिया| मुस्कुराकर बोले, “समझ नहीं सका कभी कि मेरे पास बहुमूल्य हीरा है, पत्थर नहीं | भई , तुम तो बड़ी छुपे-रुस्तम निकलीं |मूर्ति ने आज तुम्हारे बारे में ढेरों बातें बताईं |मुझे तुम पर गर्व है|
बताओ कब जाना है लखनऊ?”
गार्गी की झोली में मानो सारे जहान के पुरुस्कार इतने से ही डल गए थे |लखनऊ अब उसके लिए कोई मायने नहीं रह गया था |जिस पूर्णत्व की प्राप्ति के लिए उसकी आत्मा बेकरार थी, वह अपूर्व पूर्णत्व वह आज पा सकी थी |वह छलकती आँखों से पति के गले लग गई |दिल ने उसके कान में चुपके से कहा–“यही था न तुम्हारा अभीष्ट!”
वीणा विज ‘उदित’
८सितम्बर ‘११

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