अपने अपने शून्य

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अपने अपने शून्य

अपने अपने शून्य स्वयं में समेटते
अतीत के द्वार धकेल बढ़ते जाते
छद्म चेहरों में अंत: छिपा विचरते
उत्तरोत्तर बढ़ती परछाइयों से डरते ।

अन्धकार को बींध पार ताकते
स्मित -पुष्प लता खिली देख हर्षते
धवल चंद्र-रात्रि में अभिसार करने
पुष्प लताओं.को बीनने स्वप्न निकलते ।

मन: प्राण पर जमी काई के रहते
चलते-फिसलते , औंधे मुंह गिरते
अपने शून्य शीतल ओस बिंदु बन के
अर्द्ध-वृत्त से पूर्ण चन्द्र -वृत्त निखरते ।

शनैः शनैः शून्य वृत्त की परिधि बढ़े
सलिल सिंधु संवेदनाओं में ज्वार चढ़े
जीवन की सृजना करे शून्य का.अंश
ध्यानस्थ हो पारब्रह्म के शून्य पहुँचते ।।

वीणा विज उदित

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One Response to “अपने अपने शून्य”

  1. Amit Kumar Says:

    बहुत बढिया कविता!
    शब्दो का सुन्दर प्रयोग