अन्ततः

हे प्रिये!
पीड़ाओं से व्यथित दुधिया चाँदनी
मटमैली हो रही है-
पिघलती हुई साँझ,रात की स्याही
में गुम हो रही है-
बाधाओं से घिरी बदरी की टुकड़ी
काली हो रही है-
आकाश-गंगा में नहाए ,तारों के झुरमुट
अभी भी सूखे हैं-
अपने ग्रहों की परिक्रमा करते चन्द्र
थक सोने चले हैं-
साँझ के झुटपुटे में पंछियों का कलरव
नीरव हो गया है-
पथराई आँखें ईशान से उत्तर को निहारती
अटल ध्रुव पर टिकी हुई हैं-
ऍसे में….
तुम्हारे अटल-विश्वास की धरोहर थामे
हर आहट पर तुम्हारे कदमों की पदचाप
सुनने को आतुर-
मेरी पंचधातु से बनी नश्वर काया
तुम्हारी आस में पिघलकर लावा हो चली है!
अन्ततः
भोर की प्रथम किरण से पूर्व यह
पंचमहाभूतों में समा
महाप्रयाण की यात्रा पर होगी |||
*
वीणा विज’ उदित’
( सन्नाटों के पहरेदार ‘ से)

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